*डाक्टर अम्बेडकर द्वारा संविधान सभा में दिए अन्तिम भाषण के कुछ अंश*
डा० अम्बेडकर एक महान दार्शनिक, तत्ववेत्ता, मनोवैज्ञानिक और दूरदृष्टा ही नहीं, अपितु वे एक भविष्यवेत्ता भी थे। डा० अम्बेडकर द्वारा दिए गए भाषण का अध्ययन करने पर ऐसा लगता है, कि उन्हें पहले से ही यह आभास हो गया था कि भारतीय राजनेताओं के हाथ में लोकतन्त्र का भविष्य कैसा रहने वाला है। यही कारण था कि उन्होंने भविष्य में आने वाली लोकतान्त्रिक सरकारों को लोकतन्त्र के खतरों के प्रति आगाह ही नहीं किया, बल्कि लोकतन्त्र के जीवन के लिए जरूरी आवश्यक तत्वों का भी उल्लेख किया। इस लेख में, मैं डा० अम्बेडकर द्वारा संविधान सभा में दिए गए अंतिम भाषण के कुछ अंशों को उद्धृत करना चाहूंगा। तो लीजिए, प्रस्तुत हैं उनके उस भाषण के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश —
” मेरा मस्तिष्क अपने देश के भविष्य विषयक विचारों से इतना परिपूर्ण है, कि मैं यह अनुभव करता हूं कि इस अवसर पर इस विषय पर मैं अपने विचारों को व्यक्त करूं। 26 जनवरी 1950 को भारत एक स्वतन्त्र गणतांत्रिक देश होगा। उसकी स्वाधीनता का क्या होगा? क्या वह अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकेगा या उसे फिर खो देगा? यह पहला विचार है, जो मेरे मस्तिष्क में आता है। यह बात नहीं है, कि भारत कभी स्वाधीन न रहा हो। बात यह है, कि एक बार वह पाई हुई स्वाधीनता को खो चुका है। क्या वह दुबारा उसे खो देगा? यही वह विचार है, जिसके विषय में भविष्य के प्रति मैं बहुत चिन्तित हूं। जो तथ्य मुझे बहुत परेशान करता है, वह यह है कि भारत ने पहले एक बार अपनी स्वाधीनता खोई ही नहीं, वरन अपने ही कुछ लोगों की कृतघ्नता तथा फूट के कारण वह स्वाधीनता आई-गई हो गई। मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध के आक्रमण में राजा दाहिर के सैन्य कमांडरों ने मोहम्मद बिन कासिम के एजेंटों से रिश्वत स्वीकार की, और अपने राजा के पक्ष में लड़ने से मना कर दिया। ये जयचंद ही थे, जिन्होंने मोहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने और पृथ्वीराज के खिलाफ लड़ने के लिए आमंत्रित किया, तथा उन्हें अपनी तथा सोलंकी राजाओं की मदद का वादा किया। जब शिवाजी हिंदुओं की मुक्ति के लिए लड़ रहे थे, तो अन्य कुलीन मराठा और राजपूत राजा मुगलों की तरफ से युद्ध कर रहे थे। जब अंग्रेज सिक्ख राजाओं को नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे थे, तो उनके प्रमुख सेनापति गुलाब सिंह शान्त बैठ गए, और उन्होंने सिक्ख साम्राज्य बचाने में मदद नहीं की। सन 1857 में, जब भारत के एक बड़े हिस्से ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध आज़ादी का बिगुल बजाया, तब सिक्ख मूकदर्शक बनकर इस घटना को देखते रहे। क्या इतिहास ख़ुद को दोहराएगा? यही सोच मुझे चिन्ता से भर देती है।”
वे आगे कहते हैं कि,” यह चिन्ता इस तथ्य की अनुभूति से और भी गहरी हो जाती है, कि जातियों और पंथों के रूप में हमारे पुराने शत्रुओं के अलावा हमारे पास विविध और विरोधी राजनैतिक पंथों वाले कई राजनैतिक दल होने जा रहे हैं। क्या भारतीय, मत-मतांतरों को देश से श्रेष्ठ मानेंगे, या देश को मत-मतांतरों से श्रेष्ठ मानेंगे? मुझे नहीं मालूम। लेकिन इतना तय है, कि यदि पार्टियां, देश के ऊपर पंथ को रखेंगीं, तो हमारी स्वतन्त्रता दूसरी बार खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए खो जाएगी। इस संकट से हम सभी को दृढ़ होकर रक्षा करनी चाहिए। अपने खून की अंतिम बूंदों से अपनी स्वाधीनता की रक्षा करने के लिए हमें दृढ़-प्रतिज्ञ होना चाहिए।”
