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लेख

कहानी:गांव की शादी

admin
Last updated: जून 23, 2025 8:59 पूर्वाह्न
By admin 11 Views
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9 Min Read
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कहानी:गांव की शाद

मेरा नाम आरव है। मेरे पापा एक कॉपरेट ऑफिस में काम करते थे। हम लोग गुरूग्राम की हाई फाई सोसायटी में एक फ्लेट में रहते थे।

उस समय मेरी उम्र करीब दस साल रही होगी। मुझे आज भी याद है। पापा मम्मी के साथ शादी, फंक्शन में जाना। वहां बहुत सलीके से सबसे मिलना। खाना खाना। शगुन का लिफाफा देना और अपने घर वापस आ जाना।

मैंने कभी पूरी शादी नहीं देखी थी। बस कभी कभी हम देर से पहुंचते थे, तो दूल्हा दुल्हन को वरमाला पहनाते देख लेते थे।

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एक दिन मेरे पापा ऑफिस से आये तो उन्होंने बहुत खुश होते हुए बताया – ‘‘अल्का सुनो वो अपनी बुआ जी हैं न खुर्जा वाली उनकी बेटी की शादी है। हम सबको एक सप्ताह पहले ही बुलाया है।’’

मम्मी ने आश्चर्य से पूछा – ‘‘अच्छा ये तो अच्छी बात है लेकिन एक सप्ताह हम कैसे रुक सकते हैं। वो भी गांव में। वहां सबके पैर छुओ, घूंघट में रहो ये सब कैसे करूंगी।’’

पापा ने मम्मी की बात काटते हुए कहा – ‘‘कितने साल हो गये गांव गये, बहुत मजा आयेगा। इस रोज की भागदौड़ की जिन्दगी से कुछ दिन छुटकारा मिलेगा। साथ ही उन सब रिश्तेदारों से मिल पायेंगे, जिन्हें कई सालों से देखा नहीं है। बस कभी कभी फोन पर ही बात हो जाती है।’’

मैंने देखा मम्मी को गांव जाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन पापा तो मानों गांव पहुंच ही गये। वे बहुत खुश थे। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने पूछा – ‘‘पापा क्या गांव में बहुत मजा आता है।’’

पापा ने कहा – ‘‘हां बेटा मजा तो बहुत आता है, क्योंकि मेरा बचपन गांव में बीता है। शायद शुरू में तुम्हें अच्छा न लगे पर जब दो दिन वहां रहोगे तो सब अच्छा लगने लगेगा।’’

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पापा ने जाने की तैयारी कर ली। मम्मी भी तैयारी में लग गईं क्योंकि हमें दो दिन बाद ही निकलना था। स्कूल से छुट्टी भी सेंक्शन करवा ली। दो दिन बाद सुबह चार बजे ही पापा ने जगा दिया – ‘‘आरव उठो जल्दी से तैयार हो जाओ हमें निकलना है। फिर ट्रेफिक बहुत हो जायेगा।’’

पांच बजे तक हम तैयार होकर नीचे आ गये। पापा ने पार्किंग से गाड़ी निकाली और हम खुर्जा के लिये रवाना हो गये। खुर्जा से आगे एक छोटा सा गांव था। जहां पापा की बुआ जी रहती थीं।

रास्ते में खेत खलिहान पेड़ देखते देखते हम करीब ग्यारह बजे गांव पहुंच गये। गांव में पहुंचते ही पापा रास्ता भूल गये। वहां किसी से पूछा तब हम पहुंचे।

वहां पहुंचते ही हमारा बहुत स्वागत हुआ बुआ जी घर के बाहर बड़े से आंगन में आईं और पापा को गले से लगा लिया। पापा-मम्मी और मैंने उनके पैर छुए। फिर हम एक खाट पर बैठ गये।

मम्मी अंदर घर में चली गईं। आज पहली बार मम्मी को मैंने घूंघट में देखा था। मैं हस रहा था। बार बार उनका घूंघट उठा कर देख रहा था। मम्मी घूंघट में से ही आंखे निकाल कर गुस्सा हो रहीं थीं।

अन्दर जाते ही बुआ जी बोली – ‘‘ये अपने लेखू की बहु है।’’

मम्मी सबके पैर दबा दबा कर छू रही थीं। यह सब देख कर मैं बाहर आ गया और पापा से पूछा – ‘‘पापा आपका नाम लेखू है क्या?’’

