तिलक मांझी –(11फरवरी1750–13 जनवरी 1785)–भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम सेनानी तिलका मांझी , जबरा पहाड़िया संथाल थे।तिलका मांझी को टोटम का बताते हुए अन्य लेखकों ने उन्हें
संथाल आदिवासी बताया है।तिलका मांझी के पिता का नाम सुंदर मुर्मू और माता का नाम पाने मुर्मू था।सुन्दरा मुर्मु तिलकपुर गांव के प्रधान (आतू मांझी) थे और तिलका मुर्मु के माता पानो मुर्मू ग्रहणी थी।उनके माता और पिता के नाम से साफ पता चलता है तिलका मांझी संथाल परिवार में जन्मे एक संथाल आदिवासी समुदाय के थे। बिहार के सुल्तानगंज भागलपुर में पहाड़िया जनजाति के लोगों का भी निवास थे तिलका मांझी पहाड़िया जनजाति के लोगों में रहकर पले बड़े थे संथाल लोग वीर भूमि से आज के सिंह भूमि की तरफ निवास करते थे। तिलका मांझी संथालो के बीच काफी लोकप्रिय है उनकी पूजा की जाती है संतालो के बीच लोकगीतों में उनका नाम है और रही बात इतिहास की तो भारत में सदैव उच्च जाति और पैसे वालों के आगे झुकता रहा है, शुरू में संतालों का स्थाई निवास नहीं था स्थाई नहीं होने के कारण संतालों को दूसरे जाति समुदाय के लोगों द्वारा अनेकों स्थानों से भगाया जाता रहा है झारखंड में सर्वप्रथम गिरिडीह जिला (सर दिशोम शिखर दिशोम ) क्षेत्र में प्रवेश किया धीरे-धीरे जनसंख्या और बढ़ने लगे संतालों का क्षेत्र भी बढ़ने लगे लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार संथाल आदिवासी समुदाय के लोग 1770 के अकाल के कारण 1790 के बाद संथाल परगना की तरफ आए और बसे लेकिन संथाल (आगील हापडम कोवा काथा )इतिहास के आधार पर संताल सर्वप्रथम झारखंड के उत्तर पूर्व क्षेत्र तथा वर्तमान बिहार राज्य के दक्षिण क्षेत्र में निवास करते थे अंग्रेज शासन के पहले संथाल अपने को होड़ कहते थे संतालों के लिए संथाल शब्द अंग्रेजों के समय आया है संथाल शब्द का मूल शब्द है सांवता , सांवता का अर्थ होता है साथ-साथ रहना कालांतर में इनका शब्द सांवता से साँवताल, सांवतार ,संताल , सॉतार , संथाल, संताड़ होने लगा। 1790 के अकाल के समय इनका माइग्रेशन आज के संथाल परगना तक हुआ ,हंटर ने लिखा है 1792 से संतालों का नया इतिहास शुरू होता है 1838 तक संताल परगना में संतालों के 40 गांवों के बसने की सूचना
हंटर देते हैं जिनमें उनकी कुल आबादी 3000 थी हंटर ये। भी बताते है
1847 तक मि वार्ड ने 150 गांवों में करीब एक लाख संतालों को बसाया। बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेतादेवी ने तिलका मांझी
के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास शालगिरर डेक की रचना की है।अपने इस उपन्यास में महाश्वेतादेवी ने तिलका मांझी को मुर्मु गौत्र का संताल आदिवासी बताया है।यह उपन्यास हिंदी में शालगिरह की पुकार का नाम से अनुवादित है।और प्रकाशित हुआ है।
हिंदी के उपन्यासकार राकेशकुमरसिंह ने जब की अपने उपन्यास हल पहाड़िया में तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है।तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया जिन्होंने राजमहल झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया इनमें सबसे लोकप्रिय तिलकामांझी है।1785 में तिलकामांझी को भागलपुर में फांसी दे दी गई तिलकामांझी पहाड़िया समुदाय के पहले आदिवासी ने नेता और एक भारतीय मुक्ति सेनानी थे।1784 में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था।
–1780 से 1785 तक आदिवासी विद्रोह का नेतृत्व किया जिसमें भागलपुर के कलेक्टर आगस्टस क्लीवलैंड को घायल कर दिया जिनकी बाद में कैप्टाउन में मृत्यु हो गई ।1785मे तिलका मांझी को भागलपुर में फांसी दे दी गई।
–तिलका मांझी ने ब्रिटिश संसाधनों हड़पने और शोषण का मुकाबला करने के लिए आदिवासियों को एक सशस्त्र बल में इकट्ठा किया।
–1770 मिसानथल क्षेत्र में भयंकर अकल पड़ा और बहुत से लोग भूख से मर गए ।
–तिलका मांझी ने लोगो को बचाने के लिए कंपनी का पैसा लूट कर लोगों में बात दिया तिलका के सम्माननीय भाव से प्रेरित होकर कई अतिरिक्त आदिवासी सदस्य विद्रोह में शामिल हो गए।
_इस लुट से संतालों (संताल हूल) का विद्रोह शुरू हुआ है।वे अंग्रेजों
और उनके चापलूस सहयोगियों पर आक्रमण करते रहे उन्होंने 1771 और 1784 के बीच कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।
–तिलका मांझी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासक अंगस्टस क्वीलैंड पर हमला किया ।
–तिलका मांझी ने उन्हें प्राण घातक रूप से घायल कर दिया इस मुठभेड़ के बाद अंग्रेजों ने तिलाफरे जंगल में तिलका मांझी के संचालन बस को घेर लिया।
–1784 में उन्हें पकड़ लिया गया उन्हें घोड़े की पूंछ से बांध दिया गया और बिहार के भागलपुर में कलेक्टर की हवेली तक घसीटा गया उनका क्षत विक्षत शरीर एक बरगद के पेड़ से लटका दिया गया था।और फांसी दे दी गई।
उनकी खून से सनी लाश देखकर अंग्रेज भी डर गए थे तब अंग्रेजी ने भागलपुर चौराहे पर स्थिति एक बड़े बरगद के पेड़ पर सारे आम फांसी
दे दी।13 जनवरी 1785 को सैकड़ों की भीड़ के सामने जबरा पहाड़िया यानि तिलका मांझी हंसते हंसते फांसी पर झूल गए।बाद में आजादी के हजारों दीवाने आदिवासी लड़कों ने जबरा पहाड़िय की रह पर चलते हुए फांसी पर चढ़ते हुए यह गीत गाया,”हांसी हांसी चढ़वों फांसी।”
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम सेनानी तिलका मांझी
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