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संकट में वन्य जीव

admin
Last updated: अप्रैल 23, 2025 8:15 पूर्वाह्न
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संकट में वन्य जीव

 

 

वर्ल्ड वाइल्ड फंड एवं लंदन की जूओलॉजिकल सोसायटी की हालिया रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि 2020 तक धरती से दो तिहाई वन्य जीव खत्म हो जाएंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हो रही जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले चार दशकों में वन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1970 से 2012 तक वन्य जीवों की संख्या में 58 फीसद की कमी आई है। हाथी और गोरिल्ला जैसे लुप्तप्राय जीवों के साथ-साथ गिद्ध और रेंगने वाले जीव तेजी से खत्म हुए हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक 67 फीसद वन्य जीवों की संख्या में कमी आ सकती है।

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गौरतलब है कि खत्म हो रहे जीवों में जंगली जीव ही नहीं बल्कि पहाड़ों, नदियों व महासागरों में रहने वाले जीव भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से अब तक इन जीवों की संख्या में तकरीबन 81 फीसद की कमी आई है। जलीय जीवों के अवैध शिकार के कारण तीन सौ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। जलीय जीवों के नष्ट होने का एक अन्य कारण फफूंद संक्रमण और औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषण भी है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाएं, विभिन्न प्रकार के रोग, जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी भी प्रमुख कारण हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यूरोप के समुद्र में ह्वेल और डॉल्फिन जैसे भारी-भरकम जीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भीड़-बकरियों जैसे जानवरों के उपचार में दी जा रही खतरनाक दवाओं के कारण भी पिछले बीस सालों में दक्षिण-पूर्व एशिया में गिद्धों की संख्या में कमी आई है। भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में 97 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। गिद्धों की कमी से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और किस्म-किस्म की बीमारियां तेजी से पनप रही हैं। गिद्धों की तरह अन्य प्रजातियां भी तेजी से विलुप्त हो रही हैं।

 

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि पेड़ों की अंधाधुध कटाई और जलवायु में हो रहे बदलाव के कारण कई जीव जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर विविधता और पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं पर उसका नकारात्मक असर पड़ना तय है। यह आशंका इसलिए अकारण नहीं है कि पृथ्वी पर करीब बारह करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीव के समाप्त होने का कारण मूलत: जलवायु परिवर्तन ही था। अगर जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले वर्षों में धरती से जीवों का अस्तित्व मिटना तय है।

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धरती के साथ मानव का निष्ठुर व्यवहार बढ़ता जा रहा है जो कि जीवों के अस्तित्व के प्रतिकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारह हजार वर्ष पहले हिमयुग के खत्म होने के बाद होलोसीन युग शुरू हुआ था। इस युग में धरती पर मानव सभ्यता ने जन्म लिया। इसमें मौसम चक्र स्थिर था, इसलिए स्थलीय और जलीय जीव पनप सके। लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से जिस तरह परमाणु ऊर्जा के प्रयोग का दौर शुरू हुआ है और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है उससे होलोसीन युग की समाप्ति का अंदेशा बढ़ गया है। उसी का असर है कि आज वन्य जीव अस्तित्व के संकट से गुजर रहे है।

 

वन्य जीवों के वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पृथ्वी के समस्त जीवधारियों में से ज्ञात तथा वर्णित जातियों की संख्या लगभग अठारह लाख है। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या के तकरीबन पंद्रह फीसद से कम है। उसका कारण लाखों जीवों के बारे में जानकारी उपलब्ध न होना है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर विद्यमान कुल जातियों की संख्या पचास लाख से पांच करोड़ के बीच है। इनमें अधिकांश का वर्णन व नामकरण अब भी नहीं हो सका है। जबकि जीव जातियों की पहचान व इनके नामकरण का क्रमबद्ध कार्य पिछले ढाई सौ वर्षों से जारी है।

 

 

जहां तक भारत का सवाल है, तो यहां विभिन्न प्रकार के जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। जीवों की लगभग पचहत्तर हजार प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। इनमें तकरीबन 350 स्तरनधारी, 1250 पक्षी, 150 उभयचर, 2100 मछलियां, 60 हजार कीट व चार हजार से अधिक मोलस्क व रीढ़ वाले जीव हैं। भारत में जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं। इसके बावजूद जीवों का संहार जारी है। जैव विविधता को बचाने के लिए आवश्यक है कि जीवों को बचाया जाए। जैव विविधता एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जो यदि एक बार समाप्त हो गया तो उसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। अर्थात इसका विलुप्तिकरण सदैव के लिए हो जाता है।

