30 जून : संताल विद्रोह
हुल दिवस पर विशेष रिपोर्ट
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*संताल हुल के नायक सिदो कान्हू के सपने और वर्तमान सामाजिक राजनीतिक संकट*
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*- अशोक सिंह*
इतिहास गवाह है कि संताल हुल के नायक सिदो कान्हू ने कभी ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ का सपना देखा था। वह सपना सिर्फ सिदो कान्हू का सपना नहीं था, बल्कि संताल हुल से जुड़े उन हजारों-लाखों आदिवासियों का सपना था, जो उनके साथ 1855 के संताल विद्रोह में अपने हक अधिकार और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हो गये लेकिन अफसोस कि आजादी तो आजादी झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद भी वह सपना अब तक पूरा नहीं हुआ। अमर शहीद सिदो कान्हू का वह सपना आईने की तरह टूटकर इस कदर बिखर गया जिसमें बैचेन और हताश आदिवासी समाज आज अपनी अस्मिता और विकास का चेहरा ढूंढ़ता फिर रहा है।
अब जहाँ तक बात सिदो कान्हू के उस सपने के टूटकर बिखरने और उसके पीछे की सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों की है तो जैसाकि सर्वविदित है कि झारखंड की जनता जन राजनीति के लिए हर बार आवाज उठाती रही है। खासकर विकास के सवाल को लेेकर उसने वर्तमान सामाजिक विसंगतियाँ व राजनीति के तौर तरीकों के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया है और स्वशासन के माध्यम से उसने बताया है कि जनतंत्र का वास्तविक अर्थ जनता की वह सत्ता है जो कि गरीब से गरीब को निर्णय करने का अधिकार देती है। इस अधिकार से ही जुड़ा है संसाधनों पर हक की मांग। झारखण्ड के लोग महसूस करते हैं कि उनका खराब वक्त तभी से आया जब से संसाधनों पर से हक छीन लिया गया। संसाधनों पर से हक का छीन जाना एक राजनीतिक कार्रवाई थी, जिसे शासकों ने यहाँ के लोगों की प्रतिरोध चेतना को कुंद करने के लिए किया। शासक मानते थे कि झारखण्ड को लड़कर नहीं जीता जा सकता लेकिन राहतों का भ्रम पैदा कर यहां हुकूमत किया जा सकता है। अंग्रेजों ने पूरी चालाकी के साथ अपना यह इरादा अपनाया और कामयाब हुए। आजादी के बाद के शासकों ने झारखंड स्वयत्तता की मांग को देखते हुए ऐसा ही खेल, खेला और झारखण्ड की स्थापना के बाद भी यहां की जनता को न केवल कमजोर किया बल्कि उनकी एकता को भी तोड़ने का षड्यंत्र किया और सफलता भी पाई। देखा जा सकता है कि झारखण्ड में ऐसे कानून बनाए गए जो यहां की प्रकृति और सांस्कृतिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते और विकास के नाम पर विस्थापन का आतंक पैदा कर दिया गया। झारखण्ड की जनता को बचाव के संघर्ष में उलझा दिया गया। झारखण्ड के वास्तविक इतिहास की रचना के बीच आत्मविश्वास कमजोर हुआ।
झारखण्ड की जनता के साथ यह खेल संताल हुल और बिरसा उलगुलान के बाद से ही किया जाता रहा। लेकिन हर बार यह देखा गया है कि जनता अपने बीच से नए इतिहास प्रतीकों को खोज लेती है और संघर्ष को तेज कर देती है। आजादी के संघर्ष के समय ही जब आदिवासी पहचान का सवाल उठाया गया तो उनकी कम आलोचना नहीं हुई। यहां तक कहा गया कि इससे अंग्रेज ही मजबूत हो रहे हैं। वास्तव में पहचान के सवाल को पूरी गंभीरता के साथ देखने समझने का नजरिया ही विकसित नहीं हुआ था लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी यह आंदोलन कमजोर