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उत्तर प्रदेश

AK- 47 मामले में अनंत सिंह को 10 साल की सजा, समर्थक बता रहे हैं साजिश, विरोधियों ने बाहुबली विधायक का कर दिया ;होम्योपैथिक’ इलाज ?

admin
Last updated: जून 21, 2022 7:10 अपराह्न
By admin 13 Views
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8 Min Read
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MLA Anant Singh

कहते हैं राजनीति में कोई किसी का परमानेंट दोस्त या दुश्मन नहीं होता है. अनंत सिंह (ANANT SINGH) इसके सबसे बड़े उदाहरण है. वह कभी नीतीश कुमार के प्रिय हुआ करते थे. इतने प्रिय की नीतीश कुमार के 2005 में सत्ता में आने के बाद जब बिहार के बाहुबलियों का नया ठिकाना लाल हवेली बन रहा था, वही अनंत सिंह का तब जलवा कायम था. नीतीश कुमार जिस साल बिहार की सियासत में बतौर मुख्यमंत्री स्थापित हो रहे थे उस साल ही अनंत सिह विधायक बनकर विधानसभा पहुंच गए थे. नीतीश कुमार ने उन्हें अपनी पार्टी से टिकट दिया था. वह भी तब जब वह राजनीति से अपराध को खत्म करने का दावा करके सत्ता में आए थे.

Contents
9 साल की उम्र में गए पहली बार जेलमोकामा टाल में वर्चस्व स्थापितक्राइम के साथ पॉलिटिक्स का बैलेंस2004 में लालू का साथ छोड़ नीतीश के साथ आए2005 में जेडीयू की टिकट पर बने विधायक2015 से नीतीश से हुए दूरललन सिंह से मंहगी पड़ी अदावत‘आरसीपी सिंह का भी राजनीतिक इलाज’

तब अनंत सिंह को टिकट देने पर नीतीश कुमार की खूब आलोचना हुई थी. लेकिन कहते हैं ना, जो दाग वोट दिलाए वो दाग अच्छे हैं. वही अनंत सिंह अब नीतीश कुमार की आंखों की किरकिरी बन गए हैं. मंगलवार को जब अंनत सिंह को 10 साल की सजा हुई तो राजनीति के जानने वाले कह रहे हैं कि उनका होम्योपैथिक इलाज हो गया. होम्योपैथिक पर चर्चा से पहले एक नजर अनंत सिंह की अनंत कथा पर डालते हैं.

9 साल की उम्र में गए पहली बार जेल

पिछले 34 महीनों से जेल में बंद अनंत सिंह का जेल से परिचय महज 9 साल की उम्र में हो गया था. दरअसल अनंत सिंह का अनंत सिंह से छोटे सरकार बनने की कहानी किसी फिल्मी कहानी जैसी ही है. अनंत सिंह नौ साल की उम्र में पहली बार जेल गये थे. तब वह गांव के आपसी विवाद के एक मामले में जेल गए थे जिसमें थोड़े दिन बाद उनकी रिहाई हो गई. लेकिन जुर्म की दुनिया में उनकी एंट्री इस जेल यात्रा से हो गई.

मोकामा टाल में वर्चस्व स्थापित

इसके बाद जब वह थोड़े बड़े हुए तो मोकामा टाल इलाके पर कब्जे के लिए हथियार उठा लिया और यहां अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया. इसके बाद बड़े भाई विरंची सिंह की सरेआम हत्या के बाद अनंत सिंह का अपने गांव के ही विवेका पहलवान के परिवार से खुलेआम जंग हुआ. इस जंग में दोनों ओर से कई लाशें गिरीं. ये खूनी जंग आज तक जारी है

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क्राइम के साथ पॉलिटिक्स का बैलेंस

सीधा और सपाट बोलने वाले अनंत सिंह अंदर से माहिर माने जाते हैं, अपराध की दुनिया में झंडे गाड़ रहे अनंत सिंह को जल्द ही ये अहसास हो गया कि असली जंग तभी जीती जा सकती है जब क्राइम के साथ र पॉलिटिक्स का बैलेंस हो. अनंत सिंह ने अपने भाई दिलीप सिंह को मोकामा से 1990 में चुनाव लड़ाया और अपने रूतबे के सहारे चुनाव जिताने में कामयाब हुए. इसके बाद 1995 में भी दिलीप सिंह विधायक बने. लेकिन 2000 में सूरजभान सिंह के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

