उत्तर प्रदेश में अतीक अहमद के 4 दशक से भी लम्बे माफिया आतंक का अंत सबके सामने है।
किसी सही व्यक्ति की अपराधी से हमदर्दी नहीं हो सकती, पर संविधान में इसके लिए बाकायदा कानून और न्याय व्यवस्था है।
उत्तर प्रदेश में अतीक अहमद के 4 दशक से भी लम्बे माफिया आतंक का अंत सबके सामने है। किसी सही व्यक्ति की अपराधी से हमदर्दी नहीं हो सकती, पर संविधान में इसके लिए बाकायदा कानून और न्याय व्यवस्था है। असद और अतीक प्रकरण में उस व्यवस्था का कितना पालन हुआ? इसका पता शायद जांच समितियों की रिपोर्ट से चल पाए, पर किसी छुटभैये गुंडे को माफिया और फिर माननीय बनाने वाली व्यवस्था से जुड़े अहम् सवालों का जवाब ज्यादा जरूरी है।
13 अप्रैल को उसके बेटे असद की शूटर गुलाम समेत पुलिस मुठभेड़ में मौत और फिर 15 अप्रैल की रात पुलिस कस्टडी में अतीक एवं उसके भाई अशरफ की हत्या को फरवरी के अंत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विधानसभा में टिप्पणी, माफिया को मिट्टी में मिला देंगे, से जोड़ कर भी देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने वह टिप्पणी तब की थी, जब राजूपाल हत्याकांड के गवाह उमेश पाल की दिन-दिहाड़े हत्या के बाद विपक्ष राज्य में कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठा रहा था।
किसी मुख्यमंत्री द्वारा ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति जताने में कुछ भी गलत नहीं है, बशर्ते पुलिस ने उसे कुछ भी करने की खुली छूट न मान लिया हो। पुलिस निरंकुशता एक कड़वी वास्तविकता है, जिसकी कहानियां सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में अनगिनत हैं। बहुत पहले ही एक न्यायाधीश ने पुलिस को वर्दीधारी गिरोह करार दिया था। फर्जी मुठभेड़ मामलों में पुलिस को सजा के उदाहरण भी बताते हैं कि एक बार निरंकुश हो जाने के बाद वह सही-गलत में विवेक का इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि राजनीतिक आकाओं को खुश करने या फिर अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति में तमाम हदें पार कर जाती है।
कभी किसी अपराधी की गाड़ी पलट जाती है तो कभी किसी की मोटरसाइकिल फिसल जाती है। अक्सर अपराधी को पकडऩे या खुद को बचाने के लिए चलाई गई पुलिस की गोली ऐसी जगह ही लगती है कि जानलेवा हो। अतीक-अशरफ के मामले में तो हद हो गई। पुलिस देर रात दोनों को मैडीकल कराने अस्पताल ले गई, क्योंकि उन्होंने तबीयत ठीक न होने की शिकायत की थी। इस कहानी से उठने वाले सवाल अनुत्तरित हैं। मसलन, अतीक- अशरफ ने तबीयत ठीक न होने की बात पुलिस को बताई तो ऐसे खतरनाक अपराधी, जिसने अपनी हत्या की आशंका जता रखी हो और पुलिस को भी आशंका हो कि उसे छुड़ाने की कोशिश की जा सकती है, को देर रात इतनी कम सुरक्षा में अस्पताल ले जाने की बजाय डाक्टर को ही क्यों नहीं बुलाया गया?
अतीक-अशरफ को अस्पताल ले जाया जा रहा है, इसकी सूचना मीडिया और मीडिया के वेश में पहुंचे 3 हत्यारों को कैसे मिली? अतीक-अशरफ को मीडिया से बात करने के लिए आगे छोड़ ज्यादातर पुलिस कर्मी पीछे क्यों हट गए? जब हत्यारों ने अतीक-अशरफ पर नजदीक से गोलियां चलाईं तो पास मौजूद पुलिस कर्मी उन्हें बचाने की बजाय खुद को बचाते हुए और पीछे क्यों हट गए? घटना के वीडियो में साफ दिख रहा है कि हत्यारों द्वारा आत्मसमर्पण के अंदाज में हाथ ऊपर कर दिए जाने तक उन्हें पकडऩे की कोई कोशिश नहीं की गई।
अब असल सवाल पर आते हैं। कोई भी गुंडा रातों-रात इतना बड़ा माफिया नहीं बन जाता कि समानांतर व्यवस्था चलाने लगे। अतीक भी अचानक इतना बड़ा अपराधी नहीं बन गया था। घटनाक्रम बताता है कि तब के इलाहाबाद और अब के प्रयागराज के छुटभैये गुंडे अतीक को पुलिस ने ही तत्कालीन बड़े गुंडे चांद बाबा के मुकाबले शह दी। उसी के चलते अतीक के मंसूबे और हौसले बढ़ते गए। वह निर्दलीय विधायक बना और एक दिन चांद बाबा की दिन-दिहाड़े चौराहे पर हत्या हो गई। इलाहाबाद पश्चिमी सीट से अतीक 3 बार निर्दलीय विधायक बना तो उसके लिए मतदाताओं की शोध का विषय है, लेकिन फिर उसे राजनीतिक संरक्षण देने की शर्मनाक कहानी तो सबके सामने है।
यह भी कि आतंक के सहारे राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए माफिया को माननीय विधायक / सांसद बनाने तक में हमारे राजनीतिक तंत्र ने संकोच नहीं किया। नतीजतन अतीक और उसका अपराधी कुनबा कानून के लिए तो खुली चुनौती बन ही गया, जब-तब खुद उन राजनेताओं के लिए भी मुश्किलें खड़ी करता रहा, जिन्होंने उसे पाला-पोसा। किस-किस दल और नेता ने अतीक को बड़ा माफिया और फिर माननीय बनाने में योगदान दिया वह तो जगजाहिर है। इसके अलावा जिस कालखंड में अतीक इतना बड़ा माफिया और फिर माननीय विधायक/ सांसद बना, उस दौर में जिन दलों की उत्तर प्रदेश में सरकारें रहीं, वे भी अपनी जिम्मेदारी-जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते।
योगी राज में पुलिस मुठभेड़ की घटनाओं में जबदरस्त वृद्धि पर उठते सवाल अब जांच की मांग के रूप में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए हैं। बेशक कानून व्यवस्था बनाए रखना सरकार और पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारी है, यह काम छुटभैये गुंडों के बड़े बनने से पहले ही उन पर अंकुश लगा कर करना चाहिए। उनके माफिया और राजनीतिक मुद्दा बनने का इंतजार नहीं करना चाहिए। यह सबक इसलिए भी जरूरी है कि अतीक पहला माफिया नहीं था। हमारे व्यवस्था तंत्र से लगता है कि वह आखिरी माफिया भी साबित नहीं होगा, क्योंकि सिर्फ उत्तर प्रदेश नहीं, शेष देश में भी राजनीति-पुलिस-अपराध के नापाक गठजोड़ से पनपे माफियाओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है। इस व्यवस्था का खात्मा भी जरूरी है। -राज कुमार सिंह
