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क्षेत्रीय दलों की ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ से बड़े दल परेशान, ‘टू विंडो फाइट’ का प्लान! जानिए उनके विकास और पतन के क्या है कारण?

admin
Last updated: जुलाई 27, 2022 7:10 अपराह्न
By admin 9 Views
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Political Parties

देश की राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक बार फिर क्षेत्रीय दलों और छोटे दलों की नेतृत्व क्षमता और सियासी महत्वकांक्षा पर बड़े सवाल उठने शुरु हो गए हैं. जहां महाराष्ट्र में महाअघाड़ी का मुद्दा हो या उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और राजभर सरीखे सहयोगियों के साथ तनाव वाला रिश्ता. ऐसे में छोटे दलों के साथ गठबंधन के लाभ-हानि का मुद्दा फिर से जोरों पर बहस चल रही है. दरअसल, छोटे दलों के साथ सरकार बनाने के चक्कर में अक्सर ‘भानुमति का कुनबा’ ही जुड़ता है. ऐसे दलों के साथ बनने वाली किसी भी सरकार पर इन छोटे दलों का बड़ा दबाव रहता है. उनकी बड़ी आकांक्षाओं और कार्यकर्ताओं की महत्वकांक्षाओं में बड़े दलों को अक्सर सिद्धांतों से भी समझौता करना पड़ता है.

Contents
क्षेत्रीय दलों की घट रही ‘ताकत’जानिए उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय दलों का हाल?बसपा का हाथी भी हुआ कमजोरबड़े दलों का प्लान ‘टू विंडो फाइट’

वहीं, महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और NCP के गठबंधन से बनी सरकार को ‘महाअघाड़ी’ नाम दिया गया था. लेकिन करीब 943 दिन चली और जिस तरह से उद्धव के हाथ से सत्ता फिसली उसमें उनके विधायकों की बगावत ही तो वजह रही क्योंकि, विधायकों के बागी होने में उनकी महत्वकांक्षाओं का अहम रोल दिखा. नेतृत्व क्षमता पर सवाल इसलिए कि, सरकार में रहकर भी उद्धव आखिर अपने ही विधायकों को संभाल क्यों नहीं पाए?

क्षेत्रीय दलों की घट रही ‘ताकत’

वहीं, जनआकांक्षाओं से जन्मे या जातीय अंकुर से उपजे क्षेत्रीय दलों में उभार के समय तो शक्ति दिखाई दी. लेकिन समय के साथ ही ये क्षेत्रीय क्षत्रप ‘कमजोरी’ के शिकार होते जा रहे हैं. कई दलों के पतन की जांच रिपोर्ट में ‘सियासी ब्लैकमेलिंग’ और ‘मौकापरस्ती’ जैसे लक्षण पाए गए है. जहां बीच मझधार में साथ छोड़ देने या शर्तें लागू कर देने की आदत के चलते भी ये छोटे दल बड़ी पार्टियों का भरोसा खोते जा रहे हैं.

जानिए उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय दलों का हाल?

बता दें कि, उत्तर प्रदेश में वैसे तो तमाम सियासी दल हैं, लेकिन बड़े फलक वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों को देखें तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सरीखे दलों में भी वही ‘कमजोरी’ महसूस की गई है. ऐसे में सपा की बात करें तो चुनाव दर चुनाव हालात चिंतनीय हो रहे हैं. जोकि बीते एक दशक में पार्टी में ‘दुबलापन’ बढ़ता ही गया है. जहां साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी को हराते हुए शानदार बहुमत प्राप्त किया. चुनावों के बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने सरकार बनाई. लेकिन उसके बाद से पार्टी लगातार चुनाव हारती रही. 2014 का लोकसभा चुनाव, 2017 का विधानसभा चुनाव, 2017 का निकाय चुनाव, 2021 का पंचायत चुनाव और 2021 के विधानपरिषद के चुनाव में सपा बुरी तरह हारी. तमाम दावों के बाद भी 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी जनता का विश्वास नहीं जीत पाए. राजभर के साथ जिस तरह से गठबंधन टूटा है, वो भी चर्चा का विषय है. राजभर लगातार अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं. पहले राज्यस्भा चुनाव फिर विधानपरिषद और फिर उपचुनाव के बाद तो राजभर अखिलेश यादव पर तंज कसते दिखे. कहने वाले कह रहे हैं कि, राजभर MLC सीट ना दिए जाने से नाराज हैं. ये नाराजगी राष्ट्रपति चुनाव में जगजाहिर हो गई.

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बसपा का हाथी भी हुआ कमजोर

बता दें कि, साल 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने सरकार बनाई थी. वहीं 2012 में समाजवादी पार्टी से करारी हार का सामना करना पड़ा. यानि, 2012 में बहन जी के ‘दलित-मुस्लिम’ समीकरण वाले ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का फॉर्मूला फेल हो गया. यहां भी ये सवाल उठता है कि, क्यों कमजोर हुई बसपा? 2007 में हुए विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी ने 403 में से सबसे ज्यादा 206 सीट जीती थीं. लेकिन 2017 और 2022 के चुनाव परिणाम ने तो बसपा के भविष्य पर ही सवाल खड़े कर दिए. इस बीच नसीमुद्दीन सिद्दीकी से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य, राम अचल राजभर सरीखे बड़े नेता बसपा छोड़ कर चले गए. इधर बिहार में भी ढहती दिखी छोटे दलों की बुनियाद, हाल ही में बिहार में ओवैसी की पार्टी के 5 में से 4 विधायक RJD के पाले में जा खड़े हुए थे.

बड़े दलों का प्लान ‘टू विंडो फाइट’

सत्ता संघर्ष की इस सियासत में बीजेपी-कांग्रेस सरीखे बड़े दलों की रणनीति भी अब छोटे दलों को लेकर नरम नहीं बल्कि निर्मम हो रहे है. छोटे दलों के साथ के बजाए ये बड़े दल अब दो टू विंडो फाइट (राष्ट्रीय दलों में सियासी लड़ाई) को ही टाइट रखना चाहते हैं. क्योंकि, छोटे दलों की सियासी अकांक्षाएं और महत्वकांक्षाएं बड़े दलों की सरकार में परेशानी का सबब ही बनती है. महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में छोटे दलों के घटते प्रभाव पर एक सवाल ये भी है कि, क्या अब छोटे दलों के लिए खतरें की घंटी बज गई है.

कलप्रिट तहलका (राष्ट्रीय हिन्दी साप्ताहिक) भारत/उप्र सरकार से मान्यता प्राप्त वर्ष 2002 से प्रकाशित। आप सभी के सहयोग से अब वेब माध्यम से आपके सामने उपस्थित है।
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