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लेख

कहानी:गिफ्ट

admin
Last updated: जून 24, 2025 10:30 पूर्वाह्न
By admin 12 Views
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12 Min Read
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कुछ चीज़ें हमें राह चलते मिल जाती हैं, एकदम गॉड गिफ्टेड! जैसे मेरी यह कहानी। मामला कुछ यूं है…
मेरे एक बीमा पालिसी सरेंडर का मामला था। इसके निस्तारण के लिए मैं ऑफिस के कई चक्कर लगा चुका था, किन्तु हुआ कुछ नहीं था। अकस्मात‍ बीमा एजेंट मित्र श्याम नारायण जी से मुलाकात हो गई। मेरा प्रकरण जानने के बाद उन्होंने सुझाव दिया, ‘चलिए आज मैनेजर से मिल लेते हैं।’
‘मगर श्यामजी आज तो शनिवार है। ऑफिस बन्द होगा।’ मैंने शंका व्यक्त की।
‘मार्च का महीना है, इसमें बाज दफा संडे की बन्दी भी नहीं होती।’ कहते हुए वह मुझे बीमा दफ्तर ले आए।
मैनेजर साहब अपनी चेयर पर थे। श्यामजी ने मेरा लम्बित प्रकरण उनके संज्ञान में ला दिया था। साहब ने तत्काल फ़ाइल तलब की और सरसरी तौर पर देखने के बाद मेरा बैंक डिटेल लेकर बड़े अनौपचारिक ढंग से आश्वस्त किया था, ‘विलम्ब के लिए खेद है। दो-तीन दिन में पैसा आप के खाते में चला जाएगा।’
श्याम नारायण को दफ्तर में काफी देर लगनी थी। लिहाजा मैं अकेले ही दफ्तर की सीढ़ियों से नीचे आ रहा था… जाहिर-सी बात है, मेरा मन खुशियों से भरा था और चाल में उत्साह थी। तभी मेरी निगाह उस लकदक और सजे हुए ‘प्रोविजन एण्ड गिफ्ट स्टोर’ के काउंटर के पीछे बैठे क्लीन शेव्ड व्यक्ति पर पड़ गयी… उसका रंग साफ था और बाल कुछ कत्थई से लाल… लगता था, वह बालों में बराबर मेहंदी लगाता था। काउंटर के ऊपर निकला उसका धड़ एक अच्छी लम्बाई वाले आदमी की शिनाख्त दे रहा था। मुझे लग रहा था, मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं। किन्तु कन्सेप्ट नहीं क्लियर हो रहा था कि सफेद शर्ट पहने, चमकीली आंखों वाला इकहरे बदन का यह हीरो है कौन…?
नीचे आने के बाद मैं एक किनारे खड़ा हो गया… प्रोविजन स्टोर के दुकानदार को पहचानने के लिहाज से मैं तीसरी बार उस पर दृष्टिपात कर रहा था, तभी उसकी निगाह मेरे ऊपर पड़ गई। वह खुलकर मुस्कराया… और उसके ऊपरी दांतों की पंक्ति के दाहिनी तरफ के तीसरे टूटे दांत ने स्मृति की धुंध को एकबारगी साफ कर दिया… वह अजित खन्ना था, मेरे सहपाठी सुमित का छोटा भाई! सुमित के साथ मैं अक्सर उसके यहां जाता था… मैं भी मुस्कराता हुआ काउंटर के सामने पहुंचा और बेसाख्ता बोलता चल गया, ‘अजित, तुम्हारी चौक वाली दुकान का क्या हुआ? बाबूजी के बाद तुम देखने लगे थे। मैं उधर से गुजरने पर बराबर नजर डालता, यहां कब आ गए?’
