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लेख

कहानी- एकाकी जीवन का पवित्र प्रेम

admin
Last updated: दिसम्बर 29, 2024 9:21 पूर्वाह्न
By admin 21 Views
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18 Min Read
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कहानी-
एकाकी जीवन का पवित्र प्रेम
============
बहुत पुरानी बात है ।‌ कभी माधवगढ़शहर की मोतीगंज सराय गांव कस्बों के जिमीदार व्यापारियों के ठहरने का प्रमुख कृषि मंडी थी । सुरक्षा की दृष्टि से मोतीगंज सराय के पूरब पश्चिम में आली शान दोनों (र फाटक दार दरवाजे थे । इन्हीं दरवाजों से सराय में लोग आते जाते थे । इस मोती गंज सराय में गांव कस्बों के जिमीदार तालुकदार अपनी रखैलओ के यहां आकर ठहरते थे और अपनी हवस की पूरी करके गांव कस्बा को लौट जाते थे ।इनजिम्मेदार तालुकदारो ने अपनी रखैलो के लिए अच्छे-अच्छे मकान बना रखे थे। मोती गंज सराय में व्यापारियों के ठहरने के लिए भी दो मंजिला मकान बने हुए थे। जहां ऊपर के पोर्शन में व्यापारी रुका करते थे और नीचे के पोर्सन में उनके खाने-पीने खातिरदारी करने नौकर चाकर रहा करते थे और इन नौकर चाकरो को आने वाले व्यापारी खर्चा भी देतेथे । इस तरह मोती गंज सराय में एक अच्छी चहल पहल रहती थी। जिम्मेदारी जाने के बाद वक्त बदला जिमीदार तालुकदारो का आना जाना बंद हो गया ।इन जिमीदार तालुकदारो तथा उनके वंशजों ने अपनीअपनीजायदा को बेच दिया और मोतीगंज सराय अब सब्जी फल आढत की मंडी रह गई है और इस सराय मंडी में अच्छा कपड़ा आदि का बाजार भी हो गया है । पूरब दरवाजे से घुसते ही बीच में चौड़ी सड़क दोनोओर फल सब्जी की कपड़ा की दुकाने तथा पश्चिमी दरवाजे के पास आढत का कारोबार के लिए पक्के सीमेंटेड चबूतरा बने हुए थे तथा इन चबूतरो के बगल में शिव हनुमान का मंदिर भी था ।शिव मंदिर के पीछे खुले मैदान में दो साडोका बसेरा रहता था। जो किसी भी जानवर को मंडी के अंदर नहीं आने देते थे। मंडी चबूतरे पर जो भी फल सब्जी के ढेर लगे होते थे उनको भी यह दोनों सांड ना खुद खाते थे ना किसी को खाने देते थे । चबूतरे पर रखी हुई सब्जियों फलों को सुरक्षित रखेरहते थे। इसीलिए मंडी के व्यापारी लोग इन दो साडो की देखरेख खाने का अच्छा प्रबंध करते रहते थे । सब्जी फल की आढत खत्म होने के बाद दोनों साडो का आढत मंडी नहीं पूरी सराय पर देखरेख करने का कब्जा हो जाता था ।कोई भी जानवर मंडी के अंदर नहीं आ सकता था। गेरुआ रंग के दोनों सांड व्यापारियों तथा ग्राहकों से इतने घुल मिल गए थे। लोग इन दोनों सांडो कोसाधु बाबा के नाम से पुकारने लगे थे ।साधु बाबा कहकर इन पर कोई भी हाथ फेरसकता था ।उससे यह बोलते नहीं थे।
फागुन का महीना था । होली के त्यौहार के बाद मोतीगंज सराय मंडी में कारोबार शुरू हुआ ही था। तभी पूरब के दरवाजे से एक काले रंग का सांड व दो गाय मंडी के अंदर आने लगी। जैसे ही पश्चिम दरवाजे से साधु बाबा ने उनको देखा । दाहढं मारते हुए पूर्व दरवाजे पर उनको रोकने के लिए दौड़ पड़े। मंडी में भगदड़ मच गई। मंडी के अंदर आने वाली भीड मंडी के दोनों चबूतरो के ऊपर चढ़ गई। साधु बाबा और काले सांड में द्वंद युद्ध होने लगा । सब्जी लेने आए 85 वर्षीय कैप्टन बृज मोहन किशोर साहब की निगाह फल मंडी के चबूतरे पर खड़ी हुई चश्मा लगाए गोरे रंग की 75 वर्षीय महिला पर जैसे ही गई तो कैप्टन साहब सोचने लगे कि यह जानी पहचानी शक्ल लग रही है ।साधु बाबा ने ठोकरे मार-मार कर काले रंग के सांड को भगा दिया। फल और सब्जी के चबूतरो पर खड़ी भीड चौड़ी सड़क पर आ गई। कैप्टन सामने चबूतरे से उतर कर फल के सामने खड़ी हुई महिला से पूछा – आप कुछ जाने पहचानी शक्ल की लगती है ।क्या आपका नाम शकुंतला है? कैप्टन साहब की आवाज सुनकर महिला मुस्काई और बोली- आपने ठीक पहचाना है। मैं तुम्हारे साथ पढ़ने वाली शकुंतला हूं ।आज 55 वर्षों के बाद हम दोनों की मुलाकात हो रही है। क्या आप भी इसी शहर में रह रहे हैं? कैप्टन साहब बोले- हां मैं भी इसी शहर में रह रहा हूं । होली के बाद सब्जी लेने के लिए आया हुआ हू। सांडो के युद्ध को देखते देखते तुम दिखाई दे गई।
चलो 55 वर्षों के बाद आज अचानक मुलाकात हो गई।शकुंतला कैप्टन से बोली- अगर ऐतराज ना हो तो मेरे घर चलिए। वहीं पर सब बातें होंगी। मंडी के बाहर मेरी गाड़ी खड़ी हुई है। मेरे साथ चलिए बाद में मैं आप को आपके घर तक छोड़ आऊंगी ।कैप्टन बृजमोहन किशोर शकुंतला के साथ चल दिए और उसकी गाड़ी पर बैठ कर शकुंतला के घर पर पहुंच गए। शकुंतला और कैप्टन बृजमोहन किशोर जैसे ही गाड़ी से उतरे और मकान की ओर बढ़ने लगे तो कैप्टन साहब बृजमोहन ने देखा शकुंतला का मकान बड़ी आलीशान कोठी है। कोठी के बाहर बहुत बड़ा पार्क है। यह सब देखते हुए बृजमोहन शकुंतला के साथ कोठी के अंदर पहुंच गए । कोठी के अंदर नौकरों ने कैप्टन साहब तथा अपनी मेम साहब का दौड़ कर स्वागत किया और उन्हें कुर्सियों पर बैठाया ।थोड़ी देर में ही नाश्ता कॉफी आ गई । नाश्ता करने कॉफी पीने के बाद कैप्टन बृजमोहन बोले – तुम्हेंअपनी स्कूल जिंदगी तो याद होगी। तुम हमारी यूनियन की वफादार मंत्री थी। हम दोनों में खूब घुटती थी। अब यह सब बातें याद बनकर रह गई। शकुंतल कैप्टन बृजमोहन की ओर देखते हुए आंखों में आंसू भर कर कहा- जीवन कीयह सब यादे कभी बड़ी अच्छीलगी -कभी बहुत बड़ी दुखदाई भी रही हैं। मैंने क्या-क्या सुनहरे सपने देखे थे । सब सपने देखते देखते टूटते गए। जब तुम डिग्री लेकर जा रहे थे। तो मैंने तुम्हें घर चलने के लिए कहा था। पिताजी तुम्हारी हमारी शादी की बात तुमसे करना चाहते थे ।लेकिन तुम कलआऊं गा कह कर चले गए । जब तुम नहीं आए तो तुम्हें मैं तुम्हारे संबंधी के घर पर देखने भी गई थी ।लेकिन तुम नहीं मिले थे।पता चला कि तुम गांव चले गए हो । मैंने गांव के पाते से तमाम पत्र भी लिखे ।लेकिन तुमने कोई जवाब नहीं दिया। जब शादी के सिलसिले में पिताजी तुम्हारे गांव गए थे तो पता चला था तुम अपने बीमार पिता को लेकर दिल्ली चले गए हो ।तुम्हारे गांव के पत्ते पर पत्र लिखती रही ।लेकिन तुम्हारा कोई उत्तर जब नहीं मिला । एक साल बाद अचानक तुम्हारे पिताजी का पत्र आया। जिसमें उन्होंने लिखा था। तुम मिलिट्री में सूबेदार हो गए हो और उसकी ट्रेनिंग कर रहे हो। इसके बाद तुम्हारी कोई खैर खबर नहीं मिली ।मेरे पिताजी ने लाचारी में मुझे मजबूर करके डिग्री कॉलेज के एक प्रोफेसर से मेरी शादी करा दी।
