जब-जब भी हमारे कानों में ‘भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं…’ गीत के बोल गूंजते हैं, तो हमें बरबस ही याद आ जाती है -मनोज कुमार की। आपको देश-दुनिया ‘भारत कुमार’ के नाम से जानती है। पाठकों को बताता चलूं कि मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था।इनका जन्म 24 जुलाई, 1937 को एबटाबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका जन्म एक पंजाबी हिन्दू ब्राह्मण परिवार में हुआ था तथा बंटवारे के दौरान उनका परिवार दिल्ली आकर बस गया। संघर्षों से भरे उन दिनों में उन्होंने अपने सपनों को जीवित रखा और शिक्षा को अपनी ताकत बनाया। पाठकों को बताता चलूं कि मनोज कुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित हिन्दू कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की थी। पढ़ाई के इन वर्षों ने न सिर्फ उनके विचारों को आकार दिया, बल्कि भीतर छुपे कलाकार को भी बाहर लाने का रास्ता दिखाया। कॉलेज के बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया की ओर कदम बढ़ाया और फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।प्रसिद्ध एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार का हाल ही में 87 साल की उम्र में मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में निधन हो गया। वे काफी समय से लीवर सिरोसिस से जूझ रहे थे। वास्तव में, उनका हमारे बीच नहीं रहना एक बहुत बड़ी क्षति है। आपको शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि। वे
पटकथा लेखक, संगीतकार और सम्पादक थे तथा उनको भारतीय सिनेमा इतिहास के सबसे सफल और बेहतरीन अभिनेताओं में से एक माना जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि उनकी फिल्मों ने राष्ट्रीय गौरव की भावना को जगाया और ये पीढ़ियों को सदैव प्रेरित व प्रोत्साहित करती रहेंगी।सच तो यह है कि उनके अविस्मरणीय अभिनय ने हमारी सनातन संस्कृति को समृद्ध किया है।बहुत कम लोग ही यह बात जानते होंगे कि मनोज कुमार भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर ‘उपकार’ फिल्म बनाई थी और यही वह फिल्म थी जिससे उन्हें भारत कुमार नाम मिला था। पाठकों को बताता चलूं कि वे विशेष रूप से अपनी देशभक्ति फिल्मों के लिए जाने जाते थे। उपकार, पूरब-पश्चिम, क्रांति, रोटी-कपड़ा और मकान उनकी बेहद कामयाब फिल्में रहीं। मनोज कुमार की सुपरहिट फिल्में क्रमशः शहीद(1965), उपकार (1965), पत्थर के सनम(1967), पूर्व-पश्चिम (1967),शोर(1972), रोटी कपड़ा और मकान (1974) तथा क्रान्ति (1981) में आईं। पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 1965 में मनोज कुमार देशभक्ति पर बनी फिल्म शहीद में स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह के रोल में नजर आए थे। फिल्म जबरदस्त हिट रही और इसके गाने ‘ऐ वतन, ऐ वतन हमको तेरी कसम’, ‘सरफरोशी की तमन्ना’ और ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ काफी पसंद किए गए थे। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि उपकार (1967) फिल्म का गाना ‘मेरे देश की धरती सोना उगले..’ आज भी सबसे बेहतरीन देशभक्ति गानों में गिना जाता है। फिल्म के गाने की पॉपुलैरिटी देखते हुए मनोज कुमार को मीडिया ने भारत कहना शुरू कर दिया और फिर उन्हें भारत कुमार कहा जाने लगा। इतना ही नहीं, मनोज कुमार ने अपने निर्देशन में बनी फिल्म क्रांति (1981) में दिलीप कुमार को डायरेक्ट किया था। गौरतलब है कि वर्ष 1957 में बनी ‘फैशन’ उनकी पहली फिल्म थी, लेकिन बतौर अभिनेता उनके अभिनय की शुरुआत वर्ष 1960 में बनी फिल्म ‘कांच की गुड़िया’ से हुई। इसके बाद उन्होंने ‘पिया मिलन की प्यास’और ‘रेशमी रुमाल’ फिल्म में काम किया, लेकिन उन्हें फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ से खास पहचान मिली। वास्तव में सच तो यह है कि ‘हरियाली और रास्ता’ और ‘वो कौन थी’, जैसी फिल्मों ने मनोज कुमार को मुख्यधारा में स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने ‘हिमालय की गोद में’ तथा अन्य फिल्मों में अभिनय किया। कहना ग़लत नहीं होगा कि उनकी फिल्म ‘शहीद’ से लेकर ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ तक, हर एक किरदार में उनकी शिक्षा, सोच और राष्ट्र के प्रति भाव स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है।