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एंबुलेंस ‘माफिया’ गिरोह मेडिकल कॉलेज में सक्रिय, प्राईवेट अस्पताल पहुंचाने के लिए तीमारदारों से वसूलते हैं मोटी रकम

अमित माथुर(उप संपादक)
एटा। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में फरवरी माह में पुलिस ने एंबुलेंस माफिया गिरोह के सात लोगों को गिरफ्तार किया था जिसमें जो खुलासा हुआ वो‌ चौंकाने वाला था एंबुलेंस माफिया पुलिस से लेकर अफसरों को भी पैसा देते थे।
ऐसी स्थिति अब एटा के मेडिकल कॉलेज में भी बनती दिख रही है मेडिकल कॉलेज में निजी एम्बुलेंस माफिया गिरोह द्वारा निजी अस्पताल में मरीजों को ले जाने की खबरें आये दिन मीडिया में चर्चा का केंद्र बिंदु बनती रहती हैं लेकिन मेडिकल कॉलेज प्रशासन इसपर आंखें बंद करके बैठा रहता है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी वार्ड में घात लगाकर बैठे दलाल फोन पर निजी एंबुलेंस चालकों को सूचना दे देते हैं और सूचना मिलते ही मरीज के परिजनों से मोटी रकम वसूलकर एंबुलेंस माफिया कमीशन देने वाले निजी अस्पतालों में मरीजों को पहुंचा देते हैं।
आज मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी पर निजी एंबुलेंस द्वारा निजी अस्पताल में एक्सीडेंट के मरीज को ले जाने का वीडियो एक न्यूज चैनल के संवाददाता ने चलाया लेकिन मेडिकल कॉलेज प्रशासन लगातार ