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उत्तर प्रदेश

लिस सतर्क थी तो गालीबाज गुंडा भागा कैसे, SHO सहित 6 सस्पेंड क्यों हुए?

admin
Last updated: अगस्त 10, 2022 1:47 पूर्वाह्न
By admin 10 Views
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10 Min Read
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Shrikant Tyagi

गली का गालीबाज गुंडा के नाम से बदनाम हो रहे श्रीकांत त्यागी कांड में जितना अंदर झांककर देखिए उतनी ही सनसनीखेज जानकारियां निकलकर सामने आ रही हैं. भले ही अब जब श्रीकांत त्यागी शिकंजे में आ ही गया है तो जमाने के लिए बाकी सब बातें बेइमानी सी हो गई होंगी. हालांकि यह नहीं होना चाहिए. इस पूरे मामले में जितनी बुरी तरह से 25 हजार का इनामी श्रीकांत त्यागी फंसा है. उससे कहीं कम जिला पुलिस विशेषकर नोएडा फेज-2 थाना पुलिस भी कमतर नहीं फंसी है. गौतम बुद्ध नगर जिला पुलिस अगर चाहती या सतर्क होती अथवा कान में तेल डालकर न सो रही होती तो इस पूरे कांड में कई ऐसी बातें हैं, जो होती ही नहीं.

Contents
अंदरखाने का सचअगर पुलिस पाक-साफ है तो फिर….पुलिस सतर्क होती तो मुसीबत बच जातीतो मुलजिम फरार कैसे हो गया?लखनऊ से वो फोन कॉल किसकी थी?

दूसरे अब लखनऊ से लेकर नोएडा तक उस एक ‘फोन कॉल’ की चर्चा मंगलवार को दिन भर होती रही, जिस फोन कॉल के आते ही तय हो गया था कि नोएडा पुलिस अफसरों को अपनी नौकरी बचाने की खातिर श्रीकांत त्यागी को घेरना ही पड़ेगा. लखनऊ पुलिस मुख्यालय के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो अब गली का गालीबाज गुंडा के नाम से कुख्यात हो रहा श्रीकांत त्यागी, इलाका थाना (जिस इलाके में वह रह रहा था नोएडा फेज-2) पुलिस को उंगलियों पर नचाता था. थाने की पुलिस के ऊपर उसकी हेकड़ी कहिए या फिर हवाबाजी का आलम यह था कि पुलिस कंट्रोल रूम में उसके खिलाफ कॉल किए जाने पर कंट्रोल रूम की जिप्सी भी मौके पर पहुंचने से कन्नी काटती थी.

अंदरखाने का सच

चूंकि पीसीआर की जिप्सी का रिकॉर्ड ऑनलाइन लखनऊ से मेंटेन और मॉनिटर होता है. लिहाजा इस गुंडे के खिलाफ जिला पुलिस नियंत्रण कक्ष में पहुंचने वाली सूचना पर, कंट्रोल रूम की पेट्रोलिंग कार पहुंचती तो जरूर थी. मौके पर पहुंचकर मगर पुलिस वाले प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस गुंडे के सामने नतमस्तक हो जाते थे. लिहाजा इलाके के लोगो में श्रीकांत त्यागी का खौफ उस हद तक कायम हो चुका था कि पीड़ितों ने चाहकर भी पुलिस को बुलाना ही बंद कर दिया था. वे जानने-समझने लगे थे कि इलाका थाना या पुलिस कंट्रोल रूम की पुलिस पहुंचेगी भी तो कथित रूप से ही सही मगर वो इसी गुंडे का पक्ष लेगी.

अगर पुलिस पाक-साफ है तो फिर….

ऐसे में सवाल यह पैदा होना लाजिमी है कि जिस गुंडे का पुलिस से कथित रूप से ही सही, इस हद का उठना-बैठना रहा हो तो फिर बवाल मचने पर उसे घेरकर सलाखों में डालने में कुछ पुलिस वालों को तकलीफ तो होना लाजिमी है ही. साथ ही अगर पुलिस और गली के इस गुंडे के बीच वास्तव में करीबियां नहीं थी तो फिर अब बवाल मचने पर उसे गिरफ्तार करने के लिए गौतम बुद्ध नगर जिला पुलिस को ही थाना फेज-2 पुलिस की जगह, स्पेशल पुलिस टीम तक क्यों लगानी पड़ गई? उत्तर प्रदेश पुलिस के एक उच्च पदस्थ सूत्र की मानें तो अगर यह बवाल मीडिया में न उछला होता तो लोकल थाना फेज-2 पुलिस इस बार भी अपनी मनमर्जी कर ही चुकी थी! मीडिया में जब मामला उछला और गली के इस गुंडे की सच्चाई लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंची, तब लखनऊ से (राज्य के गृह विभाग में) नोएडा तक (नोएडा पुलिस और जिला प्रशासन) कोहराम मचा.

