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लेख

शिक्षा और पोषण के बीच हैं द्विदिश संबंध (यूनेस्को वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट 2025)

admin
Last updated: अप्रैल 24, 2025 11:02 पूर्वाह्न
By admin 20 Views
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हाल ही में यूनेस्को वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट 2025 ‘शिक्षा और पोषण: अच्छा खाना सीखें’ जारी की गई है। पाठकों को बताता चलूं कि शिक्षा और पोषण पर वैश्विक शिक्षा निगरानी (जीईएम) रिपोर्ट 2025 आधिकारिक तौर पर 26 मार्च 2025 को पेरिस पोषण विकास शिखर सम्मेलन में लॉन्च की गई थी। वास्तव में, यह रिपोर्ट शिक्षा और पोषण के बीच महत्वपूर्ण अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालती है तथा यह दर्शाती है कि शिक्षा कैसे बेहतर पोषण परिणामों का समर्थन कर सकती है और कैसे बेहतर पोषण सीखने को बढ़ा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह रिपोर्ट शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण चुनौतियों और अवसरों को उजागर करती है, और शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए नीतिगत सिफारिशें प्रदान करती है। वास्तव में देखा जाए तो यह एक व्यापक श्रृंखला का हिस्सा है जो यह पता लगाती है कि शिक्षा सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने में कैसे योगदान देती है ? पाठक जानते होंगे कि शिक्षा और पोषण के बीच एक मजबूत संबंध होता है। बच्चों का पोषण अच्छा होगा तो उनका मानसिक और शारीरिक विकास भी अच्छा होगा और अच्छे मानसिक और शारीरिक विकास से शिक्षा भी अच्छी ग्रहण कर सकेगा।यह एक कटु सत्य है कि पोषण की कमी से बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर काफी हद तक असर पड़ता है, जो उनकी शिक्षा पर भी कहीं न कहीं असर डाल सकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि बच्चों का उचित पोषण बच्चों को स्वस्थ जीवन शैली अपनाने के साथ ही साथ उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करती है। अच्छे पोषण से बच्चों की ‘लर्निंग पावर'(अधिगम शक्ति) पर असर पड़ता है। अच्छा पोषण बच्चों के संज्ञानात्मक विकास (कोगनेटिव डेवलपमेंट) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि शिक्षा और पोषण के बीच द्विदिश संबंध पाये जाते हैं और उचित पोषण बच्चों के संज्ञानात्मक विकास और स्कूल के प्रदर्शन को बेहतर बनाता है। बहरहाल,स्कूली शिक्षा में पोषण को महत्व देने से संबंधित यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन रिपोर्ट (जीइएम) बहुत ही चौंकाने वाली है। दरअसल, इस रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि दुनिया के मात्र 60 प्रतिशत देशों के ही स्कूलों में भोजन और पेय पदार्थ संबंधी मानक लागू हैं। आज पूरे विश्व में खाद्य सुरक्षा चुनौतियां(जलवायु परिवर्तन, वैश्विक संघर्ष और अस्थिरता के कारण) लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में पोषणयुक्त भोजन की उपलब्धता शिक्षा के लिए आवश्यक है।रिपोर्ट बताती है कि कुल 187 देशों में से केवल 93 देशों में ही स्कूलों के भोजन और पेय पदार्थों पर कानून, अनिवार्य मानक या मार्गदर्शन हैं। हालांकि, इनमें से केवल 29 प्रतिशत देशों में ही स्कूलों के भीतर खाद्य और पेय पदार्थों के विपणन को प्रतिबंधित करने के उपाय हैं, जबकि 60 फीसदी देशों में ही खाद्य और पेय पदार्थों को नियंत्रित करने वाले स्पष्ट मानक हैं। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि आज दुनिया में बहुत से देशों में शिक्षा पर बहुत कम ही खर्च किया जाता है और वित्त पोषण की भारी कमी है। गौरतलब है कि यूनेस्को द्वारा ‘वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट 2024’ में यह बताया गया था कि 10 में से 4 देश शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 4% से भी कम खर्च करते हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि विश्वभर में 251 मिलियन बच्चे और युवा हैं तथा 2015 से इसमें केवल 1% की कमी आई है। रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया था कि दुनिया में सबसे अधिक स्कूल न जाने वाली आबादी  अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान में है। बहरहाल, यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि हमारे देश में स्कूलों में भोजन, विशेषकर मध्याह्न भोजन योजना(मिड-डे-मील), बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण पोषक और शैक्षिक कार्यक्रम है। यह योजना बच्चों को मुफ्त या कम कीमत पर भोजन उपलब्ध कराती है, जिससे उन्हें शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने और कुपोषण से होने वाले जोखिम को कम करने में मदद मिलती है। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार मध्याह्न भोजन योजना (शिक्षा मंत्रालय के तहत) एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1995 में की गई थी। यह प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये विश्व का सबसे बड़ा विद्यालय भोजन कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में नामांकित I से VIII तक की कक्षाओं में अध्ययन करने वाले छह से चौदह वर्ष की आयु के हर बच्चे को पका हुआ भोजन प्रदान किया जाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021 में इसका नाम बदलकर ‘प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण’ योजना (पीएम पोषण योजना) कर दिया गया और इसमें पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं के बालवाटिका (3–5 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चे) के छात्र भी शामिल हैं। कहना चाहूंगा कि स्कूलों में मिड-डे-मील योजना से बच्चों के पोषण में तो सुधार होता ही है, साथ ही साथ इससे स्कूलों में उपस्थिति को भी कहीं न कहीं बढ़ावा मिलता है।इतना ही नहीं, इस योजना से सामाजिक-आर्थिक असमानता को भी दूर करने में मदद मिली है। हाल फिलहाल जारी रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में यह बताया गया है कि मध्याह्न भोजन योजना से स्कूलों में लड़कियों और वंचित वर्गों की उपस्थिति पर सकारात्मक असर पड़ा है। बहरहाल, स्कूलों में भोजन के प्रावधान पर एक भिन्न सर्वेक्षण से यह पता चलता है कि 72 फीसदी देशों में स्कूल परिसरों में खाद्य पदार्थों के विपणन(विक्रय/व्यापार) पर किसी न किसी तरह की पाबंदी है। इसके अलावा इनमें से 52 फीसदी देशों में स्कूलों के पास खाद्य पदार्थों की बिक्री पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लागू हैं। वास्तव में आज स्कूलों में बच्चों को स्वास्थ्यकर भोजन व दूध जैसे पेय पदार्थ दिए जाने चाहिए और उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाना चाहिए ताकि वे मोटापे के भी शिकार न हो, जैसा कि मोटापा भी आज बच्चों में एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। स्कूली भोजन में विधायी सुधारों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। वास्तव में स्कूली बच्चों को मिड-डे-मील के संदर्भ में आज पोषण संबंधी मानकों पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज जरूरत इस बात की है कि भोजन में उपयोग की जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जाना बहुत जरूरी है। इतना ही नहीं,भोजन को बनाने और परोसने में भी स्वच्छता बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किए जाने की भी आवश्यकता महत्ती है।प्रत्येक बच्चे को पर्याप्त और उनकी उम्र और वजन के अनुसार मात्रा निर्धारित की जानी चाहिए, हालांकि ऐसा करने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, फिर भी इस पर और अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। मिड-डे मील की नियमित निगरानी, भोजन के बारे में नियमित प्रशिक्षण के साथ ही बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों से इस कार्यक्रम के बारे में प्रतिक्रिया प्राप्त करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। बहरहाल , यहां पाठकों को बताता चलूं कि निष्कर्ष के तौर पर रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि स्वास्थ्य, पोषण, कृषि और खाद्य प्रणालियों सहित कई क्षेत्रों में शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से सभी स्तरों पर क्षमता निर्माण की आवश्यकता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम शिक्षा और पोषण के बीच संबंध खोजें जाएं और समग्र दृष्टिकोण को अपनाया जाए। वास्तव में, स्कूल में भोजन के प्रावधान को पोषण शिक्षा, शारीरिक गतिविधि और पाठ्येतर गतिविधियों के साथ एकीकृत किये जाने की आवश्यकता आज बहुत ही महत्ती और आवश्यक है। कहना ग़लत नहीं होगा कि शिक्षा और पोषण को एक साथ मजबूत करके बच्चों का संपूर्ण विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।

 

 
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