डाक्टर अम्बेडकर आगे कहते हैं कि,” ऐसा नहीं है कि भारत कभी नहीं जानता था कि लोकतन्त्र क्या है। एक समय था जब भारत गण राज्यों से सुसज्जित था, और जहां राजा थे। या तो वे निर्वाचित होते थे, या उनके अधिकार सीमित रहते थे। उन्हें परमाधिकार प्राप्त नहीं था। यह बात नहीं है, कि भारत संसदीय प्रक्रिया से परिचित नहीं था। बौद्ध भिक्षु संघ के अध्ययन से विदित होता है, कि केवल संसद ही नहीं, संघ, संसद के अतिरिक्त और कुछ नहीं होते थे, वरन आधुनिक युग में संसदीय प्रक्रिया के जितने भी नियम हैं, उन सबसे ये संघ परिचित थे। अगर भारत से यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था मिट गई, तो क्या वे इसे दुबारा खो देंगे? मैं नहीं जानता। पर भारत जैसे देश में यह बहुत सम्भव है, जहां लोकतन्त्र के एक दीर्घ काल से अप्रयुक्त रहने से कुछ बिल्कुल नया माना जाना चाहिए, वहां लोकतंत्र के स्थान पर तानाशाही के होने का संकट विद्यमान है। यह बहुत सम्भव है, कि यह नवजात लोकतंत्र अपने वर्तमान स्वरूप को बरकरार रखते हुए व्यावहारिकता में अपने स्थान पर तानाशाही को जगह दे दे। यदि कोई दुर्घटना होती है, तो दूसरी संभावना के साकार होने की अधिक आशा है। यदि हम लोकतंत्र को न केवल रूप में, वरन यथार्थ में बनाए रखना चाहते हैं तो हमें क्या करना चाहिए? मेरे विचारानुसार सबसे पहले हमें यह करना चाहिए, कि अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हम संवैधानिक तरीकों को दृढ़तापूर्वक अपनाएं। इसका अर्थ यह है कि क्रांति के खूनी तरीकों का हम परित्याग करें, यानि सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह की पद्धति का हम परित्याग करें। आर्थिक तथा सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जब कोई मार्ग ही न बचा था, तब तो इन असंवैधानिक तरीकों का अपनाना औचित्यपूर्ण था, लेकिन जहां संवैधानिक तरीके खुले हों, वहां इन असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं हो सकता। ये तरीके अराजकता के व्याकरण के अलावा और कुछ नहीं हैं, और जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही अच्छा है। दूसरी चीज जो हमें करनी है, वह है कि हम उस सावधानी को बरतें, जो हमें ‘जॉन स्टुअर्ट मिल’ ने हम उन सभी को बरतने के लिए कहा है, जो लोकतंत्र को बनाए रखने में रुचि रखते हैं। वह यह है, कि किसी भी महान व्यक्ति के चरणों में अपने स्वातंत्र्य को चढ़ा न दें, या उसे वे शक्तियां न सौंप दें, जो उन्हीं संस्थाओं को मिटाने की शक्ति देती हों। महान व्यक्तियों के प्रति, जिन्होंने जीवन पर्यन्त देश की सेवा की हो, कृतज्ञ होने में कोई बुराई नहीं है, पर कृतज्ञता की भी कोई सीमा है। आत्म सम्मान की कीमत पर कृतज्ञता व्यक्त करना व्यर्थ है। किसी अन्य देश की अपेक्षा भारत के लिए यह चेतावनी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि भारत में भक्ति या जिसे भक्ति मार्ग या नायक पूजा ( Hero Worship) कहा जाता है, का भारत की राजनीति में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान है, जितना अन्य देशों की राजनीति में नहीं है। धर्म में भक्ति, आत्म-मोक्ष का मार्ग हो सकता है, पर राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंततः तानाशाही का एक निश्चित मार्ग है।”
देश की आज़ादी के बाद भारत को संविधान देते समय डाक्टर अम्बेडकर ने हमें एक इशारा किया था। उन्हें शायद लोकतन्त्र का भविष्य दिखता था। वे भारतीयों की मनोविज्ञान बखूबी समझते थे। उनसे बेहतर विश्व में कोई मनोवैज्ञानिक हो ही नहीं सकता। संविधान के जन्म से लेकर अब तक एक शतक से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। सत्ताधारी दल संविधान के अनुच्छेदों का अपनी विचारधारा के अनुरूप सुविधानुसार प्रक्रियाएं अपनाते आ रहे हैं। अब तक की तकरीबन सभी सरकारें संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और निष्पक्षता को नियंत्रित करने की कोशिशें करती आ रही हैं। संवैधानिक अनुच्छेदों की व्याख्याएं भी सरकारें अपने एजेंडा को ध्यान में रखते हुए अपने अनुरूप करती रही हैं।
