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उत्तर प्रदेश

दलित बस्तियों में RSS का डिनर, लोकसभा चुनाव में बीजेपी की राह करेगा आसान?

Admin
Last updated: जनवरी 11, 2023 6:19 अपराह्न
By Admin 13 Views
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7 Min Read
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भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी संगठनों ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने की रणनीति पर अमल करना शुरू कर दिया है.इसके तहत ही यूपी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता बढ़ गई है. संघ के प्रमुख पदाधिकारी राज्य में दौरे करने लग गए हैं. इन पदाधिकारियों के निर्देश पर संघ के कार्यकर्ता यूपी के गांव-गांव में संघ ने सामाजिक समरसता के कार्यक्रम चलाकर लोगों को संघ से जोड़ने की मुहिम में जुट गए हैं. संघ के यह कार्यकर्ता सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों के जरिए गांवों की दलित बस्तियों में सहभोज, शिक्षा और स्वास्थ्य के कार्यक्रम चलाकर दलित समाज को संघ की विचारधारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं. इस मुहिम को पुख्ता करने के लिए यूपी की हर न्याय पंचायत में संघ की शाखा स्थापित कर ग्रामीणों को अपने साथ जोड़ने का अभियान भी शुरू हो गया है.

संघ द्वारा की जा रही इस कवायद के जरिए 30 हजार अनुसूचित जाति-बहुल बस्तियों में केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को पहुंचाने पर कार्य किया जाएगा, ताकि लोकसभा चुनावों में बीजेपी उम्मीदवारों की जीत को आसान बनाया जा सके.बिना किसी हो-हल्ले के यूपी में संघ के कार्यकर्ता यूपी में दलित समाज को बीजेपी से जोड़ने की मुहिम में जुटे हैं. संघ के पदाधिकारियों का मानना है कि मोदी तथा योगी सरकार की की योजनाओं का सबसे बड़ा लाभार्थी दलित और मुस्लिम समाज है.बीते विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी को दलित समाज का साथ मिला था और अभी भी यह समाज बीजेपी के साथ है, लेकिन उन्हें बीजेपी से साथ जोड़े रखने की बहुत जरूरत है.

गांव-गांव जाकर लोगों को संघ से जोड़ने की कोशिश

लिहाजा दलित समाज को बीजेपी से जोड़े रखने के लिए ही संघ ने गांवों में फिर से सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों के जरिए गांवों की दलित बस्तियों में सहभोज, शिक्षा और स्वास्थ्य के कार्यक्रम चलाने का फैसला किया है. संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की अध्यक्षता में मंगलवार को लखनऊ में आयोजित पदाधिकारियों की बैठक में सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों को लेकर विस्तार से चर्चा हुई.और यह तय हुआ कि गांवों में सरकार के सहयोग से सड़क, पानी, बिजली, चिकित्सा एवं शिक्षा जैसी सुविधाएं मुहैया कराकर लोगों को संघ से जोड़ने का प्रयास किया जाएं. इसके साथ ही सामाजिक समरसता के तहत हर दलित और मलिन बस्ती और ग्रामीण इलाकों में सहभोज, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को संघ की कार्यशैली से अवगत कराया जाए, ताकि संघ के जरिये लोगों भाजपा से भी जुटे और भाजपा को अपना हितैषी माने.

सहभोज के आयोजन पर ज़ोर क्यों?

इसी प्लान के तहत अब संघ और बीजेपी के नेता गांवों में दलित बस्तियों तक पहुंचेंगे. यह पूरा कार्यक्रम लोकसभा चुनावों तक चलेगा.संघ से जुड़े के पदाधिकारी के अनुसार, वर्तमान में अवध प्रांत के 13 जिलों में करीब 2200 शाखाएं चल रही हैं. अब इसके विस्तार पर काम चल रहा है. संघ ने 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले यूपी में ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने की योजना बनाई है. संघ में पहली बार रोजगार बढ़ाने की योजना पर भी काम कर रहा है.दलित समाज को संघ और बीजेपी से जोड़ने का कार्य पहले से ही हो रहा है.अब इस कार्य में अधिक तेजी लाने का फैसला हुआ है. इसकी जरूरत क्यों पढ़ी ? इस सवाल पर संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यूपी में पिछले विधानसभा चुनावों में दलित समाज ने बीजेपी का साथ दिया, लेकिन अभी इस समाज का बसपा से मोहभंग नहीं हुआ है.

मायावती आज भी दलित समाज की नेता हैं. ऐसे में संघ दलित समाज को बसपा से दूर करने के लिए ही उनके बीच कार्य करने पर ज़ोर दे रहा है.संघ के पदाधिकारियों को पता है कि दलित समाज को बसपा से दूर किए बिना साल 2024 में यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर बीजेपी की संभव नहीं होगी. हालांकि मुफ्त राशन योजना से दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को काफी फायदा हुआ है और इस योजना के चलते बीजेपी को इस समाज का वोट भी मिला है. बसपा की राजनीतिक और चुनावी उपस्थिति में गिरावट का आकलन करने करने की बाद ही दलित समाज के बीच अपनी पैठ बनाना संघ और बीजेपी के अभियान का असली मकसद है.

बसपा के वोटबैंक को शिफ्ट करने में जुटा संघ

बीजेपी और संघ को इस बात का भी एहसास है कि जिस तरह से कांग्रेस ने दलित चेहरे पर दांव लगाया है उसके बाद दलित समुदाय से जुड़ने के लिए उसे मेहनत करनी होगी. इसलिए अब संघ ग्रामीण इलाकों में संघ की शाखाओं की स्थापना कर दलित के घर भोजन करने के लिए सहभोज कार्यक्रमों के आयोजनों पर ज़ोर दे रहा है. संघ के पदाधिकारियों के यूपी मिशन को लेकर लखनऊ के सीनियर जर्नलिस्ट परवेज़ कहते हैं कि संघ के कार्यकर्ता हवाहवाई दावे नहीं करते. ये लोग चुपचाप कार्य करते हुये बीजेपीके पक्ष में माहौल बनाते हैं. यूपी में भी यही हो रहा है. संघ के पदाधिकारियों को ये भी पता है कि बीते विधानसभा चुनावों में सिर्फ एक ही विधानसभा सीट जीतने वाले बसपा की सुप्रीमो मायावती इस समय भी प्रदेश में दलित समाज की सबसे बड़ी नेता हैं.

वह प्रदेश की पहली दलित महिला सीएम हैं और चार बार इस पद पर रही हैं. इसके अलावा किसी भी पार्टी के पास इतना बड़ा चेहरा नहीं है. हालांकि, बीएसपी में दलित नेताओं की एक लंबी लिस्ट है, लेकिन मायावती के नाम के आगे वे उभर नहीं पाते.बीजेपी के पास सुरेश पासी, रमापति शास्त्री, गुलाब देवी और कौशल किशोर जैसे नेता हैं, लेकिन वह मायावती से सामने फीके हैं. इसलिए बसपा के वोटबैंक को बीजेपी में शिफ्ट करने के लिए संघ गांवों में सहभोज जैसे आयोजनों करने पर ज़ोर दे रहा है.संघ को इसका लाभ होगा क्योंकि अन्य कोई दल इस तरह से दलित समाज के बीच जाकर उन्हे अपने साथ जोड़ने का कार्य नहीं कर रहा है.

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