उल्लेखनीय है कि मनोज कुमार को 7 फिल्म फेयर पुरस्कार मिले थे। पहला फिल्म फेयर 1968 में फिल्म उपकार के लिए मिला था। उपकार ने बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट स्टोरी और बेस्ट डायलॉग के लिए चार फिल्म फेयर जीते। वर्ष 1992 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया तथा वर्ष 2016 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा फिल्म इंडस्ट्री के सबसे प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से नवाजा गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बचपन से ही मनोज कुमार, अभिनेता दिलीप कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक थे। दिलीप साहब की फिल्म शबनम (वर्ष 1949) मनोज कुमार को इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने उसे कई बार देखा। फिल्म में दिलीप कुमार का नाम मनोज था। जब मनोज कुमार फिल्मों में आए तो उन्होंने दिलीप कुमार के नाम पर ही अपना नाम भी मनोज कुमार कर लिया। संक्षेप में कहें तो अभिनय में मनोज कुमार,दिलीप कुमार की शैली को थामकर आगे बढ़े। बहुत कम लोगों को ही शायद इस बारे में जानकारी होगी कि लगातार फ्लॉप होती फिल्मों से परेशान जब अमिताभ बच्चन मुंबई छोड़कर अपने मां-बाप के पास दिल्ली वापस जा रहे थे, तब मनोज कुमार ही ऐसे शख्स थे, जिन्होंने अमिताभ को रोका और अपनी फिल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में मौका दिया। पाठकों को बताता चलूं कि उनकी फिल्म ‘यादगार'(1970) का गीत इकतारा बोले तुन तुन क्या कहें ये तुमसे, सुन सुन’ आज भी प्रासंगिक है। वास्तव में,अपने अभिनय, सकारात्मक सोच और सच्ची देशभक्ति से उन्होंने जो स्थान बनाया, वह केवल परदे तक सीमित नहीं था।सच तो यह है कि वह देश की आत्मा में रम-बस गए थे। कहना ग़लत नहीं होगा कि मनोज कुमार वह शख्सियत थे, जिन्होंने हमेशा भारतीय संस्कारों को जिया। जितना मां भारती से प्रेम किया उतना ही प्यार उन्होंने अपने माता-पिता से भी किया। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया था कि भारत के बंटवारे के दौरान सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। उस समय उनकी मां अपने बीमार छोटे बेटे कुकू के साथ तीस हजारी अस्पताल में भर्ती थी और दंगों की वजह से अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा उन्हें इलाज नहीं मिल रहा था। वास्तव में डॉक्टर्स उनकी मां और भाई का ट्रीटमेंट ठीक से नहीं कर रहे थे और इसलिए उन्होंने डॉक्टर्स को मारा-पीटा भी था। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि मनोज कुमार न केवल भारतीय सिनेमा के लिए बल्कि इस देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका सिने दौर अपने आप में एक मिसाल है। उनकी फिल्मों में समाजवाद, सामाजिक, नैतिक मूल्य व देशभक्ति की भावना, हमारी सांस्कृतिक विरासत नजदीक से दिखाई देती है। उन्होंने फिल्मों के माध्यम से शोषण, अन्याय और गरीबी के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। यदि हम मनोज कुमार की फिल्मों को देखते हैं तो यह पाते हैं कि उनकी फिल्मों में गीत भी बहुत ही मधुर तथा अर्थपूर्ण हैं। अंत में, यही कहूंगा कि भारतीय सिने जगत का यह सितारा भले ही भौतिक रूप से आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन सितारों का प्रकाश कभी भी मंद नहीं पड़ता है, सितारे हमेशा चमकते ही रहते हैं। अभिनेता-फिल्मकार मनोज कुमार का जो दौर था, वह सदैव हम सभी के मानस पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा और हम सभी को सदैव देशभक्ति, संस्कारों, नैतिक मूल्यों और समाजवाद के लिए सकारात्मक प्रेरणा देता रहेगा।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।
