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लेख

Article : साहित्य के विद्रोही योद्धा कथाकार ज्ञानरंजन

admin
Last updated: जनवरी 8, 2026 9:20 अपराह्न
By admin 4 Views
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8 Min Read
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स्मृति शेष

*साहित्य के विद्रोही योद्धा कथाकार ज्ञानरंजन*

(संदीप सृजन-विभूति फीचर्स)

ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य की दुनिया में एक ऐसा नाम है जो कहानी विधा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले रचनाकारों में शुमार रहे। वे न केवल एक उत्कृष्ट कहानीकार थे, बल्कि ‘पहल’ जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका के संपादक के रूप में भी जाने जाते हैं। उनकी रचनाएं मानव संबंधों की जटिलताओं, सामाजिक विडंबनाओं और व्यक्तिगत संघर्षों को इतनी गहराई से उकेरती हैं कि पाठक खुद को उनमें झांकता हुआ पाता है। साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख लेखकों में से एक ज्ञानरंजन का योगदान हिंदी साहित्य को आधुनिकता और विद्रोही स्वर प्रदान करने में अहम रहा है।
ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुआ था। उनका बचपन और किशोरावस्था विभिन्न शहरों में बीती, जिसमें अजमेर, दिल्ली और बनारस शामिल हैं। उच्च शिक्षा उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की, जहां डॉ. धीरेंद्र वर्मा से लेकर धर्मवीर भारती तक जैसे विद्वान उनके शिक्षक रहे। इलाहाबाद उनके लिए प्रिय शहर रहा, जहां उन्होंने साहित्यिक माहौल में खुद को तराशा। बाद में वे जबलपुर में स्थायी रूप से बस गए, जहां से उन्होंने अपनी साहित्यिक गतिविधियां संचालित की, यहीं जबलपुर विश्वविद्यालय से उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि भी मिली।
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि साधारण थी, लेकिन साहित्य के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही थी। साठ के दशक में वे ‘चार यार’ मंडली के सदस्य बने, जिसमें दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया जैसे लेखक शामिल थे। यह मंडली हिंदी साहित्य में एक नई लहर लेकर आई, जो परंपरागत साहित्य से विद्रोह करती हुई आधुनिक मुद्दों पर केंद्रित थी। ज्ञानरंजन की सोच में विद्रोह का तत्व प्रमुख था। चाहे वह सामाजिक मानदंडों के खिलाफ हो या अंतरंग रिश्तों के प्रति। उन्होंने कभी भी साहित्य को मात्र मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे समाज की आलोचना और आत्म-निरीक्षण का उपकरण बनाया। उनकी जीवनशैली सादगीपूर्ण रही। वे लेखन में गुणवत्ता पर जोर देते थे, यही कारण है कि उन्होंने मात्र 25 कहानियां लिखीं और फिर लेखन बंद कर दिया। उनका मानना था कि केवल सर्वोत्तम रचनाएं ही दुनिया के सामने आनी चाहिए। उनके साक्षात्कार अक्सर विवादास्पद होते थे, जैसे नामवर सिंह के लेखन पर उनकी टिप्पणियां, जो साहित्यिक जगत में बहस छेड़ देती थीं।
ज्ञानरंजन का साहित्यिक योगदान मुख्य रूप से कहानी विधा में है, लेकिन उन्होंने संस्मरण, निबंध, संपादकीय और साक्षात्कार भी लिखे। वे साठोत्तरी कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे, जहां कहानियां यथार्थवाद से आगे बढ़कर व्यक्तिवाद और सामाजिक विडंबनाओं को छूती हैं। उनकी रचनाएं मानव मन की गहराइयों को खंगालती हैं, जहां संबंधों की जटिलता, अलगाव और अस्तित्व की व्यर्थता प्रमुख थीम हैं। उनकी कहानियां सामान्य जीवन की असामान्य घटनाओं को केंद्र में रखती हैं। उदाहरणस्वरूप, उनकी रचनाएं पिता-पुत्र संबंध, प्रेम की विफलताएं और सामाजिक बंधनों को तोड़ने की कोशिशों को दर्शाती हैं। ज्ञानरंजन ने साहित्य को एक संग्रहालय की तरह देखा, जहां हर विभाग को भरा-पूरा होना चाहिए। उनका लेखन विद्रोही है, लेकिन सूक्ष्म और संवेदनशील। उन्होंने हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया, क्योंकि उनकी कहानियां रूसी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में अनूदित हुईं। लंदन पेंग्विन की भारतीय साहित्य एंथोलॉजी में उनकी कहानी शामिल होना इसका प्रमाण है।