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पुलिस सतर्क होती तो मुसीबत बच जाती

गौतम बुद्ध नगर जिला पुलिस के आला-अफसरों को जब तक मामले की गंभीरता समझ में आई तब तक तो आरोपी श्रीकांत त्यागी रफूचक्कर भी हो गया. जबकि शुरुआती बवाल के बाद घटनास्थल पर पुलिस पहुंची थी. अगर उसी दौरान पुलिस ने श्रीकांत त्यागी को घेर लिया होता तो पुलिस को कई काम करने से बच जाना पड़ता. मसलन, पहले तो जिला पुलिस ने अगर घटना के तुरंत बाद ही मौके पर काफी समय तक मौजूद रहने के दौरान ही श्रीकांत त्यागी को घेरा होता, तो उसकी गिरफ्तारी पर 25 हजार सी भारी भरकम इनामी राशि की घोषणा करने की नौबत न आई होती. दूसरे थाना फेज-2 के एसएचओ और उनकी पुलिस भी कान में तेल डालकर सोती रही.

घटना के चार घंटे बाद तक बवाल मचता रहा. महिला से सोसाएटी के अंदर अभद्रता का वीडियो आमजन वायरल करके नोएडा पुलिस को कोसते रहे. इसके बाद भी मगर पुलिस ने श्रीकांत त्यागी को मौके पर पहुंचकर दबोचना मुनासिब नहीं समझा. आखिर क्यों? बस इसी सवाल के जंजाल में नोएडा पुलिस और थाना फेज-2 पुलिस फंस गई. हालांकि इस बारे में गौतमबुद्ध नगर के पुलिस कमिश्नर आलोक सिंह ने मंगलवार को आरोपी की गिरफ्तारी के बाद कुछ और ही कहानी सुनाई. पुलिस आयुक्त आलोक सिंह ने बताया कि, घटना वाले दिन हमारी टीम को एक वायरल हो रहे वीडियो के बारे में सूचना मिली थी. जिसका तत्काल ही संज्ञान ले लिया गया. थाना फेस-2 एसएचओ को उस वीडियो की जानकारी दी और पीड़ित परिवार से संपर्क करते हुए कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए.

तो मुलजिम फरार कैसे हो गया?

यह पांच तारीख की घटना थी. पुलिस ने पीड़ित से संपर्क करके जानकारी हासिल करने के बाद मुकदमा भी दर्ज कर लिया. अगर पुलिस आयुक्त की बात ही मानी जाए तो फिर सवाल यह पैदा होता है कि जब वक्त रहते थाना फेज-2 पुलिस ने सब काम कर डाले थे मय मुकदमा दर्ज करने तक. तो फिर गालीबाज गली का गुंडा श्रीकांत त्यागी फरार क्यों और कैसे हो गया? अगर उसे पुलिस की नजरों से भागने का मौका नहीं मिला? थाना नोएडा फेज-2 पुलिस ने जब सब कुछ फटाफट और वक्त रहते कर ही डाला गया था तो फिर, बाद में बवाल मचने पर एसएचओ नोएडा फेज-2 सहित उसके 5-6 मातहतों को सस्पेंड क्यों करना पड़ा? अगर थाना पुलिस सतर्क थी तो फिर फरारी के बाद श्रीकांत त्यागी की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार का इनाम रखकर, उसकी गिरफ्तारी के लिए एक विशेष पुलिस टीम क्यों गठित करनी पड़ी?

लखनऊ से वो फोन कॉल किसकी थी?

मतलब, साफ है कि चारों ओर से अपनी छीछालेदर करा चुकी गौतम बुद्ध नगर जिला पुलिस के आला अफसरान अब सिर्फ और सिर्फ “डैमेज कंट्रोल” करने में जुटे हैं. दरअसल अंदर की कहानी तो यह है कि अगर राज्य के मुख्यमंत्री सचिवालय ने घटना संज्ञान में आते ही, गृह विभाग के आला अफसरों को सतर्क न किया होता. तो शायद यह बवाल भी फाइलों में दफन हो चुका होता या कर दिया जाता. क्योंकि गौतम बुद्ध नगर जिले के नोएडा फेज-2 थाना पुलिस ने आरोपी को भागने के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से कई घंटे मुहैया कराए! जब लखनऊ से गृह विभाग अफसरों ने पूरे मामले में जिला पुलिस और स्थानीय प्रशासन को तुरंत आरोपी की गिरफ्तारी का एक फोनकॉल के जरिए देर रात आदेश दिया.

तब जाकर फरार गालीबाज गुंडे की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार का इनाम, नोएडा फेज-2 थाने के एसएचओ सुजीत उपाध्याय और उसके कई मातहतों को सस्पेंड करने की नौबत आ पाई थी. अपर पुलिस महानिदेशक यूपी प्रशांत कुमार खुद इस बात की पुष्टि करते हैं कि थाना प्रभारी सहित सोसाएटी की सुरक्षा में तैनात एक सब-इंस्पेक्टर और चार सिपाहियों को भी काम में लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया है. अब जिला पुलिस आयुक्त का यह दावा कि सब कुछ उनकी पुलिस बहुत फास्ट कर रही थी…तो यह किसी के गले आसानी से नहीं उतर रहा है. क्योंकि पुलिस अगर फास्ट होती तो फिर आरोपी मौके से फरार ही क्यों और कैसे हो गया? और कैसे इस बवाल के बाद कुछ गुंडे पुलिस की मौजूदगी में भी सोसाएटी के भीतर जा घुसे थे?

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कलप्रिट तहलका (राष्ट्रीय हिन्दी साप्ताहिक) भारत/उप्र सरकार से मान्यता प्राप्त वर्ष 2002 से प्रकाशित। आप सभी के सहयोग से अब वेब माध्यम से आपके सामने उपस्थित है।
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