क्यों देखें हम
किसके पास क्या है
किसी भी कार्य की जन्म स्थली होती है मन की कल्पना।हमारे मन में ना जाने कितनी कल्पनायें बनती है और ख़त्म होती है।उन्हीं में सेएक़ाद कल्पना मन में स्थिर होती है और फिर उसके ऊपर चलता है चिंतन-मंथन। कोई भी नया कार्य को सफलता पाने के लिये उसकल्पना के बारे में दिन रात चिंतन मंथन करते रहो और जंहा कमियाँ लगे उसे सुधारते रहो।धीरे धीरे वो प्रयास एक सकारात्मक रूपलेकर हमारे सामने प्रस्तुत होता है।
यह सही बात है कि कुछ सोचेंगे तो ही कुछ नया करेंगे।अगर सोचेंगे ही नहीं तो क्या करेंगे। सफलता और प्रसन्नता दोनो स्वयं के हाथ मेंहैं । जब हम यह महसूस कर ले की मैं जो कर रहा हुँ वो काम कितना अच्छा है । अगर कार्य के संपादन में ख़ुशी है और यह समझ नहींरहे है तो सफलता और प्रसन्नता नहीं मिलेगी क्यूँकि अपनी हालत तो ये है की – कहीं पे निगाहे कही पे निशाना या यूँ कहे की परायीथाली में घी चोको लागे। पड़ोसी के पास तो कितनी सुंदर कोठी है। वो पीछे वाली गली में जो श्रेष्ठी हैं सुना हैं उनकी बैंक में जमा रकमखासा मोटी है ।फलाँ कितना भाग्यशाली है कि उसका बेटा लंदन में पढ़ता है । उसका दूसरा बेटा मर्सिडीज में चढ़ता है। आदि-आदि दूसरों के पास क्या है यह हम क्यों देखे क्योंकि इसका कोई अन्त नहीं है । अगर इसकी जगह पेड़ की जड़ो की तरह अपने कार्य , लक्ष्यपे अडिग रहकर चले तो सफलता और प्रसन्नता दूर नहीं हैं । जो व्यक्ति सृजनात्मक रचनात्मक कार्य में लग जाते है उन्हे दूसरों की बुराईऔर दोष देखने का वक्त नहीं मिलता हैं । आचार्य तुलसी ने जो सपना संजोया वह विशाल धर्मसंघ की गरिमा को शत गुणित करनेवालाबना ।मन में गुंथी हुई सार्थक दिवास्वपन जीवन जीने की भव्यतम कल्पना का साकार रूप बनती है और वही हमारे सृजनशीलता मेंयथोचित रंग भरते है । वाल्ट डीजनी को अखबार संपादक ने यह कहकर निकाल दिया की उनके पास कल्पना और नए विचार नहीं ।वही आज वह दुनिया का बेस्ट कार्टून क्रियेटर है । तभी तो कहा है की मानव की कल्पना समग्र विश्व को भायी है । अद्भुत जिनका चिंतनउनकी ज्योति जगमगायी हैं ।
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)
