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मध्य प्रदेशलेख

खेलो एमपी : मध्यप्रदेश में खेल संस्कृति की नई परम्पर

admin
Last updated: दिसम्बर 23, 2025 8:42 अपराह्न
By admin 12 Views
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8 Min Read
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*खेलो एमपी : मध्यप्रदेश में खेल संस्कृति की नई परम्पर*

(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)

मध्यप्रदेश में खेल अब केवल प्रतियोगिता नहीं रह गए हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और युवाओं की ऊर्जा को दिशा देने का माध्यम बनते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग की अगुवाई में प्रदेश सरकार ने खेलों को लेकर जो स्पष्ट सोच दिखाई है, वह खेलो एमपी के जरिए सामने आ रही है। यह आयोजन किसी एक शहर या वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि प्रदेश के हर कोने तक खेलों को पहुंचाने की कोशिश है।
बीते समय में खेलों को अक्सर शहरी केंद्रों से जोड़कर देखा गया। बड़े स्टेडियम, सीमित खिलाड़ी और चुनिंदा खेल,यही तस्वीर रही। लेकिन अब सरकार का फोकस गांव, कस्बे और ब्लॉक स्तर तक खेलों की पहुंच बनाने पर है। यही वजह है कि खेलो एमपी को प्रदेश का “ओलिम्पिक” कहा जा रहा है। यह केवल नाम नहीं, बल्कि संरचना और मंशा दोनों में दिखाई देता है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही खेलों को युवाओं से जोड़ने का एजेंडा स्पष्ट किया है। उनका मानना है कि खेल सिर्फ शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि अनुशासन, नेतृत्व और आत्मविश्वास का निर्माण करते हैं। इसी सोच के तहत प्रदेश सरकार खेलों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जोड़ने की दिशा में काम कर रही है। खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग भी लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि खेलों में भागीदारी बढ़ेगी तो प्रतिभा अपने आप सामने आएगी।
खेलो एमपी यूथ गेम्स इसी सोच का विस्तार है। जनवरी में प्रस्तावित यह आयोजन ब्लॉक से लेकर राज्य स्तर तक एक सुनियोजित श्रृंखला में होगा। इसका उद्देश्य यह है कि कोई भी खिलाड़ी केवल संसाधनों की कमी या मंच न मिलने के कारण पीछे न रह जाए। प्रदेश के सभी 313 ब्लॉकों में प्रतियोगिताओं का आयोजन इस बात का संकेत है कि सरकार खेलों को केवल इवेंट नहीं, बल्कि जनआंदोलन के रूप में देख रही है।
खेलो एमपी की सबसे अहम विशेषता यह है कि इसमें खेल विभाग और खेल संघ एक साथ काम कर रहे हैं। पहले यह अक्सर देखने में आता था कि चयन प्रक्रिया और प्रतियोगिताएं अलग-अलग दिशाओं में चलती थीं। अब यह प्रयास किया गया है कि आयोजन, चयन और प्रशिक्षण एक ही धारा में आगे बढ़ें। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि राज्य की टीमों के गठन में भी मजबूती आएगी।
प्रदेश के अलग-अलग संभागों (भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा, सागर, उज्जैन और शहडोल) को आयोजन से जोड़कर यह सुनिश्चित किया गया है कि भौगोलिक संतुलन बना रहे। आदिवासी अंचल से लेकर औद्योगिक शहरों तक, हर क्षेत्र की खेल प्रतिभा को सामने लाने की कोशिश की जा रही है। यह वह वर्ग है, जहां अक्सर खेलों के प्रति जुनून तो होता है, लेकिन अवसर नहीं मिल पाते।
इस पूरी कवायद के बीच सांसद खेल महोत्सव का अनुभव भी अहम है। हाल ही में मध्यप्रदेश की हर लोकसभा सीट पर सांसद खेल महोत्सव का आयोजन हुआ। इन आयोजनों में ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया। सांसदों की मौजूदगी और स्थानीय स्तर पर प्रतियोगिताओं ने यह साफ कर दिया कि खेल अब जनप्रतिनिधियों के एजेंडे का हिस्सा बन चुके हैं। इन महोत्सवों से यह भी सामने आया कि प्रदेश में खेल प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, जरूरत सिर्फ मंच और निरंतरता की है।