2004 में लालू का साथ छोड़ नीतीश के साथ आए

2004 में नीतीश कुमार अनंत सिंह के साथ आए. तब नीतीश कुमार बाढ लोकसभा सीट से सांसद का चुनाव लड़ते थे. नीतीश के साथ आने से पहले अनंत सिंह का पूरा कुनबा तब लालू यादव के लिए काम करता था. दिलीप सिंह भी लालू प्रसाद की पार्टी के टिकट पर विधानसभा पहुंचे थे. दिलीप सिंह ने श्याम सुंदर सिंह को हराया था. ये वहीं श्याम सुंदर सिंह हैं जिनको जिताने के लिए दिलीप सिंह और अंनत सिंह काम करते थे. 2004 में अनंत सिंह का समर्थन हासिल करने नीतीश उनके घर पहुंच गये. तब नीतीश कुमार को अनंत सिंह ने सिक्कों से तौला था. इसके बाद नीतीश कुमार पर खूब सवाल उठे था. इसके बावजूद नीतीश कुमार ने उनका साथ नहीं छोड़ा.

2005 में जेडीयू की टिकट पर बने विधायक

2005 में जेडीयू ने अनंत सिंह को मोकामा विधानसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया. अनंत सिंह चुनाव जीत कर विधायक बन गये. उसके बाद उनका सिक्का ऐसा जमा कि मोकामा और आस पास के इलाके में वह छोटे सरकार बन गए. अनंत सिंह अपने अंदाज में जीने के लिए जाने जाते हैं. अजगर से लेकर हाथी-घोड़ा पालने वाले अनंत सिंह अपने अजूबे शौक के कारण भी चर्चा में रहे. 2007 में उन्होंने लालू प्रसाद यादव का घोड़ा खरीद लिया. तो कभी 50 लाख रूपये में सांढ़ खरीद कर भी चर्चा में आए. अनंत सिंग अपने बग्घी शौक के लिए भी चर्चा में रहे.

2015 से नीतीश से हुए दूर

2015 के विधानसभा चुनाव से एक यादव युवक की हत्या के बाद वो बुरी तरह घिर गए. दरअसल नीतीश कुमार तब बीजेपी का साथ छोड़कर लालू प्रसाद के साथ आ गए थे. और लालू प्रसाद के दबाव में अनंत सिंह को जेडीयू के टिकट से बेदखल कर दिया गया. अनंत सिंह निर्दलीय लड़े और जीतने में कामयाब रहे. इस दौरान लाल प्रसाद ने अनंत सिंह को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की पूरी कोशिश की.

ललन सिंह से मंहगी पड़ी अदावत

जेडीयू के बड़े नेता और नीतीश कुमार के खास माने जाने वाले ललन सिंह जो कभी अनंत सिंह के राजनीतिक गुरु कहे जाते थे अनंत सिंह ने उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया. 2019 के चुनाव में अनंत सिंह ने अपनी पत्नी नीलम देवी को ललन सिंह के खिलाफ मुंगेर के मैदान में उतार दिया. तब ललन सिंह ने अनंत सिंह का बिना नाम लिए होम्योपैथिक इलाज करने का ऐलान किया था. मंगलवार को MP-MLA कोर्ट ने उन्हें प्रतिबंधित हथियार AK- 47 रखने के मामले में 10 साल की सजा सुनाई है.

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‘आरसीपी सिंह का भी राजनीतिक इलाज’

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि अनंत सिंह के लोगों का कहना है कि वह सालों से अपने पैतृक आवास नहीं गए थे. इसके बाद वहां से अनंत सिंह की अनुपस्थिति में हथियार बरामद होता है तो इसमें राजनीतिक साजिश से इंकार नहीं किया जा सकता है. अनंत सिंह का होम्योपैथिक इलाज उनके विरोधियों ने कर दिया. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अनंत सिंह क्या आरसीपी सिंह का भी ललन सिंह ने होम्योपैथिक इलाज करा दिया है. तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी ने कहा कि अनंत सिंह के मामले में कानून ने अपना काम किया है. इसके कोई और मायने नहीं निकाले जाने चाहिए.

कलप्रिट तहलका (राष्ट्रीय हिन्दी साप्ताहिक) भारत/उप्र सरकार से मान्यता प्राप्त वर्ष 2002 से प्रकाशित। आप सभी के सहयोग से अब वेब माध्यम से आपके सामने उपस्थित है।
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