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परियोजनाओं को समय पर पूरा करने हेतु सक्रिय एवं कारगर निगरानी

admin
Last updated: जनवरी 14, 2026 7:03 अपराह्न
By admin
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12 Min Read
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*परियोजनाओं को समय पर पूरा करने हेतु सक्रिय एवं कारगर निगरानी*

*-श्री अल्केश कुमार शर्मा*

बुनियादी ढांचा क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के मुख्य वाहकों में से एक है। गुणवत्तापूर्ण
बुनियादी ढांचा बेहतर सेवाओं के लिए निरंतर मांग पैदा करता है। यह क्षेत्र भारत के समग्र
विकास को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है और पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत की
विभिन्न परियोजनाओं के तेज विकास का एक आधार रहा है। सरकार पूरी प्राथमिकता के
साथ इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान दे रही है। यह तथ्य इस वर्ष 11.1 लाख करोड़ रुपये के
बजटीय आवंटन और देश में समय पर विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण सुनिश्चित
करने वाली नीतियों की शुरुआत से स्पष्ट होता है। “मेक इन इंडिया”, आत्मनिर्भर भारत,
पीएम गतिशक्ति, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लचीले नियमों और तकनीकी उन्नति
जैसी अनुकूल नीतिगत पहलों के साथ, इस क्षेत्र के और भी तेजी से विकसित होने की
उम्मीद है।

केरल और भारत सरकार में विभिन्न भूमिकाओं में तीस वर्षों से अधिक समय तक
परियोजना कार्यान्वयन से जुड़े रहने और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई परियोजनाओं को
संभालने के दौरान, मैंने विभिन्न क्षेत्रों में परियोजनाओं के कार्यान्वयन में आने वाली
विभिन्न बाधाओं का सामना किया है। परियोजनाओं के कार्यान्वयन के दौरान सामने आने
वाली कुछ प्रमुख चुनौतियों में भूमि अधिग्रहण और नियामक संबंधी मंजूरियों से जुड़ी
अनिश्चितताएं, व्यापक प्रारंभिक योजना एवं जोखिम प्रबंधन का अभाव और सबसे महत्वपूर्ण
बात, ऐसे कारकों के लिए पर्याप्त योजना बनाने हेतु परियोजना प्रबंधन प्रक्रियाओं की
अपरिपक्वता शामिल हैं।

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परियोजनाओं के समय पर पूरा होने में बाधा डालने वाली अन्य समस्याओं में कच्चे माल की
अनुपलब्धता, कुशल श्रमिकों (राजमिस्त्री, बढ़ई आदि) की अनुपलब्धता, पानी एवं बिजली की
आपूर्ति का अभाव, अपूर्ण आरेख (ड्राइंग) उपलब्ध होना और डिजाइन में बार-बार होने वाले
बदलाव शामिल हैं। स्थानीय समस्याओं और उचित परियोजना नियोजन एवं नियंत्रण के
अभाव के कारण परियोजनाओं के पूरा होने में देरी होती है और इससे अर्थव्यवस्था पर समग्र
रूप से नकारात्मक असर पड़ता है।

बुनियादी ढांचे की बड़ी परियोजनाएं जटिल होती हैं तथा इनमें कई राज्यों, कई क्षेत्रों एवं कई
एजेंसियों की भागीदारी होती है और इसके लिए विभिन्न केन्द्रीय व राज्य एजेंसियों से कई
बार मंजूरी लेनी पड़ती है। इसलिए समय की देरी और लागत में वृद्धि आम बात है।
यूं तो विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा परियोजनाओं के कार्यान्वयन की अलग-अलग
पद्धतियां और निगरानी तंत्र अपनाए गए, लेकिन वे एक-दूसरे से अलग-अलग काम करते
लगे और उनके एवं राज्य सरकारों के बीच कोई कारगर समन्वय नहीं था।

मार्च 2015 में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक आईसीटी-आधारित मल्टी-मॉडल प्लेटफॉर्म ‘प्रो-
एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन' (प्रगति) का शुभारंभ किया। इसका उद्देश्य
राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में होने वाली देरी को खत्म करने और आम आदमी की
शिकायतों को दूर करने के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों और
राज्य सरकारों द्वारा इंगित की गई परियोजनाओं की निगरानी करना भी था। प्रधानमंत्री ने
‘प्रगति’ को केन्द्र – केन्द्र और केन्द्र-राज्य समन्वय को बेहतर बनाने के एक व्यापक
समाधान के रूप में तैयार किया। इसके शुभारंभ के समय उन्होंने कहा कि भारत में शासन
को और अधिक कुशल एवं जवाबदेह बनना होगा तथा यह नया प्लेटफॉर्म उसी दिशा में एक
कदम है। ‘प्रगति’ को तकनीक-आधारित एक ऐसी प्रणाली के रूप में विकसित किया गया, जो
बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं की निगरानी करने, सरकारी योजनाओं की समीक्षा करने और
एक ही डिजिटल धरातल पर नागरिकों की शिकायतों का आकलन करने में सक्षम है।

