अमूल्य हैं स्त्री धन…!
स्त्री को चल संपत्ति के रूप में जाने लगा है आँका,
विवाह आर्थिक सौदेबाजी का माध्यम बना ख़ाका।
ससुराल पक्ष ने केवल सुख-सुविधा को ही तलाशा,
एक रंगीन टीवी, मोटरसाइकिल नगद मूल्य आशा।
उपहारों और सामाजिक अपेक्षाओं की लेते हैं आड़,
विधिक परिभाषाओं से फिसल रहीं बनें ‘तिल-ताड़’।
यह मात्र आपराधिक घटनाएँ नहीं, हिंसा का द्योतक,
भारतीय समाज की ‘पितृसत्तात्मक’ संरचना घातक।
विवाह को उपभोक्तावाद ने नैतिक दिशाहीन में ढेला,
स्त्री देह,श्रम व उत्तराधिकार पे न हो वर्चस्व का मेला।
विवाह में स्त्री की समानता के भाव को चिन्हित करों,
स्त्री धन अमूल्य हैं-माँ, बहन, बेटी सम्मान ध्यान धरों।
(संदर्भ-सुप्रीम कोर्ट की नवविवाहिता की मृत्यु पर टिप्पणी)
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
