हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही है कि उर्दू भाषा भारत की मिट्टी की भाषा है और भारत की राजभाषा हिंदी भी उर्दू के बिना अधूरी है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भाषा को धर्म से जोड़ना ग़लत है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने हाल ही में एक फैसला सुनाते हुए यह बात कही है कि ‘भाषा किसी धर्म की नहीं, बल्कि समुदाय, क्षेत्र और लोगों की होती है। भाषा संस्कृति होती है और समाज की सभ्यतागत यात्रा का मापदंड होती है।’ वास्तव में, उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानना एक गलतफहमी है। भाषा संस्कृति होती है और समाज की सभ्यतागत यात्रा का मापदंड होती है। माननीय कोर्ट ने यह बात कही है कि ‘उर्दू भाषा गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे बढ़िया मिसाल है और इसका जन्म भारत की भूमि पर हुआ है।’ कोर्ट ने उर्दू भाषा को विदेशी या केवल एक धर्म विशेष की भाषा मानने को पूरी तरह से ग़लत बताया है।कोर्ट ने यह बात कही है कि , ‘हकीकत ये है कि हिंदी भाषा का दैनिक उपयोग भी उर्दू शब्दों के बिना अधूरा है।खुद ‘हिंदी’ शब्द भी फारसी शब्द ‘हिंदवी’ से आया है।’ वास्तव में सच तो यह है कि हिन्दी और उर्दू दोनों एक ही इंडो-आर्यन भाषा हैं और एक-दूसरे से बहुत मिलती-जुलती हैं। हिंदी और उर्दू भाषा की समानता की यदि हम यहां बात करें तो इन दोनों भाषाओं का व्याकरण और बोलने का तरीका लगभग एक जैसा है। इतना ही नहीं, दोनों ही भाषाओं में सर्वनाम और क्रियापद एक ही हैं तथा संज्ञा और विशेषण शब्दों का बहुतायत प्रयोग भी लगभग एक जैसा दिखता है। सच तो यह है कि इन दोनों भाषाओं की शब्दावली का 70-80% हिस्सा लगभग एक जैसा है। पाठकों को बताता चलूं कि उर्दू भारत की शासकीय भाषाओं में से एक है तथा हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू है। यदि हम यहां भारत की बात करें तो जम्मू और कश्मीर की मुख्य प्रशासनिक भाषा उर्दू है। इतना ही नहीं,तेलंगाना, दिल्ली, बिहार और उत्तर प्रदेश की अतिरिक्त शासकीय भाषा उर्दू ही है। हालांकि, यह बात अलग है कि उर्दू अरबी और फ़ारसी से प्रभावित है, जबकि हिन्दी संस्कृत से। गौरतलब है कि उर्दू को नस्तालिक लिपि में लिखा जाता है, जबकि हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उर्दू में हिन्दी की तुलना में बहुत अधिक फ़ारसी और अरबी के शब्दों का इस्तेमाल होता है। गौरतलब यह भी कि उर्दू में तत्सम शब्दों का उपयोग कम किया जाता है। वास्तव में, यह एक कटु सत्य है कि हिंदी और उर्दू के बीच का विभाजन औपनिवेशिक काल में धर्म के आधार पर किया गया था, जो आज भी एक बड़ी गलतफहमी के रूप में मौजूद है। बहरहाल , यहां पाठकों को बताता चलूं कि हमारे देश में उर्दू और हिंदी का विकास लगभग एक ही कालखंड में हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो उर्दू भाषा का जन्म भारत में हुआ और अलग-अलग इलाकों में इसका अपने तरीके से विकास हुआ और 75 फीसदी शब्द संस्कृत से लिए गए हैं।सच तो यह है कि उर्दू किसी भी अन्य भाषा की तरह एक भारतीय भाषा है। पाठकों को बताता चलूं कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में क्रमशः 22 भाषाएं असमिया, बंगाली, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोडो, संथाली, मैथिली, डोगरी के अलावा उर्दू को भी शामिल किया गया है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि ज्यादातर ऐतिहासिक संदर्भ इस बात की ओर संकेत करते हैं कि उर्दू की उत्पत्ति भारत के पंजाब राज्य में हुई थी।