नहीं हुआ और झारखंड की जनता ने न केवल अपनी पहचान के सवाल को महत्वपूर्ण बना दिया बल्कि आजादी मिलने तक यह सवाल देश के ऐजेंडा का हिस्सा बन गया। संविधान सभा ने इस बात को स्वीकार किया कि आदिवायियों के सवाल कुछ अलग हैं और उनके विकास के लिए खास व्यवस्था की जरूरत है। यह भी कहा गया कि आदिवासी प्रशासन की परंपराओं को नकारा नहीं जा सकता। इन स्वीकृतियों के बाद भी आदिवासियों को उनका वास्तविक हक नहीं मिला। उनकी आकांक्षा के साथ इंसाफ नहीं किया जा सका और आदिवासी विकास को विनाशकारी परिणामों की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया। विकास की नीति परंपरागत जरूरतों के अनुरूप नहीं बनाए गए। आदिवासियों को उस बाजार के हवाले कर दिया गया, जिसका आधार ही मोल तोल है। जबकि यह तो सब जानते हैं कि आदिवासी परंपरा और उनके जीवन व्यवहार में मोल तोल का कोई स्थान नहीं है। जब से नई आर्थिक नीति आई है बाजार का हमलावर रूख आदिवासी समाज पर है। आदिवासियों की विरासतों के साथ ज्यादा खेल किया जा रहा है और यह बताने की कोशिश की जा रही है कि आदिवासी समाज अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता। आदिवासी क्षेत्र के संसाधनों को लूटने की नीयत से इतिहास के मिथकों की रचना की जा रही है और आदिवासियों की सामाजिकता को व्यक्तिवाद में बदलने की साजिश की जा रही है। आदिवासी जिस तरह जंगल और जमीन के बिना खानाबदोश हो जाते हैं उसी तरह वह अपने ऐतिहासिक प्रतीकों से कट कर सदा के लिए खत्म हो जाता है । दुनिया के कुछ कथित विकसित देशों में यह देखा जा सकता है। यही कारण है कि आज का आदिवासी समाज अपनी परंपरा को ज्यादा याद करता है और उन हमलों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहता है, जिसने उसकी सामूहिकता को ही नष्ट कर दिया है या करने का तरीका ईजाद कर दिया है। आदिवासी जन राजनीति की बुनियाद उस जनतंत्र की स्थापना है, जिसमें व्यक्ति से ज्यादा समूह का स्थान होगा। इसे स्थापित करने के लिए आदिवासियों को अपनी उस इतिहास चेतना को फिर से स्थापित करना होगा जो कि उपनिवेशकालीन और बाद में आंतरिक उपनिवेशवादी संस्कृतिकरण के शिकार हो गए हैं।
आदिवासी समाज के विकास और राजनीति के सामने अनेक गंभीर सवाल हैं झारखण्ड की अब तक की विविधता को उसे बचाना है तो दूसरी और उसे यह भी साबित करना है कि आज की नैतिकता की तुलना में उनकी सामाजिक नैतिकता कहीं ज्यादा कारगर है, जिससे आज की चुनौती का सामना किया जा सकता है। झारखण्ड के सामने यह भी चुनौती है कि आज की बाजार अर्थव्यवस्था के फांस को वह तोड़ दे और एक ऐसी नीति का निर्माण करे जिससे जनता की ताकत और निर्णयकारी प्रवृति स्पष्ट दिखे। समानता की अपनी विरासत पर आदिवासी समाज गर्व कर सकता है लेकिन उसे आज के अनुकूल ऐसी समानता की भी स्थापना करनी है जिसमें स्त्रियाँ अपने अधिकारों के साथ समाज और सत्ता का संचालन कर सके। आदिवासी इतिहास के यही सबक है और इन्हें कारगर हथियार बना कर ही झारखण्डी चेतना की बात को स्थापित किया जा सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है कि हर किस्म के राजनीतिक दल बिना झारखंड की बात किए इस क्षेत्र में सफल नहीं हो सकते। उन लोगों ने इस राग को अलापना भी शुरू कर दिया है। लेकिन जनता ही बता सकती है कि झारखण्ड का सवाल केवल राजनीतिक सौदाबाजी नहीं बल्कि जीवन पद्धति है और इसे अपनाने के लिए दलों को अपना एजेंडा भी बदलना होेगा।
