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Gate way to hell: जिसकी आग बुझने का नाम नहीं ले रही, क्यों लोग जाना चाहते हैं यहां

Admin
Last updated: जनवरी 10, 2022 3:34 पूर्वाह्न
By Admin 15 Views
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7 Min Read
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काराकुम। दुनिया अजीबो-गरीब रहस्यों से भरी पड़ी है। लोग स्वर्ग और नरक के बारे में जब बात करते हैं तो सभी स्वर्ग को ही पसंद करते हैं। लेकिन दुनिया के लिए  ‘नरक का दरवाज़ा’ यानी ‘गेटवे टू हेल’ (Gate way to hell) आज भी सबसे आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan) में स्थित एक रहस्यमयी जगह पर नरक का दरवाजा स्थित है। यहां कभी न बुझने वाली भयंकर आग, लोगों को आकर्षित करती है। हर साल हजारों की संख्या में लोग पिछले कुछ सालों से यहां पहुंच रहे हैं। हालांकि, तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति ने देश में ‘नरक का दरवाज़ा’ यानी ‘गेटवे टू हेल’ को बुझाने का आदेश दिया है।

क्या है नरक का दरवाजा?

तुर्कमेनिस्तान के उत्तर में एक बड़ा-सा गड्ढा है जिसे ‘गेट्स ऑफ़ हेल’ यानी ‘नरक का दरवाज़ा’ कहा जाता है। तुर्कमेनिस्तान के 70% हिस्से में काराकुम रेगिस्तान (Karakum Desert) है। 3.5 लाख वर्ग किलोमीटर के इस रेगिस्तान के उत्तर की तरफ गेट क्रेटर नाम का बड़ा-सा गड्ढा है। 69 मीटर चौड़े और 30 मीटर गहरे इस गड्ढे में बीते कई दशकों से आग धधक रही है, लेकिन इसका कारण कोई ‘शैतान’ नहीं बल्कि इससे निकलने वाली प्राकृतिक गैस (मीथेन) है।

कैसे और कब बना यह नरक का दरवाजा?

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लोगों का कहना है कि साल 1971 में सोवियत संघ (Soviet Union) के भू-वैज्ञानिक काराकुम के रेगिस्तान में कच्चे तेल के भंडार की खोज कर रहे थे। यहां एक जगह पर उन्हें प्राकृतिक गैस के भंडार मिले, लेकिन खोज के दौरान वहां की ज़मीन धंस गई और वहां तीन बड़े-बड़े गड्ढे बन गए। इस गड्ढों से मीथेन के रिसने का ख़तरा था जो वायुमंडल में घुल सकता था। एक थ्योरी के अनुसार इसे रोकने के लिए भू-वैज्ञानिकों ने उनमें से एक गड्ढे में आग लगा दी। उनका मानना था कि कुछ सप्ताह में मीथेन ख़त्म हो जाएगी और आग अपने आप बुझ जाएगी। लेकिन यहां आग लगाने वाली या इस पूरी कहानी के कोई अधिकारिक साक्ष्य नहीं हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि ये विशाल गड्ढा वास्तव में 1960 के दशक में बना था लेकिन 1980 के दशक में ही इसमें आग लगी। हालांकि, इस दावे के भी पुख्ता सबूत नहीं हैं।

इतिहासकारों का यह है तर्क?

इतिहासकार जेरोनिम पेरोविक कहते हैं कि ‘नरक के दरवाज़े’ को लेकर जो रहस्य हैं वो बिल्कुल तार्किक हैं। सोवियत संघ के दौर में केवल उन अभियानों की जानकारी सार्वजनिक की जाती थी जो सफल रहते थे लेकिन नाकाम अभियानों के बारे में बताया नहीं जाता था। उस दौर में सोवियत संघ के पास प्राकृतिक गैस या ईंधन की कोई कमी नहीं थी, वो हर साल सात लाख क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का उत्पादन करता था। ऐसे में ये संभव है कि गैस को जला देना उनके लिए व्यावहारिक विकल्प रहा होगा।
वो कहते हैं, “स्विट्ज़रलैंड जैसा देश हर साल 15 हज़ार से 16 हज़ार क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करता था, लेकिन इसका चार गुना जला कर नष्ट कर देना सोवियत के लिए बड़ी बात नहीं थी। इसके लिए तर्कसंगत रूप से ये सोचने की बजाय कि इसे पाइपलाइन में डाल कर दूसरी जगह ले जाया जाए, उन्होंने इसे जलाने का फ़ैसला किया होगा। प्राकृतिक गैस को दूसरी जगह ले जाने के लिए उन्हें यहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य करना होता।

कोरोनिस के खोजी दल में शामिल रहे माइक्रोबायोलॉजिस्ट स्टीफ़न ग्रीन कहते हैं कि मीथेन को अनियंत्रित तरीके से पर्यावरण में घुलने देना ग़लत विचार है और इसे जला देने के फ़ैसले को समझा जा सकता है। ये बेहद ख़तरनाक हो सकता था. क्योंकि जब तक आग लगी रहेगी मीथेन एक जगह पर जमा नहीं होगी, नहीं तो इसमें वक्त-वक्त पर बड़ा धमाका होने का ख़तरा बना रहता।

कार्बन डाईऑक्साइड से अधिक खतरनाक मीथेन

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वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड गैस छोड़ना हानिकारिक है लेकिन वातावरण में मीथेन गैस छोड़ना उसके मुक़ाबले अधिक हानिकारक है। इराक़, ईरान और अमेरिका जैसे कई देश भी इसे वातावरण में छोड़ने की बजाय इसे जला देते हैं।

राष्ट्रपति ने दिया बुझान का आदेश

राष्ट्रपति गुरबांगुली बर्डीमुखामेदोव चाहते हैं कि इसे पर्यावरण और स्वास्थ्य कारणों के साथ-साथ गैस निर्यात बढ़ाने के प्रयासों के रूप देखा जाए। एक संदेश में राष्ट्रपति गुरबांगुली ने कहा, “हम महत्वपूर्ण प्रकृतिक संसाधन खोते जा रहे हैं जिनसे हमें बड़ा लाभ हो सकता था। हम इसका इस्तेमाल अपने लोगों के जीवन को बेहतर करने के लिए कर सकते थे। उन्होंने अधिकारियों का आदेश दिया है कि वो इस आग को बुझाने का कोई तरीका खोजेंद्ध

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब तुर्कमेनिस्तान ‘गेटवे टू हेल’ में लगी इस आग को बुझाने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले 2010 में भी राष्ट्रपति ने विशेषज्ञों को इस आग को बुझाने के तरीके खोजने के लिए कहा था। जेरोनिम पेरोविक कहते हैं कि दुर्भाग्य से ये एक ऐसी समस्या है जिसका अब तक कोई हल नहीं निकल पाया है।

पर्यटकों को करता है आकर्षित

यह क्रेटर तुर्कमेनिस्तान के सबसे लोकप्रिय पर्यटक केंद्रों में से एक है। साल 2018 में राष्ट्रपति ने आधिकारिक तौर पर इसका नाम बदलकर ‘शाइनिंग ऑफ़ काराकुम’ रख दिया था।
हर साल क़रीब छह हज़ार सैलानियों वाले इस देश के लिए मीथेन उगलने वाला ये गड्ढा देश का सबसे बड़े पर्यटन स्थलों में से एक बन चुका है। काराकुम रेगिस्तान में ये गड्ढा रात को भी दूर से दिखाई देता है और कई सैलानी इसे देखने जाते हैं।

Disclaimer: This article has not been edited by Culprit Tahalaka. This news is published by news agency or other source.

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