उनका योगदान केवल लेखन तक सीमित नहीं। उन्होंने युवा लेखकों को प्रोत्साहित किया और साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से नई प्रतिभाओं को मंच दिया। उनकी रचना प्रक्रिया अनोखी थी। वे कहानी को जीवन के अनुभवों से निकालते थे, लेकिन उसे कलात्मक रूप से गढ़ते थे। जैसे उनकी कहानी ‘पिता’ में पिता-पुत्र के संबंध की विडंबना इतनी जीवंत है कि पाठक भावुक हो जाता है।
कुल मिलाकर, ज्ञानरंजन ने हिंदी कहानी को एक नया आयाम दिया, जहां व्यक्तिगत अनुभव सामाजिक संदर्भ से जुड़ते हैं। कहानियों के अलावा, उन्होंने ‘कबाड़खाना’ नामक संकलन में संस्मरण, संपादकीय, निबंध और पत्र एकत्र किए। ‘उपस्थिति का अर्थ’ उनकी व्याख्यानों, वक्तव्यों और साक्षात्कारों पर आधारित पुस्तक है। एक उपन्यास-अंश भी उन्होंने लिखा, लेकिन पूरा उपन्यास नहीं। उनकी रचनाएं दूरदर्शन पर फिल्माई गईं और अमेरिका में ‘विलेज वॉयस’ द्वारा फिल्म निर्माण हुआ। ओसाका, लंदन, सैन फ्रांसिस्को जैसे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनकी कहानियां पढ़ाई जाती हैं। इन रचनाओं में ज्ञानरंजन की शैली सरल लेकिन गहन है। वे वाक्यों को इतनी सटीकता से गढ़ते थे कि हर शब्द अर्थपूर्ण लगता है। उनकी कहानियां पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं, और यही उनकी सफलता का राज है।
ज्ञानरंजन का संपादन कार्य उनके साहित्यिक योगदान का अभिन्न अंग है। वे ‘पहल’ पत्रिका के संस्थापक संपादक थे, जिसे हिंदी साहित्य की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में गिना जाता है। 1973 में शुरू हुई ‘पहल’ ने आपातकाल के दौरान भी अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। उन्होंने 90 अंक निकाले, फिर 2008 में संपादन बंद किया। 2013 में अंक-91 से दूसरी पारी शुरू हुई, जो अप्रैल 2021 तक (अंक-125) चली। अंतिम अंक को उन्होंने अंतिम घोषित किया। ‘पहल’ ने हिंदी साहित्य को नई दिशा दी। इसमें प्रगतिशील, वामपंथी और आधुनिक विचारों वाली रचनाएं प्रकाशित हुईं। ज्ञानरंजन ने इसमें युवा लेखकों को स्थान दिया, जिससे कई नई प्रतिभाएं उभरीं। पत्रिका का संपादकीय हमेशा विचारोत्तेजक होता था, जो सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करता था। आपातकाल के दौरान भी ‘पहल’ ने सेंसरशिप का सामना किया लेकिन अपनी आवाज नहीं खोई। यह पत्रिका हिंदी साहित्य की धरोहर है, और ज्ञानरंजन का संपादन कौशल इसमें स्पष्ट दिखता है।
ज्ञानरंजन को उनके योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले। इनमें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, अनिल कुमार और सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार, मध्यप्रदेश शासन का शिखर सम्मान तथा राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान शामिल हैं। जबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी.लिट. भी प्रदान किया गया। ये सम्मान उनके साहित्यिक महत्व को रेखांकित करते हैं। ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य के एक ऐसे स्तंभ थे जिन्होंने कहानी को नई गहराई दी और संपादन के माध्यम से साहित्यिक संस्कृति को समृद्ध किया। उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे मानव जीवन की शाश्वत समस्याओं को छूती हैं। 7 जनवरी 2026 को उनके निधन से हिंदी साहित्य ने एक महान कथाकार खो दिया, लेकिन उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। वे साहित्य के विद्रोही योद्धा थे। भविष्य की पीढ़ियां उन्हें सदैव याद रखेंगी। विनम्र श्रद्धांजलि…। *(विभूति फीचर्स)*

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