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बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर प्रभाव डालती तकनीक !

admin
Last updated: फ़रवरी 19, 2025 8:53 अपराह्न
By admin 21 Views
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11 Min Read
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बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। इतना कोमल कि बच्चे के मन को हम अच्छी शिक्षा देकर किसी भी आकार में ढ़ाल सकते हैं। महान् मनोविज्ञानी वाटसन ने कहा है कि ‘मुझे एक नवजात शिशु दे दो। मैं उसे डॉक्टर, वकील, चोर या जो चाहूँ बना सकता हूँ।’ हम सभी ने कभी न कभी अपने जीवन में किसी कुम्हार को चाक पर काम करते देखा है। वह मिट्टी के एक बेकार से दिखने वाले टुकड़े को एक खूबसूरत मिट्टी के बर्तन में बदल देता है। वह अपनी कला से मिट्टी को मनचाहा आकार दे देता है। बच्चों के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यदि हम उनको अच्छी शिक्षा,अच्छे संस्कार, नैतिकता की शिक्षा दें तो उसे हम देश व समाज का एक अच्छा नागरिक, सुसंस्कृत व्यक्ति बना सकते हैं। आज हमारी युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति व सूचना क्रांति के प्रभाव में आकर एंड्रॉयड स्मार्टफोन का धड़ल्ले से प्रयोग कर रही है। सूचना क्रांति का प्रयोग करना ग़लत नहीं है लेकिन आज तकनीक हमारी युवा पीढ़ी पर हावी होती चली जा रही है। स्मार्टफोन के अधिक व अंधाधुंध प्रयोग से बच्चों के कोमन मन-मस्तिष्क पर आज गहरा प्रभाव पड़ रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि तकनीक का यह प्रभाव हमारे देश की युवा पीढ़ी की मानसिक एकाग्रता व सेहत के लिये बहुत ही घातक सिद्ध हो रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज तकनीक का विशेषकर टीनएज बच्चों के मस्तिष्क पर गहरा असर देखा जा सकता है। सच तो यह है कि बच्चों द्वारा अधिक मोबाइल स्क्रीन का प्रयोग उनके मानसिक स्वास्थ्य, बौद्धिक विकास, शारीरिक समन्वय और यहां तक ​​कि नींद और खाने की आदतों, उनके अध्ययन को प्रभावित कर रहा है। अत्यधिक ऑनलाइन एक्टिविटी के अनेक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिणाम हैं, जिनको लेकर आज हमारे समाज को चेतने की जरूरत है। वास्तविक दुनिया से दूर आज हमारे बच्चे वर्चुअल दुनिया या यूं कहें कि आभासी दुनिया में जी रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि वर्चुअल दुनिया की तुलना में वास्तविक दुनिया को प्राथमिकता दी जाए ताकि हमारे बच्चों का मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या यूं कहें कि सर्वांगीण विकास हो सके।आज हमारी युवा पीढ़ी पर कृत्रिमता बुरी तरह से हावी प्रतीत होती है। हमारी युवा पीढ़ी जीवन की वास्तविकताओं से परे एआई चैटबॉट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स व्हाट्स एप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब, ट्विटर की दुनिया में अधिक जी रहे हैं।सच तो यह है कि आज हमारी युवा पीढ़ी का बहुत अधिक समय एंड्रॉयड, लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है।