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आगराउत्तर प्रदेश

विरासत संरक्षण : ऐंटीक्युटीज ऑफ नार्थ वेर्स्टन प्रोविंस को आधार मानकर प्रयास हों

admin
Last updated: नवम्बर 17, 2025 9:24 अपराह्न
By admin 19 Views
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10 Min Read
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विरासत संरक्षण : ऐंटीक्युटीज ऑफ नार्थ वेर्स्टन प्रोविंस को आधार मानकर प्रयास हों

*– तथ्यों का निर्माण नहीं किया जा सकता , स्थापित तथ्य ही इतिहास का आधार:प्रो इरफ़ान हबीब *

‘इतिहास साक्ष्यों और तथ्यों पर आधारित होता है,इससे अनावश्यक छेड़छाड़ करना समाज के सभी वर्गों को किसी न किसी रूप में असहज करता है’ यह कहना है प्रख्यात इतिहासविद् प्रो इरफ़ान हबीब का।

अलीगढ स्थित अपने निवास पर सिविल सोसायटी आफ आगरा के प्रतिनिधियों (अनिल शर्मा, राजीव सक्सेना और असलम सलीमी) से चर्चा करते हुए कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड कर पेश करवाने की प्रवृत्ति सरकारों में हमेशा रही है। स्थानों के नाम बदलने के कार्य में हो रही बढोत्तरी भी इसी प्रकार का कार्य है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकारों के समय भी स्थानों का नाम बदलने का काम चलता था,लेकिन अब कुछ ज्यादा ही प्रचलन में है।
प्रो हबीब ने कहा कि तथ्यों और साक्ष्यों को अनदेखा कर भारतीय इतिहास की व्याख्या के अनुरूप तथ्यों और तारीखों का आविष्कार करने का दौर चल रहा है।वे कहते हैं कि इतिहासकारों को तथ्यों को स्थापित करके साबित करना चाहिए, वे तथ्यों का निर्माण नहीं कर सकते हैं.’(Historians must prove by establishing facts, they can’t manufacture facts)।
प्रो हबीब ने स्मृतियों को ताजा करते हुए कहा कि भाजपा सरकार, जो 1998 से 2004 तक भाजपा सरकार सत्ता में थी, तब तो तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री तक ,खुद भारतीय इतिहास की व्याख्या के अनुरूप तथ्यों और तारीखों का आविष्कार करते रहे थे। उस दौर पर चर्चा के दौरान श्री मुरली मनोहर जोशी की उस टिप्पणी का भी जिक्र हुआ ,जिसमें एक पुस्तक का विमोचन करते हुए रिलीज की गई पुस्तक पर बोलते हुए कहा था कि यह पुस्तक “हबीब एंड कंपनी”(“Habib & Co”) के इतिहास का खंडन करती है।
प्रो हबीब बताते हैं कि जिन लोगों को इतिहास की समझ है ,उनकी टीका टिप्पणियों को लेकर उन्हे कभी भी गुरेज नहीं रहा लेकिन कम जानकारी और तथ्य गढ़ कर इतिहास से छेड़छाड़ करना किसी भी स्थिति में उपयुक्त नहीं है। वह कहते हैं कि पुरातात्विक महत्व के स्थलों के संरक्षण कार्य में अधिक तत्परता लाई जानी चाहिये, ये हमारे इतिहास का साक्ष्य ही नहीं अपितु उस संस्कृति का अभिन्न भाग हैं,जिस पर आम भारत वासी गर्व करता हैं और देश की विशिष्टता है।

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श्री हबीब कहते हैं कि भारत में इतिहास पर शोध व नई खोजों पर बहुत काम हो चुका है वर्तमान में भी अन्वेषण व्यापक संभावना है किंतु वे तथ्यपरक हों कि न कि गढे हुए ।