डाक्टर अम्बेडकर आगे कहते हैं कि, “तीसरी चीज जो हमें करनी है, वह यह है कि राजनीतिक लोकतन्त्र से ही हमें सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। राजनीतिक लोकतन्त्र को सामाजिक लोकतन्त्र बनाना भी जरूरी है। राजनैतिक लोकतंत्र तब तक कायम नहीं रह सकता, जब तक कि उसकी बुनियाद सामाजिक लोकतन्त्र न हो। सामाजिक लोकतन्त्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थ, जीवन में उस मार्ग से है, जो स्वातंत्र्य, समता और बंधुत्व को जीवन की सिद्धांतों के रूप में अभिज्ञान करता है। स्वातंत्र्य, समता और बंधुत्व को पृथक-पृथक नहीं समझना चाहिए। इन तीनों का मिलकर एक संयुक्त रूप बनता है। एक दूसरे से विच्छेद करना लोकतन्त्र के मूल प्रयोजन को ही विफल करना है।”
अब प्रश्न उठता है कि क्या हम स्वातंत्र्य, समता और बंधुत्व को साथ लेकर चल रहे हैं, यदि चल रहे हैं तो ठीक है, लेकिन यदि हम नहीं चल रहे हैं, तो हम आख़िर लोकतन्त्र को कहां ले जा रहे हैं? ऐसे में, क्या हम, कहीं लोकतन्त्र को डुबोने तो नहीं जा रहे हैं? भारतीयों को इस पर गहन विचार करना चाहिए।
डा० अम्बेडकर अपने भाषण में आगे कहते हैं कि,” एक दूसरी वस्तु जिसका हमारे यहां अभाव है, वह बंधुत्व के सिद्धांत का अस्वीकरण है। बंधुत्व से क्या अभिप्राय है? बंधुत्व से अभिप्राय समस्त भारतवासियों की भाई-चारे की भावना से है। यदि भारतवासी सब एक हैं, तो यह वह सिद्धांत है जो सामाजिक जीवन को एकता और दृढ़ता प्रदान करता है। मुझे वह दिन याद है, जब राजनीति में दखल रखने वाले भारतवासी, भारत की जनता, शब्दों पर आक्रोश प्रकट करती थी। वे भारतीय ‘राष्ट्र’ शब्द को अधिक चाहते हैं। मेरी यह सम्मति है कि इस बात पर विश्वास करके कि हमारा भी एक राष्ट्र है, हम अपने आपको एक बड़े मायाजाल में डाल रहे हैं। हजारों जातियों में बंटी हुई जनता भला किस तरह एक राष्ट्र हो सकती है? जितना शीघ्र हम यह अनुभव कर लें, कि अभी हम ‘राष्ट्र’ शब्द के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ में ‘राष्ट्र’ नहीं हैं, उतना ही हमारे लिए हितकर होगा, क्योंकि यह अनुभव कर लेने पर ही हम एक राष्ट बनाने की आवश्यकता का अनुभव करेंगे, तथा इस लक्ष्य को प्राप्त करने के तरीकों और साधनों के बारे में गंभीर विचार करेंगे। इस लक्ष्य की प्राप्ति बहुत कठिन है। संयुक्त राज्य अमेरिका में जितना कठिन थी, उससे कहीं अधिक कठिन है। संयुक्त राज्य अमेरिका में जाति समस्या नहीं थी, भारत में जातियां हैं। ये जातियां राष्ट्रीयता की विरोधी हैं। सर्वप्रथम, इस कारण, कि ये सामाजिक जीवन में प्रार्थक्य प्रकट करती हैं। ये, इस कारण, राष्ट्रीयता की विरोधी हैं, कि परस्पर जातियों में ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न करती हैं। परन्तु, यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र के रूप में होना चाहते हैं, तो हमें इन सब कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना होगा, क्योंकि बंधुत्व तभी सत्य हो सकता है,जब राष्ट्र एक हो। बंधुत्व के बिना समता और स्वातंत्र्य की जड़ उतनी ही गहरी हो सकेगी, जितना रंग की सतह की जड़ हाेती है।”
डा० अम्बेडकर अन्त में कहते हैं कि, “यदि हम इस संविधान का रक्षण करना चाहते हैं, जिसमें हमने जनता के लिए, जनता द्वारा जनता की सरकार के सिद्धान्त की प्रतिस्थापना करने का प्रयास किया है, तो हम इस बात का संकल्प करें कि जो बुराइयां हमारे मार्ग में हैं और जिनके कारण जनता के लिए सरकार को, जनता द्वारा सरकार से अधिक पसंद करती हैं, उन बुराइयों को समझने में विलम्ब न करें और उन बुराइयों को दूर करने के उपक्रम में दौर्बल्य न दिखाएं। देश की सेवा करने का यही मार्ग है, इससे अच्छे मार्ग से मैं परिचित नहीं हूं।”
मौजूदा स्थिति में अलग-अलग तरह का राष्ट्रवाद हमारी राष्ट्रीयता को खत्म करने का प्रयास कर रहा है, यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। इसे हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। विविधता में एकता ही भारत को ‘भारत’ बनाती है, इसका धर्मनिरपेक्ष स्वरूप ही भारत को एक विशिष्ट पहचान देता है।
(विद्या राम ‘कुढ़ावी’)