आज हमारे बच्चों को अकेले रहने की आदत पड़ चुकी है। इंटरनेट आज की जरूरत है लेकिन इसकी अंधी दौड़ ने हमारे बच्चों की दिनचर्या को काफी हद तक प्रभावित किया है और स्वास्थ्य को भी। सच तो यह है कि तकनीक के जरिये विकास की अंधी दौड़ में हमारी युवा पीढ़ी बहुत कुछ खो भी रही है। हमारी युवा पीढ़ी मशीनी हो गई है। कोरोना काल क्या आया ? इसने हमें एक तरह से पंगु बना दिया। गौरतलब है कि कोरोना काल से आभासी पढ़ाई, मीटिंग, वर्क फ्रॉम होम आदि का दौर शुरू हो गया। देश में जगह जगह आभासी स्कूल और कालेज खुलने लगे।आज विशेषकर हमारी युवा पीढ़ी के सोशल मीडिया पर हजारों मित्र होते हैं, लेकिन जब वास्तविक जीवन में हमें और हमारी युवा पीढ़ी को मित्रों की आवश्यकता होती है, तो आज कोई भी हमारे साथ खड़ा नहीं होता है। सच तो यह है कि आज आभासी दुनिया(वर्चुअल दुनिया) की बढ़ती दखलंदाजी की वजह से हमारे अनेक सामाजिक संबंध लगातार पीछे छूटते चले जा रहे हैं। हम और हमारी युवा पीढ़ी आज आभासी दुनिया में ही रिश्ते-नाते स्थापित करने लगी है।यह ठीक है तकनीक ने मनुष्य को अनेक प्रकार की सहूलियतें प्रदान की हैं,तकनीक हम इंसानों की मदद और सहायता के लिए है, लेकिन आज इंसान तकनीक का लगातार गुलाम होता जा रहा है, इसे किसी भी हालत और परिस्थितियों में ठीक नहीं ठहराया जा सकता है। वास्तव में सामाजिक संबंधों को बनाए रखने के लिए हमें और हमारी युवा पीढ़ी को यह चाहिए कि हम इस आभासी दुनिया से बाहर निकलने का प्रयास करें। मनुष्य में संवेदनाएं होतीं हैं, एक मशीन में कभी भी संवेदनाएं नहीं हो सकतीं हैं। एक मशीन कभी भी मानव का स्थान नहीं ले सकती है,यह हमें समझना चाहिए। याद रखिए कि दुनिया का कोई भी इंसान कभी भी किसी मशीन से संचालित नहीं हो सकता है। कृत्रिम चीजें कृत्रिम ही रहेंगी। कहना ग़लत नहीं होगा कि मानवीय संवेदनाएं और अहसास कभी कृत्रिम नहीं हो सकते। आज शिक्षा में,हर क्षेत्र में तकनीकी का प्रयोग किया जा रहा है,यह ठीक है लेकिन तकनीक, तकनीक होती है। तकनीक सिर्फ़ मानव की सहयोगी मात्र हो सकती है, मानव का स्थान कभी भी नहीं ले सकती है।आज युवा पीढ़ी के लिए मोबाइल फोन एक स्टेटस सिंबल हो गया है। महंगे से महंगा मोबाइल फोन आज युवाओं के पास देखने को मिल जाएगा। लेकिन एक ओर जहां एंड्रॉयड मोबाइल शिक्षा में सहयोगी बनकर उभरा है वहीं दूसरी ओर पढ़ाई में अत्यधिक मोबाइल का प्रयोग विद्यार्थियों, हमारी युवा पीढ़ी के लिये अनेक प्रकार की मानसिक व शारीरिक समस्याएं खड़ी कर रहा है।आज ऑनलाइन शिक्षा के लिए मोबाइल फोन, इंटरनेट का इस्तेमाल अनिवार्य हो गया है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कहना ग़लत नहीं होगा कि अत्यधिक डिजिटल उपस्थित का हमारे ब्रेन पर काफी बुरे प्रभाव पड़ते हैं। इससे हमारे ध्यान केंद्रित करने और निर्णय लेने की क्षमताएं कम हो सकतीं हैं। स्क्रीन का नीला प्रकाश ‘मेलाटोनिन प्रोडक्शन’ में बाधा पैदा करता है और हमें ठीक से नींद नहीं आती है। आज स्क्रीन-टाइम की अधिकता हमारी क्षेत्रीय सांस्कृतिक गतिविधियों को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है, वहीं दूसरी ओर आज हम स्क्रीन टाइम पर लगातार व्यस्त रहकर हमारे समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, परंपराओं, संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, आपसी संवाद से नहीं जुड़ पाते हैं। अपने चारों ओर की दुनिया में क्या हो रहा होता है, हमें स्क्रीन