*–अलीगढ़ के हेरिटेज स्मारक (Heritage Monument )*

श्री हबीब ने कहा कि अलीगढ़ जनपद में मराठा शासन काल,रियासत कालीन अनेक छोटी- बडी पुरातात्विक महत्व की संरचनाये थीं किन्तु उनमें से अधिकांश असंरक्षित स्थिति में हैं और कुछ तो विलुप्त ही हो चुकी हैं।वह कहते हैं कि मुख्य स्थल के रूप में केवल किले का कुछ भाग और गेट ही बचा रह गया है।कुछ दशक पूर्व तक इन ऐतिहासिक संरचनाओं की स्थिति का आकलन करने पुरातत्व विभाग की टीमें यहां आती रही थीं किंतु अब यह सिलसिला खत्म सा हो गया है।वह कहते हैं कि मराठा शासक महादजी सिंधिया का यहां शासन रहा,जिले का मौजूदा नाम करण भी उसी काल में हुआ।एतिहासिक स्थल के रूप में जो बचाने योग रह गया है उसे जरूर बचाया जाना चाहिये।

*–आगरा :विरासत की भरपूरिता*

श्री हबीब कहते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से आगरा अत्यंत महत्वपूर्ण है।यहां पुरातात्विक महत्व की संपदा है ।पुरा संपदा से भी कहीं महत्वपूर्ण यहां के ऐतिहासिक साक्ष्य ,कोर्टों के वृतांत आदि अभिलेखागारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण पत्रावलियां हैं।मुगलों से और मुगलों के बाद भी कई राजसत्ताओं का आगरा केन्द रहा है।जिनका शासन बडे बडे भूभागों पर रहा है।जो यहां से संबंधित पत्रावलियों,दरबारों के वृतांतों ,किताबों आदि को और भी अधिक महत्वपूर्ण बनाते हैं।
हबीब कहते हैं कि आगरा की पुरातात्विक संपाद का अनुरक्षण एक महत्वपूर्ण दायित्व है,नागरिक सहभागिता से यह अधिक प्रभावी हो सकता है।फुट फाल की दृष्टि से कम महत्व के समझे जाने वाले पुरावशेषों व स्मारकों के प्रति भी जागरूकता बनाये रखना सामायिक जरूरत है।विमर्ष के दौरान वह पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा प्रकाशित ‘Monumental Antiquities of North Western Provinces’ सूचना पुस्तिका का उल्लेख करते हैं। वह बताते हैं कि इसमें तत्कालीन उत्तर पश्चिमी प्रांत (North Western Provinces ) के तहत आने वाले हर छोटे बड़े प्रशासनिक क्षेत्र के पुरा स्मारकों का अत्यंत सटीकता के साथ उल्लेख है,इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिये सौ साल से अधिक पुराना होने के बावजूद ऐसी जानकारियां उल्लेखित है,जिनमें से अधिकांश प्रासंगिक हैं।वह बताते हैं कि इस किताब में संरक्षण योग्य,अन्य,सरकारी नियंत्रण और निजी प्रबंधन आदि श्रेणियों में पूरा स्मारकों का वर्गीकरण है।
प्रो हबीब बताते हैं कि ‘Monumental Antiquities of North Western Provinces’ में सबसे सटीक जानकारियां उन पुरावशेष व भवनों की दी गई है जो कि पुरातत्व महत्व के तो हैं किंतु संरक्षण योग्य हैा। वे कहते हैं कि जो बचे रह गये हैं उनको बचाये रखना जरूरी है। इसका प्रत्यक्ष दायित्व तो ए एस आई और राज्य पुरातत्व विभाग पर ही है किंतु इतिहासकारों,शोधार्थियों और नागरिक समूहों की भी महत्वपूर्ण भूमिका नियोजित करने की अपेक्षा रहती है।

