ईरान-इजरायल संघर्ष: अमेरिकी वर्चस्ववाद और ट्रंप की परमाणु नीति पर सवाल
प्रमोद भार्गव के विश्लेषण पर आधारित
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया एक बार फिर भीषण तनाव की चपेट में है। ईरान और इजरायल के बीच लगातार तीव्र हो रहे संघर्ष ने न केवल पूरे क्षेत्र में युद्ध की आशंका को गहरा दिया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति और सुरक्षा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अमेरिका, विशेषकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति, इस स्थिति के लिए काफी हद तक जिम्मेदार मानी जा रही है।
★संघर्ष की पृष्ठभूमि
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 2018 में संयुक्त व्यापक कार्रवाई योजना (JCPOA) से अमेरिका को अलग करने के बाद ईरान और अमेरिका के रिश्ते और तनावपूर्ण हो गए थे। इस ऐतिहासिक समझौते में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने का भरोसा दिया था। बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए थे। लेकिन ट्रंप ने इसे “अमेरिकी झुकाव” बताकर खारिज कर दिया।
★ इजरायल-ईरान टकराव
इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों जैसे नतांज पर हमले किए हैं। ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई में तेल अवीव और अन्य नगरों पर मिसाइल हमले किए गए हैं। अमेरिका ने इस संघर्ष में इजरायल का खुला समर्थन किया है और दो युद्धपोत ईरानी सीमा के नजदीक तैनात कर दिए हैं। ब्रिटेन और फ्रांस ने भी अपनी सैन्य तैयारी बढ़ा दी है, जिससे ईरान पर चौतरफा दबाव बन रहा है।
★परमाणु युद्ध का खतरा
ईरान की परमाणु गतिविधियों पर अब संदेह और भी गहरा गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने पहले यह स्पष्ट किया था कि ईरान सैन्य उद्देश्यों से परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा है, लेकिन अब ईरान ने परमाणु वार्ता स्थगित कर दी है और इजरायल को चेतावनी दी है कि यदि हमला जारी रहा तो वह अमेरिका व यूरोपीय देशों के हितों को नुकसान पहुंचा सकता है।
★ट्रंप की नीतियों पर सवाल
पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप पर आरोप है कि उन्होंने अमेरिकी वर्चस्व को बनाए रखने के नाम पर वैश्विक शांति को दांव पर लगा दिया। उन्होंने न केवल परमाणु समझौते को तोड़ा, बल्कि ईरान को पूरी तरह बर्बाद कर घुटने टेकने को मजबूर करने की रणनीति अपनाई। लेकिन इसके उलट, ईरान ने रूस, चीन और भारत जैसे देशों से संबंध मजबूत कर अपनी स्थिति को और सुदृढ़ किया।
★भारत की भूमिका
भारत के लिए ईरान से तेल खरीदना हमेशा किफायती रहा है। भारत की रिफाइनरियां ईरानी तेल के अनुरूप बनी हैं और भारत रुपए में भुगतान करता है, जिससे लागत कम आती है। लेकिन मौजूदा संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी प्रभाव डाल सकता है।
★क्या कहता है भविष्य?
मध्यपूर्व में बढ़ता यह तनाव दुनिया को एक और महायुद्ध की ओर धकेल सकता है। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की सैन्य नीतियां न केवल क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि वैश्विक संतुलन को भी बिगाड़ रही हैं। सवाल है – क्या विश्व शक्तियां समय रहते समझदारी दिखाकर इस परमाणु संकट को टाल पाएंगी?
★ निष्कर्ष:
डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति और अमेरिकी वर्चस्ववाद की मंशा ने ईरान-इजरायल संघर्ष को परमाणु युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। जरूरत इस बात की है कि वैश्विक नेतृत्व गंभीरता से इस संकट का कूटनीतिक हल खोजे, न कि शक्ति प्रदर्शन की होड़ में मानवता को संकट में डाले।
लेखक परिचय
प्रमोद भार्गव – वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार, जिनके लेख सामाजिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहन दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