यह स्थानीय और विदेशी भाषाओं के मेल से विकसित हुई बताते हैं।महान कवि अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक ‘घुर्रतुल कमाल’ में लिखा है कि 11वीं शताब्दी में लाहौर में पैदा हुए मसूद लाहौरी (मसूद साद सलमान) ने हिंदवी (उर्दू) में कविता की थी। इससे पता चलता है कि उर्दू की उत्पत्ति पंजाब में हुई थी। जानकारी देना चाहूंगा कि विभाजन से पहले लाहौर वृहद पंजाब का हिस्सा था और उर्दू नाम तुर्की शब्द ‘ओरदु’ या ‘ओर्दा’ (सेना) से लिया गया है।कहा जाता है कि यह ‘शिविर की भाषा’ या स्थानीय लश्करी जबान के रूप में उत्पन्न हुई थी। वास्तव में उर्दू भाषा का इतिहास 12वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। मुस्लिम विजय के बाद, उत्तर-पश्चिमी भारत में क्षेत्रीय अपभ्रंश भाषाओं का इस्तेमाल होने लगा और इन्हीं अपभ्रंश भाषाओं से ही उर्दू का विकास हुआ माना जाता है।यह भी उल्लेखनीय है कि उर्दू भाषा के विकास में फ़ारसी और अरबी भाषाओं का भी अहम योगदान रहा है। इसी शताब्दी यानी कि 12 वीं शताब्दी में ही अमीर खुसरो ने ‘रेख्ता बोली’ लिखी थी, जो आधुनिक उर्दू का आधार बनी। यहां पाठकों को बताता चलूं कि फ़ारसी दिल्ली सल्तनत की आधिकारिक भाषा थी तथा मुगल साम्राज्य के आने के बाद हिंदुस्तानी पर फ़ारसी का प्रभाव जारी रहा। यहां यह भी गौरतलब है कि दखनी उर्दू साहित्य के प्रमुख योगदानकर्ता मीरावजी, बहाउद्दीन बहन, ख्वाजा बंदा नवाज़ गेसू दराज, मुल्ला वजही, कुली कुतुब शाह आदि थे। जानकारी मिलती है कि 16वीं शताब्दी के कवि वली दखनी की साहित्यिक परंपरा उत्तर में लोकप्रिय हुई। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि मौलवी अब्दुल हक को ‘उर्दू के पिता’ के रूप में जाना जाता है। यहां यदि हम इस भाषा (उर्दू भाषा) की खास बातों के बारे में जानना चाहें तो यह सामने आता है कि उर्दू भाषा की शब्दावली संस्कृत-व्युत्पन्न प्राकृत और अरबी-फ़ारसी शब्दों के बीच लगभग समान रूप से विभाजित है। यह भी उल्लेखनीय है कि उर्दू भाषा पर इस्लाम की जारी परंपराओं और सदियों पहले मुस्लिम शासकों द्वारा विदेशी संस्कृति के संरक्षण का प्रभाव दिखा। वास्तव में, यह(उर्दू)शायरी, साहित्य और अकादमिक भाषा तो ये है ही, सरकारी कामकाज की भी भाषा रह चुकी है और सबसे खास बात यह कि उर्दू आम जनजीवन की भाषा रही है। हिन्दी और उर्दू का विकास भी एक-दूसरे के समानांतर होता है और इनमें तमाम समानताएं भी हैं। बहरहाल,कहना चाहूंगा कि भाषा कोई मजहब नहीं होता और ना ही उर्दू किसी मजहब का प्रतिनिधित्व करती है।माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उर्दू को ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ और ‘हिंदुस्तानी तहजीब’ का एक शानदार नमूना बताते हुए कहा कि उर्दू भारत की मिली-जुली सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि हिंदुस्तानी, हिन्दी और उर्दू को मिलाकर बनी एक बोली है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार हिंदुस्तानी खड़ीबोली और दिल्ली के आस-पास की बोलियों से विकसित हुई मानी जाती है।