बीच में कैप्टन साहब बोले -समय का खेल बहुत बुरा होता है । पिताजी के अच्छे होने तथा सूबेदार की नौकरी मिलने के बाद मैं जब मैअपने घर पर पहुंचा था तो तुम्हारे ढेर सारे पत्र मिले थे । मै छुट्टी लेकर तुम्हारे मकान पर भी आया था। तो पता चला तुम सब लोग गांव में गए हुए हो और वहां तुम्हारी शादी हो रही है। फिर मैंने तुम्हारे गांव जाकर तुम्हारी शादी में कोई व्यवधान नहीं डालना चाहता था । इसलिए घर वापस लौट आया और सूबेदार की ट्रेनिंग करने चला गया । मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करता था। लेकिन ईश्वर को मंजूर नहीं था ।जो होना था सो हो गया । शकुंतला बोली -मेरे भाग्य में कुछ और लिखा था । शादी हुए 3 वर्ष अच्छी तरह से कट रहे थे तभी मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया और मैं विधवा हो गई। पति के जगह पर मुझे उसं कॉलेज मैं प्रोफ़ेसर पद की नौकरी मिल गई थी।बच्चा जो पैदा हुआ था उसे ही पढ़ा लिखा कर कनाडा मैं डॉक्टर बना दिया है। उसकी शादी होने के बाद वह कनाडा में बच्चों के साथ रह रहा है। पति की यादो को लेकर मैं आज भी इसी शहर में अकेली रह रही हूं । अब मैं रिटायर हो चुकी हूं । होली के दिन लड़के बहू से आने के लिए कहा था । तो वह यही बोला कि अगर मैं भारत आऊंगा तो यहां हमारे तमाम मरीजों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा। मैं आने में लाचार हूं ।अच्छा हो तुम ही चली जाओ ।मैंने जाने से मना कर दिया और मैं ही अकेली रह रही।
शकुंतला की राम कहानी सुनकर कैप्टन साहब बोले -मेरी भी तुम्हारी जैसी दुख दाई कहानी है।जब मैं मिलिट्री में नौकरी कर रहा था तो पिताजी ने अपनी सुविधा के लिए अपने गांव की मास्टर साहब की बीए तक पढ़ी लिखी रूप रंग से सुंदर लड़की कल्पना से मेरी शादी कर दी । कल्पना धार्मिक अच्छे विचार होने के कारण मेरे माता पिता की खूब सेवा करने लगी । जब भी मैं छुट्टियों में आता था तो माता-पिता उसकी बहुत तारीफ करते थे। जब 2 बच्चे हुए तो उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए मैंने शहर में एक मकान खरीद कर माता-पिता तथा पत्नी को वहां रख दिया ।अभी 7 साल बीते थे कि अचानक माता पिता जी की मृत्यु हो गई। मैं माता-पिता का दाह संस्कार करके नौकरी पर लौट गया। बच्चों की अच्छी पढ़ाई लिखाई करने के लिए उन्हें उन के मामा के पास अमेरिका भेज
दिया । पत्नी शहर में अकेली रह गई । अकेली पत्नी की चिंता मुझे सताने लगी । जब तक में रिटायरमेंट लेकर छुट्टी पर से आता पत्नी भी मुझे अकेला छोड़ कोरोना काल में धोखा देकर मृत्यु लोक को चली गई ।‌रिटायरमेंट के बाद अब मैं शहर में अकेला रह रहा हूं। मेरे लड़के भी अमेरिका में अच्छे डॉक्टर है । वह भारत में रहना पसंद नहीं करते क्योंकि उन्होंने अमेरिका के पश्चात सभ्यता की लड़की से शादी कर ली है । उसके भी दो बच्चे हो गए हैं। मैं होली का त्यौहार करने के लिए अपने पैतृक गांव जा रहा हूं ।अगर तुम पसंद करो तो मेरे साथ मेरे गांव में चलो ।
गांव में आज भी परिवारिक संबंध है । गांव के लोग आज भी एक दूसरे से लगाव रखते हैं। इस शहर में अकेला रह कर क्या करूंग? शकुंतला गंभीर होकर सोचते हुए बोली- मैं तुम्हारी आज्ञा को कैसे डाल सकती हूं । मैं भी तुम्हारे साथ गांव चलूंगी लेकिन एक शर्त के साथ गांव में चलकर तुम शादी की बात तो नहीं करोगे। मैं सातंभंवरों फेरेके वादों को निभाना चाहूंगी । कैप्टन साहब शकुंतला की बात सुनकर बड़ी जोर से हंसे और बोले 86 वर्ष की उम्र में अब कौन शादी की बात सोचेगा एकाकी जीवन से छुटकारा पाने के लिए हम तुम साथ-साथ रहेंगे। सात फेरे के समय किए गए वादे हम दोनों निभाएंगे। शकुंतला बोली भारतीय सभ्यता और पश्चात सभ्यता में यही अंतर है। पश्चात सभ्यता का प्रेम देह सुख होता है। मैं तुम्हारे साथ गांव चलूंगी और जीवन पर्यंत वहीं रहूंगी ।
