आंतरिक सुरक्षा का मजबूत होता घेरा
भारत में दशकों से चल रही माओवाद की समस्या अब खत्म होती नजर आ रही है। केंद्र सरकार ने यह संकल्प लिया है कि 31 मार्च, 2026 तक देश से माओवाद का समूल नाश कर दिया जाएगा। यह घोषणा न केवल सरकार के मजबूत इरादों को दर्शाती है, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए आशा की किरण भी है, जो वर्षों से इस हिंसा के साये में जी रहे हैं। दशकों तक आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के कई जिले माओवाद हिंसा से त्रस्त रहे। इन इलाकों में विकास लगभग ठप पड़ गया था, और भय का माहौल व्याप्त था । सड़कें, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव था, और माओवादी संगठन अक्सर विकास कार्यों में बाधा डालते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़, जो कभी माओवादियों का गढ़ माना जाता था, अब वहां भी विकास की नई किरणें पहुंच रही हैं। इस सकारात्मक बदलाव के पीछे केंद्र और राज्य सरकारों की बहुआयामी रणनीति है। इसमें सुरक्षाबलों द्वारा चलाया जा रहा निरंतर और प्रभावी अभियान शामिल है। आधुनिक हथियारों, बेहतर खुफिया तंत्र और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सुरक्षाबल नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर रहे हैं। सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति भी कारगर साबित हो रही है, जिसके तहत हथियार डालने वाले माओवादियों को समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर प्रदान किया जा रहा है, लेकिन माओवाद का खात्मा केवल बंदूक के बल पर नहीं हो सकता। इसीलिए सुरक्षात्मक कार्रवाई के साथ-साथ विकास कार्यों पर भी जोर दिया जा रहा है। ‘समाधान’ जैसी योजनाओं के तहत प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है, मोबाइल टावर लगाए जा रहे हैं और स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र खोले जा रहे हैं।
माओवाद विकास में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक इन दूरदराज के इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचेंगी, तब तक वहां के नागरिक देश की प्रगति में भागीदार नहीं बन पाएंगे। माओवाद को खत्म करने का लक्ष्य केवल एक राजनीतिक संकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। यह न केवल देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों के जीवन में एक नया सबेरा भी लाएगा, जो दशकों से शांति और विकास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि, यह राह आसान नहीं है। माओवाद की जड़ें दशकों पुरानी सामाजिक-आर्थिक विषमताओं में निहित हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सैन्य कार्रवाई से स्थाई समाधान नहीं मिल सकता। आदिवासी समुदायों के जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों का सम्मान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
