धन्य हूँ मैं
भाग-1
शेक्सपियर ने प्रभु से यह अपील की मुझे दिल कृतज्ञता से सरोबार देवें। हम चाहते हैं कि उऋण बन सकें।वह आगे के लिए भार न रह जाये क्योंकि कर्ज कर्ज ही होता है , चाहे वह रुपये का हो या उपकार का आदि – आदि हो। वह रुपयों का कर्ज उतारना कठिन नहीं हैं पर उपकार की कृतज्ञता करना बड़ा कठिन हैं । वह हर कोई ऐसा दिल नहीं पाता हैं इसीलिए शेक्सपियर ने प्रभु से यह अपील की थी । हम आज है वो किसकी बदौलत हैं ? एक दिन बैठा-बैठा मैं यह सोच रहा था ओर इसी सोच ने मुझे दबोच रहा था कि मैं आज जो कुछ भी हूँ वह किसकी बदौलत हूँ।यह चिन्तन करते करते मुझे अन्तर से उत्तर मिला कि तू आज जो कुछ भी है अपने बूते पर कम माँ-तात के बनाये बना है। हमारा जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता है । वह इसमें सुख और दुख का आना-जाना लगा ही रहता है, जिस प्रकार रात के बाद सुबह होती है, उसी प्रकार दुख के बदल छट जाते है और खुशी के दिन आते हैं । वह रात दुख का प्रतीक है और दिन सुख का हैं । हम देख सकतें हैं कि जिस तरह पानी दो किनारों के बीच बहते हुए आगे बढ़ता है, उसी तरह जीवन में सुख और दुख दो किनारे हैं जीवन इन्ही के बीच चलता हैं । अतः हमें विपदाओं से कठिनाईयो से हार से हताश हुवें बिना,बिना रुके दुगुने उत्साह से अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाते रहना चाहिए, फिर देखें मंजिल (विजय) जीत,सफलता आदि हमारें क़दमो में होगी। हम देख सकतें हैं कि आज के समय में आधुनिकता का दबाव, प्रतिस्पर्धा का
क्रमशः आगे ।
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )
धन्य हूँ मैं
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