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Article : बाजार का संजाल

admin
Last updated: जनवरी 10, 2026 8:50 अपराह्न
By admin 4 Views
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7 Min Read
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बाजार का संजाल

वर्तमान समय बाजार का समय है। बाजार मनुष्य की सुविधाओं के लिए शताब्दियों से काम करता रहा है। वह मनुष्य के लिए एक जरूरी जरिया है, जिसमें वह अपनी जरूरत की चीजों का लेन-देन करता है। मगर आज यही बाजार किस तरह मनुष्य को अपनी ही इच्छाओं का गुलाम बनने को विवश करने लगा है, कोई भी व्यक्ति इस साधारण-सी प्रक्रिया पर गौर नहीं करता। हर चीज में, स्थिति में व्यावसायिक अवसर तलाशने की बाजारी प्रवृत्ति ने बाजार को मानव समाज और उसकी संस्कृति के लिए एक ऐसे स्थायी खतरे में तब्दील कर दिया है, जिससे बचने के लिए हर संभव कदम उठाना आवश्यक हो गया है। बिना नियम, नैतिकता, भावना और संवेदना के बाजार मनुष्य को एक ऐसी कठपुतली के रूप में देखता है, जिसे जब चाहे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अधिकतम लाभ कमाने के लक्ष्य के साथ बाजार ने मानवीय जीवन के हर पहलू और पड़ाव में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। वह आपदा में अवसर देखने के आर्थिक दृष्टिकोण को मानते हुए ऐसी अंधी दौड़ में मनुष्य को धकेलता है, जिसका कोई अर्थ किसी के लिए नहीं होता ।
बाजार हमें आखिर में यही कहता है कि खुद को महसूस करो, खुद की सुंदरता को पहचानो, चीजों को उसके बाह्य दृश्य से नहीं, भावना से परखो । बाजार यही बात सीधे-सीधे नहीं कहता, क्योंकि सीधे कहने से उसका काम नहीं चलता। वह मनुष्य को झूठे स्वप्न दिखाता है, उसमें हीनता पैदा करता है और भ्रमित करने वाली आकांक्षाएं उपजाता है। वह प्रचार के नारों के माध्यम से एक ऐसी हवा बनाता है, जिसमें व्यक्ति महसूस करता है कि वह जो है, वह खुद सही नहीं है। बाकी दूसरी चीजें अपनी जगह बिल्कुल ठीक
। ऐसी हवा पैदा करके ही मनुष्य को
दौड़ाया जा सकता है। बाजार ‘जो हम हैं’ से ‘जो हमें होना चाहिए’ की ओर लेकर जाता है । हमारे पास जो है, वह हमारे लिए पूरा नहीं है । दूसरे के पास जो है, वह उसके लिए पूरा है। इसलिए बाजार सबके लिए जरूरी हो जाता है। क्या आज के समय में हम इसे जरूरत तक सीमित कर सकते हैं ?
नहीं
अक्सर हम देखते हैं कि बाजार हमें सुरक्षा के नाम पर हमारी शिक्षा, नुस्खों, पुरातन तरीकों और जड़ों से अलग करता है और फिर उन्हीं चीजों को चलन बनाकर हम तक पहुंचाता है। हमारी दिनचर्या में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां लोग अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक तत्त्वों की स्वीकार्यता के लिए बाजार द्वारा चालित सामयिक फैशन की
तरफ देखते हैं। इसी वजह से यह संभव होता है कि बाजार उन पुरानी चीजों को, जिन्हें मनुष्य समय के प्रवाह में कई- कई बार छोड़ चुका है, उन्हें भी फैशन के नाम पर चला है। अधिकतर लोगों के पास चीजों को देखने का कोई विशेष ढंग नहीं होता, वे दूसरों की हां में हां मिलाते हैं ।
हमारे समाज की पूरी मानसिकता ‘दूसरे क्या कहेंगे’ पर टिकी हुई है, लेकिन जब सब एक जैसा ही हो, तो दूसरे के कहने के लिए कुछ बचता ही कहां है ! हम अपने पैसे खर्च करके इसी तरह बाजार का गुणगान भी करते हैं । हम दूसरों की तरह दिखना चाहते हैं, उनकी तरह होना चाहते हैं, बाजार सभी को एक सम धरातल पर ले आता है, लेकिन ऐसा कर- के वह उसे व्यक्ति से उपभोक्ता में तब्दील करता है। उपभोक्ता की कोई निजी पसंद नहीं होती और उसका कोई निर्णय नहीं होता। वह उन चीजों का उपभोग करता है, जो उसके लिए बनाई जाती है। इस तरह इस समानता की कीमत अपने व्यक्तित्व और विविधता को खोने के रूप में सभी चुकाते हैं, लेकिन तब भी कोई बेचैनी व्यक्ति में नहीं होती, क्योंकि इस बेचैनी को, सोचने की क्षमता को नष्ट करके ही ये सब चीजें जगह बनाती । बाजार मनुष्य को उपभोक्ता बनाकर उसकी मूल पहचान को ही एक तरह से संकट में डाल देता है ।
मनुष्य की अस्मिता उसकी बुद्धि, विचारशीलता, नैतिकता और विवेक से बनती है । वह केवल अपने सही-गलत के बारे में ही नहीं पर्यावरण और अन्य प्राणियों के बारे में भी सोच सकता है और सोचता रहा है । संस्कृति और समाज के साथ ही अन्य जैविक – अजैविक सत्ताओं के प्रति उसका दायित्व ही उसे मनुष्य बनाता है। मगर उपभोक्ता बनाकर बाजार मनुष्य के विवेक, विचार, व्यवहार और भावों को नियंत्रित करता है । वह मनुष्य के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक संबंधों में बदलाव करता है और मनुष्य को उसकी गरिमा से स्खलित कर एक ऐसे पुतले में बदल देता है, जिसे अपने
स्वार्थ के अनुसार चलाना संभव होता है । व्यक्ति, व्यक्तिगत नहीं होकर भीड़ का हिस्सा मात्र बनकर रह जाता है। अकेले व्यक्ति को नियंत्रित करना जितना मुश्किल है, उसे भीड़ का हिस्सा बनाकर नियंत्रित करना उतना ही आसान है ।
बाजार हमारी जरूरतों को संचालित करने वाले केंद्र से कब ‘बाजारवाद’ की तरफ झुकने लगता है और कब हम बाजारीकरण की प्रक्रिया की गिरफ्त में आने लगते हैं, इन बिंदुओं को समझे बिना हम बाजार के प्रभाव का सही आकलन नहीं कर सकते हैं। जब हम बाजार से परे मानवीय अस्तित्व को समझ पाएंगे, तभी अपने ही बनाए खिलौने के हाथों मनुष्य के कैद होने की त्रासदी को सही मायने में महसूस कर पाएंगे ।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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