थोड़ा थोड़ा पढ़ा करो
इन दिनों एक ‘मीम’ हर किसी ने अपने फोन पर देखा होगा । ‘मीम’ का विषय है- बच्ची का फोन से ध्यान भटकाने के लिए बिल्ली लाए, अब बच्ची और बिल्ली दोनों मिल कर फोन देख रहे हैं। यह समस्या सिर्फ बच्चों की नहीं है। इक्कीसवीं सदी अपने फोन पर झुके लोगों की सदी बन चुकी है जिन्हें सिर उठा कर सामने की हकीकत देखने की फुर्सत नहीं है। अखबार से लेकर मुद्रण से जुड़ा हर मंच आशंका जाहिर कर रहा कि इस पेशे में हम कहीं आखिरी पीढ़ी न हों।
किताबें सबसे अच्छी दोस्त हैं, किताबें सबसे अच्छा तोहफा हैं, किताबों की चोरी, चोरी नहीं कही जाती । किताबों के बारे में ये सब अच्छी-अच्छी बातें कहते एक दिन पूरी दुनिया कोरोना विषाणु के संक्रमण का शिकार हो गई। आज लगभग पांच साल बाद कुछ लोगों के लिए तो लगता है कोरोना कभी आया ही नहीं था और कुछ लोगों को लगता है कि 2020 के बाद उन्होंने बहुत कुछ खो दिया। कोरोना काल में तो हमने बहुत कुछ खोया, पर आज सबसे ज्यादा कसक है किताबों के खोने की । ऐसा नहीं है कि कोरोना के बाद छापेखाने बंद हो गए हैं, किताबों का प्रकाशन और खरीद-बिक्री बंद हो गई है। बस अब किताबों को पढ़ने वाले तेजी से कम होते जा रहे हैं। कई घरों में रस्मी तरीके से पहले की तरह किताबें खरीदी जाती हैं, लेकिन पढ़ी नहीं जाती हैं। दिल्ली के खान मार्केट में एक प्रसिद्ध किताब विक्रेता बता रहे थे कि अब लोग अपने घर की साज-सज्जा के हिसाब से किताबें खरीद कर ले जाते हैं। एक ही रंग और आकार की किताबें । किताबें तो अब बाथरूम और रसोईघरों में भी रखी जाती हैं लेकिन सिर्फ सज्जा के दृष्टिकोण से ।
युवा पीढ़ी तर्क दे रही है कि क्या आनलाइन किताबें पढ़ना, पढ़ना नहीं है। बिल्कुल है, अगर सिर्फ आप किताब पढ़ने के किसी मंच पर हैं। वहीं, फोन पर भटकाव इतना होता है कि एक तरफ आप कोई नारीदवादी लेख पढ़ रहे होते हैं, दूसरी तरफ स्त्री – विरोधी ‘रील’ को देख कर हंसने लगते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपनी ताजपोशी के बाद हर किसी पर अपना गुस्सा निकाला लेकिन चीनी कंपनी ‘टिकटाक’ पर मेहरबानी रखी क्योंकि उनके ‘टिकटाक’ पर उनकी दृश्यता सबसे ज्यादा रही। यानी उनकी लोकप्रियता बढ़ाने में ‘टिकटाक’ का अहम योगदान रहा। मुश्किल यह है कि अब सत्ता की भी चाह यही है कि आप पढ़ें कम, देखें ज्यादा। कम पढ़ना और ज्यादा दृश्यता हमारी तर्कशक्ति को प्रभावित करती है। देखने के बाद कुछ चीजों को हम पसंद करते हैं या नापसंद करते हैं। लेकिन उस पर बाद में सोचते नहीं हैं। खास कर इंटरनेट की अति दृश्यता बच्चों की दिमागी क्षमता को प्रभावित कर रही है। बच्चे फोन और टीवी का स्क्रीन देखने वाले एक निष्क्रिय दर्शक बन कर रह जाते हैं ।
कृत्रिम बौद्धिकता के इस युग में सबसे जरूरी यह है कि हम अपनी और अपनी संततियों की कुदरती बौद्धिकता बनाए रखें। हम कुछ सोच-समझ पाएं और चीजों पर सार्थक बहस कर पाएं। इसके लिए सबसे जरूरी है कि अभिभावक भी किताबें पढ़ने की आदत बनाएं। छुट्टी के दिन हर कोई अपनी पसंद के अनुसार कोई किताब पढ़े और घर के बाकी सदस्यों से उसकी चर्चा करे। कोरोना के बाद हुए शोध बताते हैं कि किताबें पढ़ना 68 फीसद तक तनाव कम कर सकता है। स्क्रीन पर ढेर सारे दृश्य, तेज आवाज, तेज रंग सब इतनी तेजी से आते हैं कि हमारा दिमाग अपनी तरफ से सक्रिय नहीं होता। इसके बरक्स शब्दों के लिए आप अपने हिसाब से रंग और आवाज खोजते हैं जो सुकून देते हैं। नियम बनाएं, हर दिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ा करें।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