टाइम के कारण इसका ठीक से भान तक नहीं होता है। जीवन की असली खुशियां स्क्रीन टाइम में नहीं, अपितु स्क्रीन से हटने में हैं। जीवन हमेशा स्क्रीन से परे है, यह वास्तविक है, आभासी नहीं। आज हम इमोजी, लाइक्स, शेयर, कमेंट्स की दुनिया तक सीमित हो चलें हैं। हमें सिर्फ और सिर्फ कैमरे, एंड्रॉयड मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, इंटरनेट से मतलब है, किसी और से नहीं, लेकिन याद रखिए कि जीवन कभी भी लाइक्स, कमेंट्स,शेयर या फालोवर्स की संख्या से नहीं चला करता है। जीवन को दोस्तों, परिवार, रिश्तेदारों का संग-साथ चाहिए होता है, जो कि वास्तविक होता है। वर्चुअल वर्ल्ड वास्तव में देखा जाए तो एक लत है, एक मायाजाल है। हमेशा गैजेट्स से घिरे लोग बेचैन रहते हैं, तनाव और अवसाद उनकी जिंदगी का हिस्सा हो चला है। कुछ समय पहले ही आस्ट्रेलिया ने स्कूलों में मोबाइल उपयोग पर रोक लगाई और अब दुनिया के तमाम विकसित देश मोबाइल के दुष्प्रभावों को देखते हुए स्कूलों में मोबाइल के उपयोग पर रोक लगा रहे हैं। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि अब तो यूनेस्को अर्थात संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन की दुनिया में शैक्षिक स्थिति पर नजर रखने वाली टीम ने भी स्मार्टफोन के उपयोग से विद्यार्थियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर चिंता जतायी है। गौरतलब है कि यूनेस्को की टीम के मुताबिक बीते साल के अंत तक कुल पंजीकृत शिक्षा प्रणालियों में से चालीस फीसदी ने सख्त कानून या नीति बनाकर स्कूलों में छात्रों के स्मार्टफोन के प्रयोग पर रोक लगा दी है। दरअसल, आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स व्हाट्स एप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब, ट्विटर, इंटरनेट पर अनेक प्रकार की अश्लील, फूहड़, भद्दी, अराजकता भरी बेलगाम अनुचित सामग्री परोसी जा रही है,जो हमारे बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क को लगातार प्रभावित कर रही है और उनका ध्यान अच्छी बातों, अनुशासन, सामाजिक संस्कारों से हटता चला जा रहा है। निस्संदेह, शिक्षकों अभिभावकों, माता पिता की देखरेख में सीखने की प्रक्रिया(लर्निंग प्रोसेस) में इंटरनेट, लैपटॉप, स्मार्टफोन का सीमित उपयोग तो लाभदायक सिद्ध हो सकता है, लेकिन इसका अंधाधुंध व गलत उपयोग घातक भी हो सकता है। आज बच्चे डिजिटल एमनीशिया(भूलने की बीमारी) का शिकार हो रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिखरी अनर्गल, अश्लील, फ़ूहड़ सामग्री हमारी युवा पीढ़ी को यौन कुंठित बना रही है। इतना ही नहीं एंड्रॉयड मोबाइल के लगातार प्रयोग से बच्चों की एकाग्रता भंग हो रही है। ऐसे में आज जरूरत इस बात की है कि वर्चुअल वर्ल्ड का सीमित व नियंत्रित उपयोग पर बल दिया जाए। वास्तव में,हमें डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाकर प्रकृति के सानिध्य में अपने मन-मस्तिष्क को तरोताजा महसूस करना चाहिए। इसके लिए हम प्राकृतिक वातावरण में घूम सकते हैं। दोस्तों, परिवार के सदस्यों संग बातचीत कर सकते हैं, इससे हमारा मन-मस्तिष्क फ्रेश होगा और चीजें हमें याद रह पाएंगी।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।

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