शुरू से ही, ‘प्रगति’ के तंत्र ने विभिन केन्द्रीय मंत्रालयों व राज्य सरकारों के सक्रिय सहयोग
से परियोजनाओं की निगरानी और शिकायतों के निवारण के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म का
इस्तेमाल किया है। अब तक प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 50 समीक्षा बैठकें हो चुकी हैं। इन
बैठकों में विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिव और केन्द्रीय विभागों के सचिव खास परियोजनाओं
तथा योजनाओं में आने वाली समस्याओं एवं बाधाओं को दूर करने के उद्देश्य से शामिल
होते हैं। यह प्लेटफॉर्म एक आगे बढ़ने वाले फोरम के तौर पर भी काम करता है, जहां
नियमित समस्याओं से मंत्रालय स्तर पर निपटा जाता है, जबकि जटिल मामलों को अंतिम
समाधान के लिए प्रधानमंत्री के सामने रखा जाता है। सरकार ने 500 करोड़ रुपये से अधिक
लागत वाली परियोजनाओं के कार्यान्वयन की नियमित निगरानी हेतु एक परियोजना
निगरानी प्रणाली और प्रधानमंत्री कार्यालय में एक परियोजना निगरानी समूह भी बनाया है,
ताकि उन परियोजनाओं की समीक्षा और पहचान की जा सके जिन्हें ‘प्रगति’ के तहत लिया
जाना है। मैं दोनों से ही जुड़ा रहा। बैठक के बाद फॉलो-अप कैबिनेट सचिवालय द्वारा
सुनिश्चित किया जाता है ताकि ‘प्रगति’ की बैठकों में लिए गए फैसले धरातल पर समय पर
उतर सकें।

इसके शुभारंभ होने के एक दशक से अधिक समय में, 85 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित
लागत वाली 3300 से अधिक परियोजनाओं की निगरानी की गई है और उन्हें सफलतापूर्वक
पूरा करने हेतु कामकाज में तेजी लाई गई है। ‘एक देश, एक राशन कार्ड’, प्रधानमंत्री आवास
योजना, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसी 61 प्रमुख सरकारी
योजनाओं की समीक्षा इस प्लेटफॉर्म पर की गई है। बैंकिंग एवं बीमा, रियल एस्टेट रेगुलेटरी
अथॉरिटी (रेरा) और कोविड से संबंधित मामलों सहित 36 क्षेत्रों में शिकायतों का मूल्यांकन
भी इस प्रणाली के जरिए किया गया है। ‘प्रगति’ और पीएमजी पोर्टल पर उठाए गए लगभग
7700 मुद्दों में से, 7100 से अधिक मुद्दे पहले ही हल किए जा चुके हैं। यह समाधान की
92 प्रतिशत से अधिक की दर को दर्शाता है। प्रधानमंत्री द्वारा व्यक्तिगत रूप से समीक्षा की
गई ‘प्रगति’ की परियोजनाओं में, 3187 मुद्दे उठाए गए और 2958 हल किए गए। इसका

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सीधा मतलब यह हुआ कि कामकाज के हर दिन एक मुद्दा हल किया गया। ये आंकड़े यह
दर्शाते हैं कि कैसे इस प्लेटफॉर्म ने सरकारी कामकाज के कार्यान्वयन में तेजी लाई है और
जवाबदेही को मजबूत किया है।

सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रम को समय पर पूरा करने में ‘प्रगति’ की भूमिका से संबंधित कुछ
खास उपलब्धियों में मिशन अमृत सरोवर शामिल है। इस मिशन का शुभारंभ 2022 में देश
भर के हर जिले में 75 जल निकाय बनाने और उन्हें पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से किया
गया था। प्रत्येक अमृत सरोवर को कम से कम एक एकड़ के तालाब क्षेत्र और लगभग
10,000 घनमीटर पानी रखने की क्षमता के हिसाब से डिजाइन किया गया है। इस मिशन
की उन्नति की नियमित समीक्षा ‘प्रगति’ के जरिए राष्ट्रीय पर की गई और इस प्रक्रिया में
विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों के वरिष्ठ अधिकारियों को एक
ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया गया। इस संयुक्त निगरानी से तेजी से फैसले लेने और
जमीन की उपलब्धता एवं धनराशि जारी करने से जुड़ी बाधाओं को कारगर ढंग से हल करने
में मदद मिली। इस योजना के तहत 15 अगस्त 2023 तक 50,000 अमृत सरोवर बनाने
का लक्ष्य था। हालांकि, ‘प्रगति’ के हतक्षेप से काम में नई सिरे से तेजी आई और अब तक
देश भर में 68,800 से अधिक अमृत सरोवरों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इस मिशन
ने पानी की किल्लत को दूर करने और कई इलाकों में सतह एवं भूजल, दोनों की उपलब्धता
को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