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*–फारसी जानने वालों की कमी*

इरफान हबीब बताते हैं कि भारत के एक बड़े भाग में अंग्रेजी प्रचलन में आने पूर्व के पूर्व तक जो केन्द्रीय सत्तायें रहीं उनकी राजकीय भाषा फारसी रही थी,बंगाल,दक्षिण भारत , महाराष्ट्र सिंध,पंजाब आदि एक बड़े क्षेत्र में इनका प्रशासन तंत्र था।दो दशक पूर्व तक फारसी जानने सहज उपलब्ध थे किंतु अब बहुत ही कम रह गये हैं।जिसके परिणाम स्वरूप इतिहास के शोध कर्ताओं के सामने अन्वेषण और विश्लेषण का काम बहुत ही चुनौतीपूर्ण हो गया है। वह कहते हैं कि जयपुर के शासक राजा जय सिंह,राजकुमार राम सिंह के समय में मुगलों के साथ जो भी मीटिंग व पत्राचार हुआ है,उसका अधिकांश भाग फरसी में ही है।दरअसल जयपुर/आमेर के अधिकांश वकील(मुंशी)फारसी भाषा भाषी थे। –

-ब्रज का इतिहास

इरफान हबीब अलीगढ़ में ,पढे जो कि बृज भूमि का ही अंतरिम भाग है। लेकिन उनके द्वारा मुगलों,प्राचीन भारत से संबंधित इतिहास की किताबें व शोध गंथ ज्यादा प्रचारित हो गये। जब कि उनके द्वारा शोध परक सूचनाओं से भरपूर पुस्तक “मुगल काल में ब्रज भूमि: राज्य, किसान और गोसाईं”( Braj Bhumi in Mughal Times: The State, Peasants and Gosains.) एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक हैं। बंगाली इतिहास विद्र तारापद मुखर्जी के साथ उन्होंने इसका सह-लेखन किया है। यह पुस्तक ब्रज क्षेत्र के मूल दस्तावेजों के संग्रह पर आधारित एक व्यापक अध्ययन है। इसमें क्षेत्र की आर्थिक और नृवंशविज्ञान (नृवंश Ethnography -: एक शोध विधि है जिसमें किसी विशेष समुदाय या समूह के दैनिक जीवन और व्यवहार को गहराई से समझने के लिए उस समूह में खुद को डुबोना शामिल माना जाता है। ) संबंधी रूपरेखा, मुगल प्रशासनिक तंत्र, मंदिरों (विशेषकर गौड़ीय वैष्णवों के) को राज्य संरक्षण, भूमि अधिकार और उस समय (लगभग 1550-1750) की सामाजिक गतिशीलता का विस्तृत विवरण दिया गया है। संभवत: बृज क्षेत्र के सामाजिक अध्ययन में यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है।

*–तेरह मोरी बांध*

सिविल सोसायटी ऑफ़ आगरा के सैकेट्री अनिल शर्मा ने एक जानकारी में बताया कि प्रो इरफ़ान हबीब से अलीगढ आगरा मुलाकात करने का मूल मकसद जलसंकट से जूझते आगरा के ग्रामीण क्षेत्र को तेरह मोरी बांध की उपयोगिता पर विमर्ष करना था।दशकों से उपेक्षित इस जलसंरचना को सिविल सोसायटी आफ आगरा के प्रयास से आर्केलाजी सर्वे ने इसे न केवल विश्वदाय स्मारक फतेहपुर सीकरी का अंतरिम भाग माना हुआ है,अपितु आधिकारिक रूप से यह भी सूचित किया है कि बांध को फंक्शनल बनाये जाने के लिये सिंचाई विभाग को जरूरी कार्य करवाये जाने की अनुमति भी दी हुई है।यहां यह भी उल्लेख करना प्रासंगिक है कि प्रो.हबीब का फतेहपुर सीकरी पर विस्तृत अध्ययन है।2018 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय के स्कालरों के द्वारा ‘Aligarh Society of History and Archaeology [ASHA] ‘ के तत्वावधान तेरह मोरी बांध पर विशेष अध्ययन व सर्वेक्षण कर ‘Chāh ba Chāh: The Technique of Water-lifting at Fatehpur Sikri ‘ के रूप में प्रकाशित किया है।

सिविल सोसाइटी ऑफ़ आगरा के अनिल शर्मा-सचिव, राजीव सक्सेना और असलम सलीमी ने मुलाकात की.

फोटो (आभार असलम सलीमी) . फोटो में -इरफ़ान हबीब , पत्नी सायरा हबीब और सिविल सोसाइटी ऑफ़ आगरा के मेम्बर.

 

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