सांसद खेल महोत्सव ने खेलो एमपी जैसे बड़े आयोजन के लिए जमीन तैयार की है। लोकसभा स्तर पर हुए इन आयोजनों ने यह साबित किया कि जब स्थानीय स्तर पर खेलों को प्रोत्साहन मिलता है, तो युवाओं की भागीदारी स्वतः बढ़ती है। यही मॉडल अब राज्य स्तर पर विस्तार पा रहा है। खेलो एमपी उसी अनुभव को एक व्यवस्थित ढांचे में बदलने की कोशिश है।
प्रदेश सरकार ने इस बार पारंपरिक खेलों को भी विशेष महत्व दिया है। पिट्ठू और रस्साकशी जैसे खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिकता और टीम भावना के प्रतीक हैं। इन्हें राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल करना सांस्कृतिक जुड़ाव का संकेत है। इसके साथ ही क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल को भी औपचारिक रूप से शामिल किया गया है, जिससे युवाओं की रुचि और भागीदारी दोनों बढ़ें।
खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग का जोर इस बात पर है कि खिलाड़ियों को किसी भी स्तर पर खुद को अकेला न महसूस करना पड़े। नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, व्यवस्थाओं का दावा और अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन की तैयारी इस दिशा में उठाए गए कदम हैं। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि खिलाड़ी सिर्फ प्रतियोगिता के दिन नहीं, बल्कि पूरे सफर में सिस्टम का हिस्सा है।
खेलों के प्रति यह सक्रियता केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं है। सांसद खेल महोत्सव में 25 दिसंबर को एक बड़ा संदेश देशभर को दिया जाएगा। इस दिन महोत्सव का समापन होगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअली खिलाड़ियों और आयोजकों को संबोधित करेंगे। यह संबोधन सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि उस नीति का प्रतीक है जिसमें खेलों को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा जा रहा है और खेलों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच सोच का सामंजस्य है। केंद्र स्तर पर खेलों के लिए सकारात्मक माहौल बनाने की बात हो या राज्यों में आयोजन को बढ़ावा देना,दोनों एक ही दिशा में चलते नजर आते हैं। मध्यप्रदेश इस नीति को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहा है।
खेलो एमपी और सांसद खेल महोत्सव जैसे आयोजन यह भी संकेत देते हैं कि खेल अब केवल पदक जीतने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का माध्यम बन रहे हैं। गांवों में आयोजित प्रतियोगिताएं बच्चों और युवाओं को नशे और निष्क्रियता से दूर रखने का भी काम कर रही हैं। खेल मैदान अब सिर्फ प्रतिस्पर्धा के नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता के केंद्र बनते जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की खेलों को लेकर सक्रियता से स्पष्ट है कि सरकार इसे दीर्घकालिक निवेश के रूप में देख रही है। खेलों से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं, आयोजन और प्रतिभा खोज,तीनों स्तरों पर काम किया जा रहा है। खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग भी बार-बार यह दोहराते रहे हैं कि यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि प्रदेश की खेल नीति की दिशा तय करने वाला कदम है।
मध्यप्रदेश में खेलों का यह नया दौर अभी आकार ले रहा है। सांसद खेल महोत्सव से लेकर खेलो एमपी तक, यह सिलसिला संकेत देता है कि आने वाले समय में प्रदेश खेल मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाने की तैयारी में है। युवाओं की भागीदारी, जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और सरकार की स्पष्ट मंशा,तीनों मिलकर एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जहां खेल केवल शौक नहीं, बल्कि भविष्य का रास्ता बन सकते हैं।
25 दिसंबर को प्रधानमंत्री का वर्चुअल संबोधन इस पूरी प्रक्रिया को एक राष्ट्रीय संदर्भ देता है। यह संदेश जाता है कि खेल अब हाशिये का विषय नहीं रहे। मध्यप्रदेश इस सोच को अपनाकर आगे बढ़ रहा है और खेलो एमपी उसी दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। *(विनायक फीचर्स)*

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