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राष्ट्रीय

Rabindranath Tagore Death Anniversary:प्रेम प्रसंग एक नहीं अनेक, जो बने लेखन की ऊर्जा

Admin
Last updated: अगस्त 7, 2021 2:35 पूर्वाह्न
By Admin 14 Views
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6 Min Read
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Rabindranath Tagore Death Anniversary : रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) का नाम आते ही एक ऐसे विराट व्यक्तित्व का ओरा सामने आ जाता है जिसकी चमक के आगे कुछ भी दिखायी नहीं देता। तस्वीरों में बहुत शांत और सौम्य दिखायी देने वाले इस व्यक्ति का जीवन बहुत उथल पुथल भरा रहा। इन्होंने अपने जीवनकाल में इतने काम किये जो आम आदमी या सामान्य मेधा के व्यक्ति के लिए नामुमकिन हैं।

आम तौर पर यह कहा जाता है कि हर सफल आदमी के पीछे एक स्त्री का हाथ ज़रूर होता है। बात सही है। माँ, पत्नी, बहन या प्रेयसी कोई भी हो सकता है। किसी भी साहित्यकार, कलाकार या मेधा से जुड़ा काम करने वालों के बारे में यह पूरी तरह सत्य है। लेकिन रचनात्मक लोगों के पीछे प्रायः किसी न किसी प्रेयसी का हाथ होता है। हर रचनात्मक व्यक्ति की तमाम प्रेम कथाएँ पीछा करती रहती हैं। गुरुदेव भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। आपको यकीन भले न हो पर हकीकत यह है कि उनका एक ही समय में कई स्त्रियों से प्रेम रहा। जीवन के हर चरण में अलग अलग स्त्रियों से प्रेम रहा है।

जब गुरुदेव आठ वर्ष के थे तो उन्हें अपनी भाभी कादम्बरी अच्छी लगने लगीं। वह गुड्डे गुडियों के खेल में रबीन्द्रनाथ टैगोर की सहेली थीं। गुरुदेव से मात्र दो साल बड़ी थीं। रबीन्द्र जब भी कुछ लिखते थे, तो उनकी पहली पाठक या श्रोता कादंबरी होती थीं। वह जब अपना लिखा हुआ सुनाना शुरू करते तो कादंबरी उनके ऊपर पंखा झला करती थीं। हालात इतने विपरीत हुए कि रबीन्द्र को घर से दूर मुंबई भेज दिया गया।

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रबीन्द्रनाथ टैगोर (फाइल फोटो - सोशल मीडिया)

रबीन्द्रनाथ टैगोर (फाइल फोटो – सोशल मीडिया)

रबीन्द्र की उम्र उस समय लगभग 16 साल थी। वह बड़े भाई के मित्र डॉक्टर आत्माराम पांडुरंग के यहां रुके। लेकिन अपनी भाभी कादंबरी को याद कर व्यथित रहते थे। यहां उन्हें अपनी हम उम्र डॉक्टर पांडुरंग की बेटी अन्नपूर्णा मिली। कहते हैं दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा। यहां तक कि रबीन्द्र ने उसको नलिनी नाम तक दे डाला। वक्त ने फिर करवट ली। रबीन्द्र इंग्लैंड चले गए। अन्नपूर्णा की शादी किसी और से हो गई। बाद में अन्नपूर्णा का निधन हो गया। लेकिन रबीन्द्र नलिनी की याद में कविताएं लिखते रहे।

कहते हैं वक्त किसी का नहीं हुआ लेकिन रबीन्द्र के लिए इस मामले में वक्त ठहरा हुआ था। इंग्लैण्ड में वह डॉक्टर स्कॉट के घर पर रुके। यहां डॉक्टर स्कॉट की दो बेटियां रबीन्द्र को पसंद करने लगीं। रबीन्द्र को लगा कि ये दोनों लड़कियां उनके पूर्व जन्म की प्रेमिकाएं हैं। रबीन्द्र के मन में अपने रिश्तों को लेकर कोई पाप नहीं था । इसलिए वह सब बातें दिल खोलकर पिता से साझा करते थे। उनके पिता ने उनको वापस आने को कहा। तो रबीन्द्र एक बार फिर खुश हो गए । चलो कादम्बरी के साथ रहने को मिलेगा। लेकिन यहां आते ही उनकी शादी करवा दी गई। शादी के समय मृणालिनी दस साल की थीं। रविंद्र 22 साल के थे। लेकिन उनकी भाभी कादम्बरी यह सदमा नहीं झेल पाईं। उन्होंने जहर पीकर आत्महत्या कर ली।

इस झटके से कुछ समय के लिए रबींद्र अथाह शोक में डूब गए । लेकिन फिर पत्नी से धीरे धीरे लगाव होने लगा। मृणालिनी जब मात्र तेरह वर्ष की थीं, तब उन्होंने पहली संतान को जन्म दिया। रबीन्द्र के जीवन में खुशहाली आई ही थी कि 29 वर्ष की उम्र में मृणालिनी की भी मृत्यु हो गई। वे जब तक इस दुख से उबरते उनकी पहली बेटी बेला की भी मृत्यु हो गई।

रबीन्द्रनाथ टैगोर कविता लिखते हुए (फाइल फोटो - सोशल मीडिया)

रबीन्द्रनाथ टैगोर कविता लिखते हुए (फाइल फोटो – सोशल मीडिया)

लेकिन हालात से हारे बिना आगे बढ़ना रबीन्द्र के जीवन का ध्येय था। उनको शोक के इस सागर से उबारा रानू अधिकारी ने जो उम्र में उनसे काफी छोटी थीं। इसी समय उनकी जिंदगी में एल्महर्स्ट नाम की युवती भी आई। उन्होंने रक्त कारबी नाटक में तीनों के बीच चले प्रेम-त्रिकोण का वर्णन किया है। रबीन्द्र ने रानू के लिए करीब 200 कविताएँ रचीं। इस तरह आलोचकों का यह मानना है कि गुरुदेब रबींद्रनाथ टैगोर की जिंदगी में स्त्रियों का अहम रोल था। जो उनके सृजन की समिधा बनती गईं।

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गुरुदेव की वाणी में ओज था। जो उनकी कविता में झर झर बहता था गीतांजलि से प्रयाग शुक्ल द्वारा बाँग्ला से अनूदित ये पंक्तियां सहज बोल उठती हैः

हो चित्त जहाँ भय-शून्य, माथ हो उन्नत

हो ज्ञान जहाँ पर मुक्त, खुला यह जग हो

घर की दीवारें बने न कोई कारा

हो जहाँ सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का

हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की

हों नहीं रूढ़ियाँ रचती कोई मरुथल

पाये न सूखने इस विवेक की धारा

हो सदा विचारों, कर्मों की गतो फलती

बातें हों सारी सोची और विचारी

हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें

बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा।

कलप्रिट तहलका (राष्ट्रीय हिन्दी साप्ताहिक) भारत/उप्र सरकार से मान्यता प्राप्त वर्ष 2002 से प्रकाशित। आप सभी के सहयोग से अब वेब माध्यम से आपके सामने उपस्थित है।
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