होली के 1 दिन पहले कोठी को नौकरों को सौप करअपनी गाड़ी लेकर ड्राइवर के साथ कैप्टन के मकान पर शकुंतला पहुंच गई और कैप्टन को साथ लेकर कैप्टन के गांव को चल दी। 10 घंटे के सफर के बाद कैप्टन साहब और शकुंतला दोनों कैप्टन के गांव जा पहुंचे ।जैसे ही गांव वालों ने कैप्टन साहब के आने की खबर सुनी पूरा गांव कैप्टन साहब से मिलने के लिए दौड़ पड़ा । गांव वालों की इस प्रेम को देखकर शकुंतला गदगद हो उठी। कैप्टन साहब की कोठी पर पहुंचकर शकुंतला न देखा- गांव के लोगों ने कैप्टन साहब के आने की खबर पर कोठी में सभी इंतजाम उनके लिए कर दिए गए थे। कोठी के अंदर ड्राइंग रूम में शकुंतला और कैप्टन साहब के लिए पहले से ही अलग-अलग पलंग बिछे हुए थे। खाने रहने के सभी प्रबंध मौजूद थे। भोजन करने के बाद पलंग पर बैठ कर आए हुए गांव वालों से कैप्टन साहब ने गांव के हाल-चाल पूछे और शकुंतला का परिचय बताते हुए बताया कि यह शहर के 1 डिग्री कॉलेज के रिटायर्ड प्राचार्य है। कुछ दिन यह गांव में रहकर आप लोगों के बीच की समस्याओं की जानकारी लेंगी ।अगर उन्हें यहां अच्छा वातावरण मिला तो वह यहां 1 डिग्री कॉलेज खोलने का भी प्रस्ताव लेकर आई है ।कैप्टन साहब की बातों को सुनकर शकुंतला काफी गंभीर हो गई। दूसरे दिन कुछ महिलाओं के साथ शकुंतला गांव के बाग बगीचे खेतों को देखने के लिए गई ।गांव की महिलाओं के प्रेम भरे व्यवहार को देखकर शकुंतला यह सोचने लगी- उसे हकीकत में इसी गांव में अब रहना चाहिए ।अगर गांव में शिक्षा उद्योग का विकास कर दिया जाए तो गांव आज भी स्वर्ग है ।
शहर से आई हुई शकुंतला एक दिन बुखार से पीड़ित हो गई ।गांव के वैध जी ने आकर शकुंतला की नब्ज देखी और उन्हें बुखार खांसी की दवा दी ।वैद्य जी के व्यवहार को देखकर शकुंतला काफी गांव वालों से प्रभावित हुई। रात के समय जब शकुंतला बुखार से कराह रही थी तो कैप्टन साहब ने उसके माथे पर हाथ रखकर देखा– बुखार तेज था ।उन्होंने आयुर्वेदिक दवाएं दी और शकुंतला के पलंग पर बैठकर कटोरे मैं पानी लेकर शकुंतला के माथे पर पानी के पट्टी चिढ़ाने लगे ।ठीक2 बजे रात जब शकुंतला ने आंख खोली तो शकुंतला ने देखा गांव के काफीलोगआसपास उनके खड़े हुए हैं और वैद्यजी उनके हाथ की नब्ज पर हाथ धरे हुए बैठे हैं ।सुबह के समय शकुंतला का बुखार उतर गया और शकुंतला स्वस्थ हो गई ।
गांव में 15 दिन रहने के बाद कैप्टन साहब का सच्चा पवित्रआत्मीय प्रेम देखकर शकुंतला ने निर्णय कर लिया अब शहर की कोठी सारी संपत्ति बेचकर कैप्टन साहब के पास रहकर गांव में एक डिग्री कॉलेज खोलकर गांव के लोगों की सेवा करेगी और अपनेछात्र जीवन के मौन प्रेम को पवित्र प्रेम धागे में बांधकर कैप्टन साहब के साथ अब गांव में रहेगी । शारीरिक भौतिक प्रेम से बड़ा पवित्र आत्मीय प्रेम बंधन का सच्चा प्रेम होता है । शारीरिक प्रेम शारीरिक सुंदरता तक ही रहता है। शारीरिक प्रेम क्षणभंगुर का प्रेम है ।जो रूप रंग ढलते ही समाप्त हो जाता है। आत्मीय प्रेम सदैव जीवित रहता हैशिक्षा जगत की रिटायर्ड प्राचार्य शकुंतला और रिटायर्ड कैप्टन बृजमोहन किशोर अब गांव के आपसी प्रेम सद्भावना के वातावरण को देखकर गांव में बस गए ।शहर की सभी संपत्ति धन दौलत दोनों ने भे
बैच दी और गांव में डिग्री कॉलेज खोलकर एक शांत की जिंदगी जीने लगे ‌‌।

बृज किशोर सक्सेना किशोर इटावी कचहरी रोड मैनपुरी

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