1800 ईस्वी तक यह हिन्दी और उर्दू में विकसित हो गई। जानकारी मिलती है कि हिंदुस्तानी में शुद्ध संस्कृत और शुद्ध फ़ारसी-अरबी शब्द कम होते हैं और तद्भव शब्द ज़्यादा होते हैं। वास्तव में, हिंदुस्तानी में उर्दू और हिन्दी के सभी बोले जाने वाले रूप शामिल होते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार हिंदुस्तानी का इस्तेमाल मुस्लिम शासकों और आम लोगों के बीच संचार के लिए किया जाता था तथा इसका विकास 13वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली और मेरठ के भारतीय शहरों में और उसके आस-पास शुरू हुआ माना जाता है। कवि वली दक्कनी ने 1700 में दिल्ली का दौरा किया था।उनकी रेख़्ता या हिंदवी ग़ज़लों ने शाही शहर में काव्य अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हिंदुस्तानी की स्थापना की थी। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का उर्दू से जुड़े मामले में दिया गया फैसला यह बताता है कि भारत जैसे देश के लिए भाषाई विविधता कितनी जरूरी है। वास्तव में, भाषा को किसी धर्म, संप्रदाय से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भाषा एक ‘ब्रिज’ यानी कि एक पुल के सदृश काम करती है, जो लोगों को आपस में जोड़ने का काम करती है। उम्मीद की जा सकती है कि टिप्पणियों के रूप में आई शीर्ष अदालत की नसीहत भाषाई विवाद खड़ा करने वालों को कुछ सीख दे सकेगी। ताज़ा मामला महाराष्ट्र से जुड़ा है।सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र से जुड़े इस मामले पर सुनवाई करते हुए उर्दू भाषा को लेकर अहम टिप्पणी की है। साइनबोर्ड में उर्दू होने के विरोध वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि उर्दू गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा है। यह कोई विदेशी भाषा नहीं है। वास्तव में,अदालत ने यह माना कि उर्दू के प्रयोग का उद्देश्य केवल प्रभावी संवाद है। कोर्ट ने यह बात मानी है कि भारत में आबादी की तरह भाषाएं भी मिली-जुली हैं। वास्तव में उर्दू हिंदी की बहन है। इसके बिना(उर्दू के बिना) रोजमर्रा की बोलचाल भी नहीं हो सकती।सच तो यह है कि यूपी, बिहार जैसे हिंदीभाषी राज्यों को छोड़ दिया जाए, तो कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे दक्षिण के राज्यों में भी उर्दू बोलने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। उर्दू भारत की ही भाषा है, विदेशी भाषा नहीं। कहना चाहूंगा कि उर्दू ने अपने शब्दों, साहित्य से अन्य भारतीय भाषाओं को और समृद्ध ही किया है।सच तो यह है कि उर्दू भारतीय सभ्यता-संस्कृति का अहम और महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे कोई नकार नहीं सकता है। भारत एक बहुभाषी देश है और एक बहुभाषी देश में भाषाओं को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। पाठक जानते होंगे कि दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर प्रतिरोध बहुत पुराना है। हाल ही में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की वजह से भी यह मामला फिर उछला था। तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार उन पर हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि इस तरह के विवादों में आम लोगों की संवेदनाएं, पुरानी धारणाएं और राजनीति प्रमुख भूमिका निभाती हैं, लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह समझने की जरूरत है कि भाषा धर्म नहीं है… यह एक समुदाय, क्षेत्र और लोगों की होती है, धर्म की नहीं।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।