 

गौर करें तो जीवों पर बढ़ते संकट का मुख्य कारण वायुमंडल के तापमान का बढ़ना, प्रदूषण का बढ़ता स्तर, जंगलों तथा भूमि का व्यापक कटाव, मनुष्यों की अदूरदर्शिता, क्लोनिंग व जैव तकनीक का बढ़ता प्रयोग तथा उच्च स्तरीय और कीट-प्रतिरोधी बीजों का विकास आदि हैं। अस्तिव के संकट में फंसे जीवों को बचाने के लिए जरूरी है कि धरती के बढ़ते तापमान और प्रदूषण की रोकथाम की ठोस पहल हो। जिस गति से धरती का तापमान बढ़ रहा है उससे आने वाले दिनों में वन्य जीवों का संकट गहरा सकता है। लिहाजा, उनके संरक्षण के लिए विशिष्ट परियोजनाएं बनाई जाएं तथा वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगे। इसके अलावा, वन क्षेत्र को कम करके कृषि विस्तार की योजनाआेंं पर भी रोक लगनी चाहिए। ‘स्थानांतरण खेती’ को नियंत्रित किया जाए तथा यदि संभव हो तो उसे समाप्त ही कर दिया जाए। नगरों के विकास के लिए भी वनों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए।

 

लेकिन त्रासदी है कि संपूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई जारी है। इस तरह हम देखते हैं कि जलवायु बदलाव के संकट के मूल में विकास का प्रचलित मॉडल है जो संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर आश्रित है। ‘ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट’ (जीएफआरए) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और 102,000 लाख एकड़ से अधिक का क्षेत्र 98,810 लाख एकड़ तक सिमट ढाई सौ वर्षों से चल रहा है। यानी 3,190 लाख एकड़ वनक्षेत्र में कमी आई है। गौर करें तो यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक वनक्षेत्र में छह फीसद की कमी आई है। उष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक दस फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। ये हालात तब हैं जब एक दशक से पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर सतत प्रयास जारी है।

 

एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक समुदाय विकास के नाम पर प्रत्येक वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनक्षेत्र का विनाश कर रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। ‘नेचर जिओसाइंस’ का कहना है कि ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की संख्या में वृद्धि हुई है जो वन्य जीवों व मानव जाति के अस्तित्व के लिए बेहद खतरनाक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी नब्बे फीसद है। विडंबना यह कि एक ओर प्राकृतिक आपदाओं से जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, वहीं रही-सही कसर इंसानी लालच और उसका शिकार का शौक पूरा कर दे रहा है। अभी पिछले दिनों ही इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक दशक में प्रतीक के लिए दुनिया भर में सत्रह लाख वन्य जीवों का शिकार (ट्राफी हंटिंग) किया गया। इनमें दो लाख विलुप्तप्राय जीव हैं।

 

दरअसल, इन वन्य जीवों के शिकारी जीवों के अंगों को महंगी कीमतों पर बेचते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मुंहमांगी कीमत मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक हाथी मारने की कीमत पच्चीस से साठ हजार डॉलर है। इसी तरह एक बाघ साढ़े आठ हजार से पचास हजार और तेंदुआ पंद्रह से पैंतीस हजार डॉलर तक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि शौक के लिए शिकार यानी ट्राफी हंटिंग को अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों ने मान्यता दे रखी है। ट्राफी हंटिंग में अमेरिकी शिकारी सबसे आगे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले एक दशक में दुनिया भर में ग्यारह हजार बाघों का शिकार किया गया जिनमें पचास फीसद बाघों को अमेरिकी शिकारियों ने मारा है। आश्चर्य की बात यह है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन यह तर्क दे रहा है कि अगर कानूनी दायरे में ट्राफी हंटिंग हो तो वन्य जीवों के संरक्षण में मदद मिलेगी और जीवों की आबादी नियंत्रित होगी। साथ ही स्थानीय लोगों को आर्थिक फायदा भी पहुंचेगा। लेकिन यह दलील सही नहीं है। सच यह है कि इससे वन्य जीवों की संख्या में कमी आएगी और पहले से ही लुप्त हो रहे जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।

विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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