पापा बोले – ‘‘बेटा मेरा नाम लेखराज है। गांव में ऐसे ही नाम होते हैं। नाम को छोटा करने के लिये सब मुझे लेखू के नाम से बुलाते थे।’’

यह सुनकर मैं हसने लगा। कुछ देर बाद हमारे लिये नाश्ता आ गया। गुड़ के सेव, नमकीन मट्ठी, बर्फी, गुलाब जामुन और एक गिलास दूध।

पापा ने मजे से नाश्ता किया मैंने केवल नमकीन मट्ठी ही खाईं। फिर हम गांव की ओर घूमने चल दिये। गांव में हर आदमी पापा को जानता था। सब उनसे राम राम करते, हाल चाल पूछते फिर पापा आगे बढ़ते।

मैं सोच रहा था। वहां शहर में तो हमें कोई भी नहीं जानता। बस होली दिवाली के दिन ही सब लोग इकट्ठे होते थे। बाकी तो कोई किसी से नमस्ते भी नहीं करता था।

शाम तक बुआ जी के घर में काफी मेहमान आ गये थे। गर्मी के दिन थे। सबका सोने का इंतजाम छत पर हुआ था। छत पर बिस्तर बिछा दिये थे। दो बड़े पंखे लगे थे।

हम सब सात बजे तक खाना खाकर छत पर चले गये। आंगन में औरते गीत गा रहीं थीं। ये सब मैंने पहली बार देखा था। पापा ने बताया – ‘‘बेटा चार दिन बाद शादी है तब तक ऐसे ही गीत गाये जायेंगी। हल्दी, मेंहदी, भात की रस्म होंगी। वो तो बीच में बना है वह मंडप है। वहां फेरे पड़ेंगे।’’

मैंने पूछा – ‘‘क्या शादी घर में ही हो जायेगी। बैंकट हॉल नहीं जायेंगे।’’

पापा ने बताया – ‘‘हां बेटे यहां शादी घरों में ही होती है। घर ही इतना बड़ा है। बारात को स्कूल में रुकवा दिया जाता है।’’

अगले दिन पापा शादी के कामों में व्यस्त हो गये। वहां कुछ मेरी उम्र के बच्चे थे। वे मुझे अपने साथ खेलने ले गये। उनके खेल मेरी समझ में नहीं आ रहे थे। मैं बस एक ओर खड़ा देख रहा था।

चार दिन बाद शादी का दिन आया सब तैयार हो गये। बारात आई। दूल्हा दुल्हन की जयमाला दरवाजे पर ही हो गई। फिर दावत का समय हुआ मेज कुर्सी पर बैठ कर पत्तलों में खाना परोसा जाने लगा। पापा भी यही काम कर रहे थे। फिर सबने खाना खाया। अब सब लोग उसी मंडप के चारों और बैठ गये। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। सुबह तक मैं जागता रहा। मैंने पहली बार पूरी शादी देखी थी।

सुबह विदाई के समय सब रो रहे थे। विदाई के बाद सब काम निबटाने में लग गये। मैं जाकर सो गया।

दोपहर को जब भूख लगी तब मेरी आंख खुली। आंगन में जाकर देखा, तो सब लोग खाना खा रहे थे। हमने भी खाना खाया। अगले दिन हमें निकलना था। रात को सब बात करते रहे।

सुबह जब चलने का समय हुआ तो बुआ जी रोने लगी – ‘‘बेटा कभी कभी आ जाया कर शादी में तुझसे ठीक से बात भी नहीं हो पाई।’’

पापा उन्हें समझा रहे थे। बुआ जी ने बहुत सारी मिठाई और दूसरा सामान गाड़ी में रखवा दिया। मुझे भी कपड़े और पैसे मिले।

हम घर की ओर चल दिये। आज कई साल बीत गये। आज भी मैं उस शादी में बिताये सात दिनों को भूल नहीं पाया हूं। शहर की शादी हम एक सप्ताह बाद ही भूल जाते हैं। आज भी मेरा मन करता है, कि गांव की शादी देखूं। बुआ जी के जाने के बाद पापा कभी वहां गये ही नहीं।

पता नहीं कब हम गांव की शादी देख पायेंगे मैं भी अपने बच्चों को गांव ले जाना चाहता हूं।

विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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