‘प्रणाम भैया, बैठें तो सही…’ उसने काउंटर का एक किनारा उठाकर मुझे अन्दर आने का इशारा किया। मैं काउंटर के पीछे एक स्टूल पर बैठ गया।
उसने पैर छूकर दोबारा अभिवादन किया और कहा, ‘भैया, वह दुकान किराये की थी। उस पर मुकदमा था। फैसला मकान मालिक के पक्ष में आ गया तो छोड़ना पड़ा।’
वह बात की शुरुआत कर रहा था, तभी दुकान के सामने एक फॉर्च्यूनर रुकी। पीछे से निकलकर सफेद ड्रेस और लाल पगड़ी वाले अर्दली ने कार के बीच और आगे का गेट खटा-खट खोल दिया। बीच वाले चम्बर से दो लोग निकले, करीब पैंतीस साल का रोबीला हैंडसम पुरुष और तीस-बत्तीस साल की भरी-पूरी खूबसूरत औरत… साथ में एक चार-पांच साल का सुदर्शन बालक भी था, जो काफी सुस्त और अपने आप में खोया हुआ-सा लग रहा था। यह स्टोर की तरफ बढ़ने लगे, तभी ड्राइवर की बगल वाली शीट से बाहर आ, सत्ताईस-अट्ठाईस साल का गोरा-चिट्टा लम्बा छरहरा युवक भी उनके पीछे लग गया। संभवतः यह ट्रेनी ऑफिसर रहा होगा।
अजित कुछ अधिक चैतन्य भाव से उन्हें देखने लगा। काउंटर के सामने आते ही बड़े साहब ने बच्चे के लिए कुछ अच्छे खिलौने दिखाने को कहा था। अजित ने रंग-बिरंगे पन्नों वाला एक ब्रोशर उनके सामने कर दिया, ‘सर, इसमें से सिलेक्ट करें। वैसे एक आइटम यह है-टॉकिंग पैरेट! इसे जरूर लें। इसके सामने बच्चे जो बोलते हैं, यह उसे दोहरा देता है…।’

‘ठीक है, इसे पैक कर दो…।’ ब्रोशर के पन्ने पलटते हुए वह बोले, ‘अभी यह पांच साल का होने वाला है, इसके लिए कुछ क्रिएटिव खिलौने होने चाहिए, जैसे यह ‘मैकेनिक्स’…!’
‘जी सर…!’ कहकर अजित ने ‘मैकेनिक्स’ तो निकाला ही, ‘ब्लॉक गेम’ का डिब्बा निकालकर इससे जुड़े खेलों से बच्चों की रचनात्मकता और कल्पना की उड़ान पर प्रकाश डालने लगा।
यह गेम भी ओके हो गया। तभी ब्रोशर में छपी कार्बाइन और एके-47 पर बच्चे की निगाह पड़ गई। उसने उत्साहित होकर कहा, ‘पापा, यह दोनों भी…!’
बच्चे की चैतन्यता पर महिला मुस्कराई, दूसरा नौजवान भी उसे सराहना भरी निगाह से देखने लगा। किन्तु साहब जो पहले से ही गम्भीर थे, उनके चेहरे पर एकबारगी उलझन के भाव आ गए। वह पत्नी और साथी युवक पर निगाह डालते हुए कुछ कड़वाहट के साथ बोले, ‘क्या यह खेलने की चीज है? खिलौना उसे कहते हैं, जो बच्चे को अपनी कल्पनाशक्ति से कुछ नया रचने के लिए प्रेरित करे। उसके अन्दर सकारात्मक मनोवृत्ति के निर्माण में सहायक हो। यह तो खतरनाक हथियार हैं, विध्वंस के समान… यह कैसे खिलौने…?’
‘मगर सर, आज की तारीख में गन बच्चों का सबसे प्रिय खिलौना है।’ नवयुवक ऑफिसर ने बच्चे की पसन्द का समर्थन किया।
बच्चे की मां ने उलाहना-सा देते हुए कहा, ‘मुझे अक्सर सुनने को मिलता है कि दीपू बहुत सुस्त है। अपने आप में खोया रहता है। अभी वह कितनी ललक के साथ अपनी पसन्द बताया, लेकिन नुक्स निकल गया। मैं तो कहती हूं, जो खिलौना बच्चे को उत्साहित करे और सक्रिय बनाए, वही सच्चा खिलौना है…।’
दो-तीन सेकंड के लिए रुककर मैडम ने कुछ तीखी नजर से पति को देखते हुए बात आगे बढ़ाई, ‘बच्चों को भी कुछ स्पेस मिलना चाहिए, जब वह बचपन की उमंग के हिसाब से कुछ कर सकें। खेल-खिलौनों में भी पढ़ाई घुसेड़ देना ठीक नहीं…!’
बालक आशाभरी निगाह से मां और अंकल को देख रहा था। मुझे साहब की बात में दम दिख रहा था, किन्तु मैडम का कहना भी तर्कपूर्ण था। साहब के चेहरे पर झुंझलाहट थी। उन्होंने कुछ सख्त लहजे में अपना निर्णय सुनाया, ‘बात पढ़ाई की नहीं है, खिलौने मानस का निर्माण करते हैं। बंदूक देकर हम बच्चे की मासूमियत का खून करते हैं। गन से खेलने वाले बच्चे का मानस हिंसक बनेगा। उसकी भाषा धौंसपूर्ण होगी और व्यवहार आक्रामक…! खेलने के लिए कार्बाइन देकर हम अपनी संतान को मवाली बनने का प्रशिक्षण देते हैं। आइ एम नाट एलाउड टु डू दैट…!’
