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लेखशिक्षा

गणित के अनंत दीप की अमर धरोहर

admin
Last updated: अप्रैल 26, 2025 7:35 पूर्वाह्न
By admin 23 Views
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6 Min Read
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जब संख्याएं गूंज उठती हैं और समीकरण आत्मा के साथ नृत्य करते हैं, तब एक नाम सृष्टि के कण-कण में बस जाता है—श्रीनिवास रामानुजन। 26 अप्रैल, 1920, वह काला दिन जब भारत की धरती ने अपने इस अनमोल रत्न को खो दिया, पर उनकी गणितीय चेतना ने अनंत काल के लिए विश्व को रोशन कर दिया। यह पुण्यतिथि नहीं, एक महान तपस्वी की साधना का उत्सव है, जिसने गणित को न केवल विज्ञान, बल्कि काव्य, दर्शन और ईश्वर से जोड़ दिया। रामानुजन कोई साधारण गणितज्ञ नहीं थे; वे थे संख्याओं के संत, सूत्रों के साधक, और ब्रह्मांड के रहस्यों के द्रष्टा।

तमिलनाडु के छोटे से शहर इरोड में 22 दिसंबर, 1887 को जन्मे रामानुजन का जीवन किसी परीकथा से कम नहीं। एक साधारण ब्राह्मण परिवार, आर्थिक तंगी और औपचारिक शिक्षा का अभाव— ये सब उनके सामने दीवारें थीं, पर उनकी प्रतिभा ऐसी तूफानी लहर थी जो हर बाधा को चूर कर देती थी। बचपन से ही संख्याएं उनकी सखी थीं, उनके सपने थीं। जहां बच्चे मिट्टी के खिलौनों में खोए रहते, वहीं रामानुजन संख्याओं के जादुई संसार में गोते लगाते। स्कूल की किताबें उनके लिए छोटी पड़ गईं; उन्होंने स्वयं गणित के गहन समुद्र में डुबकी लगाई। 15 वर्ष की उम्र में जब उनके हाथ जी.एस. कार की ‘ए सिनॉप्सिस ऑफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर मैथमैटिक्स’ लगी, तो यह उनके लिए किसी वेद की तरह थी। इस किताब ने उनकी प्रतिभा को पंख दिए और उनकी नोटबुक्स में सूत्रों का अमृत उमड़ने लगा।

रामानुजन का गणित केवल गणनाओं का खेल नहीं था; वह एक आध्यात्मिक यात्रा थी। उनकी कुलदेवी नमगिरी उनके लिए प्रेरणा की स्रोत थीं। वे कहते थे, ‘हर सूत्र जो मेरे मन में आता है, वह देवी की कृपा है।’ उनके लिए गणित और ईश्वर एक ही सत्य के दो रूप थे। उनकी रचनाएं— चाहे वह अनंत शृंखलाएं हों, निरंतर भिन्न हों, या विभाजन फलन — मानो ब्रह्मांड की गूढ़ भाषा में लिखी गई कविताएं थीं। उनकी पाई (π) की गणना के लिए दी गई शृंखलाएं इतनी सुंदर और सटीक थीं कि आज भी सुपरकंप्यूटर उनकी मदद लेते हैं। रामानुजन का विभाजन फलन, जो यह बताता है कि किसी संख्या को कितने तरीकों से छोटी संख्याओं के योग के रूप में लिखा जा सकता है, गणित में क्रांति ला गया। उनके थीटा फलन और मॉड्यूलर समीकरणों ने आधुनिक भौतिकी, क्रिप्टोग्राफी, और ब्लैक होल सिद्धांत तक में अपनी जगह बनाई।

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रामानुजन की प्रतिभा तब विश्व के सामने आई, जब उन्होंने 1913 में कैम्ब्रिज के प्रख्यात गणितज्ञ जी.एच. हार्डी को पत्र लिखा। उस पत्र में दर्जनों सूत्र थे, जिन्हें देख हार्डी स्तब्ध रह गए। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई स्वशिक्षित भारतीय इतने गहन और मौलिक सूत्र लिख सकता है। हार्डी ने कहा, ‘रामानुजन का गणित मानव मस्तिष्क से परे है; यह ईश्वर की प्रेरणा है।’ रामानुजन को कैम्ब्रिज बुलाया गया, और वहां हार्डी के साथ उनकी जोड़ी ने गणित की दुनिया में तहलका मचा दिया। हार्डी-रामानुजन फॉर्मूला, जो प्राइम नंबर्स की गणना से संबंधित है, और उनकी संयुक्त शोध पत्रिकाएं आज भी गणित के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हैं।

रामानुजन की नोटबुक्स उनकी सबसे बड़ी विरासत हैं। इनमें हजारों सूत्र और प्रमेय हैं, जिनमें से कई को समझने में गणितज्ञों को दशकों लग गए। उनकी मॉक थीटा फलन, जिन्हें उन्होंने मृत्युशैया पर लिखा, गणित का एक ऐसा रहस्य है जिसे 21वीं सदी में पूरी तरह समझा गया। ये फलन आज क्वांटम भौतिकी और स्ट्रिंग सिद्धांत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी रीमान जेटा फलन से संबंधित खोजें आज भी गणित के सबसे बड़े अनसुलझे सवालों में से एक, रीमान हाइपोथेसिस, को समझने में मदद करती हैं।

कैम्ब्रिज में उन्हें न केवल सांस्कृतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, बल्कि उनकी शाकाहारी जीवनशैली और इंग्लैंड की ठंडी जलवायु ने उनके स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया। वर्ष 1917 में उन्हें टीबी का पता चला, और 1919 में जब वे भारत लौटे, उनकी हालत और बिगड़ गई। 32 वर्ष की अल्पायु में, 26 अप्रैल, 1920 को कुंभकोणम में उनका नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी नोटबुक्स ने गणितज्ञों को नई दिशाएं दीं। 1976 में उनकी एक खोई हुई नोटबुक, जिसे ‘लॉस्ट नोटबुक’ कहा जाता है, की खोज ने गणित की दुनिया में सनसनी मचा दी।

भारत में उनकी जन्मशती पर 1987 में 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया गया। उनकी नोटबुक्स का अध्ययन आज भी विश्व के शीर्ष गणित संस्थानों में होता है। उनकी जीवनी पर आधारित किताबें, जैसे रॉबर्ट कैनिगल की ‘द मैन हू न्यू इन्फिनिटी’, और उस पर बनी फिल्म ने उनकी कहानी को विश्वभर में पहुंचाया।

रामानुजन का जीवन हमें सिखाता है कि प्रतिभा किसी डिग्री, धन या संसाधनों की मोहताज नहीं। वे हमें सिखाते हैं कि यदि विश्वास और समर्पण हो, तो एक साधारण इंसान भी असाधारण बन सकता है। उनकी गणितीय खोजें न केवल विज्ञान की उन्नति में योगदान देती हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि मानव मस्तिष्क की कोई सीमा नहीं।

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विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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