रेलवे से जुड़ी परियोजनाएं बुनियादी ढांचे पर ‘प्रगति’ के असर का एक और ठोस उदाहरण
पेश करती हैं। जम्मू-उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना को 31 मार्च 1994 को
मंजूरी दी गई थी। जून 2015 तक इसकी वास्तविक प्रगति मात्र 40 प्रतिशत थी। 24 जून
2015, 06 नवंबर 2019 और 30 दिसंबर 2020 को ‘प्रगति’ के तहत समीक्षा के जरिए
इसकी प्रगति 40 से बढ़कर 60 और फिर 76 प्रतिशत हो गई। इस मार्ग पर आखिरकार 06
जून 2025 को आवागमन शुरू हो गया। इसमें 272 किलोमीटर की लंबाई में 38 सुरंगें हैं,

जिनकी कुल लंबाई लगभग 119 किलोमीटर हैं और 943 पुल हैं, जिसमें दुनिया का सबसे
ऊंचा रेलवे आर्क ब्रिज भी शामिल है, जो नदी से 359 मीटर ऊपर स्थित है। ब्रह्मपुत्र नदी
पर बोगीबील रेल-सह-रोड पुल के मामले में भी कुछ ऐसा ही असर देखा गया। इस
परियोजना को मार्च 1997 में मंज़ूरी दी गई थी और 27 मई 2015 तक 64 प्रतिशत काम
पूरा हो पाया था और ‘प्रगति’ की देखरेख के बाद 25 दिसंबर 2018 को इसपर आवागमन
शुरू हो गया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि तकनीक आधारित समन्वय कैसे रेल से जुड़े बुनियादी
ढांचे को तेजी से आगे बढ़ा सकता है और नागरिकों को निर्धारित समय से बहुत पहले
आधुनिक सेवाएं मुहैया करा सकता है।

‘प्रगति’ के पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच एक ऐसे शासन का निर्माण करना है जो
नागरिकों की उम्मीदों एवं आकांक्षाओं के अनुरूप गति से काम करे। यह प्लेटफॉर्म पीएम
गतिशक्ति और ‘परिवेश’ जैसी प्रणालियों के साथ एकीकृत है, जो सच्चाई के एक ही स्रोत से
आसान निगरानी की सुविधा देता है। इस सोच के स्वाभाविक नतीजों के तौर पर लागत में
कमी, आसान डिजिटल निगरानी और विवादों को तेजी से सुलझाने जैसे लाभ सामने आए हैं।
जब देरी रोकी जाती है, तो खर्च कम होता है और परियोजनाओं पर नजर रखना एवं उनका
पर्यवेक्षण करना आसान हो जाता है। यह सब दर्शाता है कि जब फैसले समय पर लिए जाते
हैं और जवाबदेही तय होती है, तो सरकारी कामकाज की गति बढ़ती है और इसका असर
सीधे नागरिकों के जीवन में दिखाई देता है। ‘प्रगति’ विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों में विभागों
के बीच की बाधाओं को तोड़कर और टीम इंडिया की भावना को मजबूत करके इस दृष्टिकोण
को साकार करता है।

जैसे-जैसे भारत बड़ी परियोजनाओं के लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ता जा रहा है, ‘प्रगति’ विभिन्न
परियोजनाओं के प्रशासन और उनके समयबद्ध कार्यान्वयन की एक मुख्य संस्था बन गई
है। इसने यह दर्शाया है कि तकनीक से होने वाली समीक्षाएं महज मॉनिटरिंग स्क्रीन तक ही
सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे धरातल पर असली बदलाव लाती हैं। अब तक हुई 50 बैठकें इस

दृष्टिकोण और सर्वोच्च स्तर पर प्रतिबद्धता की निरंतरता को दर्शाती हैं। मिशन अमृत
सरोवर, बड़े रेलवे पुल, विशाल विद्युत परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यक्रम यह
दर्शाते हैं कि सक्रिय निगरानी से नतीजे कई गुना बढ़ सकते हैं। इसलिए ‘प्रगति’ एक ऐसे
आदर्श के रूप में सामने है, जहां संवैधानिक पद आसान निगरानी, कारगर समन्वय,
पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ सार्वजनिक सेवा एवं विकास के प्रति पूरी तरह समर्पित
रहते हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर देश भर के सार्वजनिक कार्यालयों तक यह बदलाव तब
सही मायने में सफल होता है, जब हर नागरिक के कल्याण के प्रति स्पष्ट समर्पण दिखाते
हुए ‘प्रगति’ जैसी उपलब्धियां सार्वजनिक परियोजनाओं और नागरिक-केन्द्रित कार्यक्रमों को
“सरलीकरण हेतु सुधार, नतीजे हेतु प्रदर्शन, असर डालने हेतु बदलाव” की प्रक्रिया में मदद
करती हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं
(लेखक पीईएसबी के सदस्य तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के भूतपूर्व सचिव हैं)

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