उनके अंग्रेजी बोलने का मतलब था, बस, अब कोई गुंजाइश नहीं! पत्नी और युवक उनका मुंह देखते रह गए। बच्चा निराश होकर और आत्मलीन हो गया था। साहब पूरे सिलसिले से बेखबर, अपनी जेब से समान की लिस्ट निकाले और उसे अजित को देते हुए बोले, ‘इसे निकालकर रखें, आधे घंटे में लौटता हूं।’
अजित एक-एक समान निकालकर काउंटर पर रखता जा रहा था, साथ ही ढेरों पुरानी बातें भी बता रहा था। जैसे कि चौकवाली दुकान का मुकदमा हारने के बाद वह लखनऊ में फूफाजी के रियल स्टेट के धंधे में लग गया था। बीस साल उधर लगा के कोरोना के टाइम यहां आ गया। सुमित ब्रिगेडियर होकर दो साल पहले रिटायर हुए और अब जयपुर में सैटिल हो गए हैं… मैं सुन जरूर रहा था, लेकिन ध्यान साहब की सोच पर टिका था… एक अधिकारी आदमी, ढेर सारी जिम्मेदारियां और व्यस्तताएं… फिर भी खिलौने जैसी छोटी चीज को लेकर इतना गहरा और सटीक चिन्तन…? कैसे-कैसे और कितने समझदार लोग हैं दुनिया में अभी! जबकि कहा जा रहा है, दुनिया बिना सोचे-समझे सरपट भागने की आदी हो चुकी है…। यह अर्द्ध सत्य भले हो, पूरा सच नहीं हो सकता…।
मैं दुकान से निकलने की सोच रहा था, तभी अजित ने चाय वाले से चाय के लिए बोल दिया। फिर उसने सामानों का बिल बनाया और सब कुछ एक मजबूत पॉलीबैग में रख दिया। इसके बाद वह कुर्सी पर बैठ गया, मुस्कराते हुए मुझ से मुखातिब हुआ, ‘भैया देखे, कैसे-कैसे खब्ती मिलते हैं?’
उसकी सतही समझ पर मैंने हल्का-सा मुस्करा दिया था, जिसे उसने अपना समर्थन ही समझा होगा। इसी समय काउंटर पर चाय पहुंच गई। हम इत्मीनान से चाय सिप करने लगे। फॉर्च्यूनर फिर आ खड़ी हुई। इस बार साहब, मैडम और बच्चा नहीं थे। अर्दली ने बीच वाला गेट खोला तो युवक बाहर आया। उसने बिल का ऑनलाइन पेमेंट कर दिया और पॉलीबैग अर्दली के हवाले करते हुए कहा, ‘पहले यह सर के यहां पहुंचा दो। मैं अपना कुछ काम निपटा के लालडिग्गी चौराहे पर मिलता हूं। लौट के वहीं मेरा इन्तजार करना…।’
गाड़ी आगे बढ़ गई। युवक स्टोर की तरफ बढ़ने लगा। अजित ने एक बड़े सिप के साथ चाय समाप्त की और गिलास अन्दर कार्नर की खाली जगह पर रख दिया। वह काउंटर पर आकर एक ड्रोन सेट पैक कराया और उस पर ‘जन्मदिन की ढेर सारी मंगलकामनाएं’ का चमकदार टैग लगवा के नीचे नाम के स्थान पर ‘अनुपम सिंह पी.सी.एस.’ इटैलिक अक्षर में लगाने को कहा। अजित के पास अल्फाबेट शीट थी, उसने तत्काल यह काम कर दिया।
‘अब कार्बाइन और ए के-47 दिखाओ।’ अनुपम सिंह ने कुछ सोच-विचार वाले लहजे में आदेश दिया।
मैं कुछ अचकचा के युवक की तरफ देखने लगा। अजित ने दोनों तरफ के खिलौना हथियार काउंटर पर रख दिए। उसने असली जैसी ठांय…ठांय… की गरजदार आवाज के साथ धुआं और चिंगारी फेंकने वाली कार्बाइन पसन्द कर ली। उसे पैक करते हुए अजित ने कहा, ‘आखिर सर बच्चे को उसकी पसन्द का खिलौना देने को राजी हो ही गए।’
‘नहीं, सर अपनी धुन के पक्के हैं। किसी की नहीं सुनते…’ कहते हुए उसने इस वाली पैकिंग में एक अलग किस्म का शुभकामना टैग लगवाया और नाम का स्थान खाली छुड़वा दिया। दोनों आइटम का कैरीबैग अपने पैर के पास टिकाया, फिर बिंदास अंदाज में पेमेंट करते हुए बताया, ‘रियली यह दीपू के लिए भाभी जी की तरफ से बेनामी गिफ्ट है।’
युवक थैला लिए आगे बढ़कर लोगों की भीड़ में गुम हो गया… यही है वह गॉड गिफ्टेड कहानी… जिसे पाकर मैं कतई खुश नहीं हूं। क्योंकि इसमें एक बड़े समझदार आदमी की बेहतरीन सोच का कत्ल उसके ही परिजनों ने कर दिया है।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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