लोकतंत्र का वर्तमान ढांचा जनप्रतिनिधि पर जन नियंत्रण का कोई भी तरीका विकसित नहीं कर पाया और इस कारण जनता के प्रति जो जिम्मेदारी राजनीतिक दलो में होनी चाहिए वह नहीं दिखती है। इसलिए झारखण्ड में भी सांप्रदायिकता का जादू चल जाता है। जबकि हर कोई यह स्वभाव जीता है कि झारखण्ड का मतलब ही है मेल जोल है और प्रकृति अराधना की इस धरती पर सांप्रदायिकता की राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं है। यह सच्चाई है कि आजादी के बाद आकर बसे हुए लोगों ने सांप्रदायिकता की राजनीति को यहां स्थापित करने का प्रयास किया और इसमें स्थानीय जनों को भी शामिल कर लिया लेकिन स्थानीय लोगों की इस भागीदारी के पहले उनकी सांस्कृतिक विरासतों के बारे में गलत मिथक बनाए गए। उसके आधार पर सांस्कृतिक खासियत के सवाल को गौण कर दिया गया। यह काम करने वाले लोगों ने इतिहास की आदिवासी अवधारणा के साथ पूरा खिलवाड़ किया और आदिवासी पहचान के सवाल को भी गौण किया। ऐसा किए बिना ऐसा खिलवाड़ संभव ही नहीं था। लेकिन आदिवासी जनता ने इस भ्रम को जल्द ही पहचानने का काम किया। खास कर विस्थापन विरोधी आंदोलनों ने आदिवासी चेतना की परंपरा को कुंद होने से बचाने का काम किया और उन्हें अपने को बचाए रखने के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा से भी भर दिया।
कुल मिलाकर आदिवासी समाज को लेकर बाहर की दुनिया के भी भ्रम टूटे हैं और एक बड़ी बात यह हुई है कि ऐसे ही समूहों की ओर से बात की जाने लगी है कि वर्तमान समस्याओं से देश और समाज ही नहीं दुनिया को केवल आदिवासी परंपरा ही बचा सकती है। जब यह बात की जाती हैं तब आदिवासियों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि ज्यादातर मौखिक परंपरा और इतिहास चेतना के कारण यह खतरा बना ही रहता है कि आदिवासियों की वास्तविक चेतना को बाह्य तत्व अपने अनुकूल बना ले सकते हैं या ऐसी व्याख्या कर सकते हैं जिससे संस्कृति का मूल स्वरूप ही प्रभावित हो जाए। शोषण करने का यह भी एक तरीका है कि समाज अपने में ही दिग्भ्रम का शिकार हो जाए।
ऐसे में संताल हुल के नायक सिदो कान्हू के सपने को साकार कर संताल परगना ही नहीं सम्पूर्ण झारखण्ड के संतुलित विकास के लिए आदिवासी समाज को जागना होगा ताकि उनके इतिहास के साथ कोई भी खिलवाड़ नहीं किया जा सके। आदिवासी परंपरा के बारे में भी कुछ थोपा नहीं जा सके। गौरतलब है कि अंग्रेज इतिहासकारों ने तो आदिवासी इतिहास की बुनियाद को ही बदल दिया है और मानव शास्त्रियों के अध्ययन में भी देशज बोध का अभाव है। ऐसे हालात में केवल मौखिक परंपरा के आधार पर ही आदिवासी जनतंत्र की निरंतरता को समझा जा सकता है और इंसाफ-पसंद नई दुनिया में यात्रा की जा सकती है। बार-बार यह बात दुहराना होगा कि आदिवासियों के प्रतिरोध आंदोलन केवल क्षणिक विद्रोह नहीं थे बल्कि उसमें परंपरा के आधार पर अपनी स्वयत्तता को बहाल करने का इरादा था। यह इरादा इतना मजबूत था कि तमाम बौद्धिक हमलों के बाद भी आदिवासी स्वाभिमान को पूरी तरह कुचला नहीं जा सका। आदिवासी सामूहिकता ही नहीं स्त्री-पुरूष समानता को भी खत्म नहीं किया जा सका। आदिवासी समाज ने पूरी ताकत के साथ अपने को सामंतवादी होने से बचाया और वह बराबरी वाले समाजतंत्र के लिए आज भी संघर्ष कर रहा है।
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