घाटी के आँसू”
घाटी जहाँ फूल खिलते थे, अब वहाँ सिसकती शाम,
वेदना की राख पर टिकी, इंसानियत की थाम।
कहाँ गया वह शांति-सूर्य, जो पूरब से उठता था?
आज वहाँ बस मौन है, जहाँ कल गीत बहता था।
पहलगाम की घाटियाँ, रोईं बहाये नीर।
धर्म पे वार जो हुआ, मानवता अधीर।
संगिनी का चीखना, गूँजा व्याकुल शोर।
छिन गया पल एक में, उसका जीवन भोर।
हिंदुस्तानी रक्त में, साहस भरा अपार।
आतंकी के हर कदम, होंगे अब लाचार।
श्रद्धा पे जो वार है, वह
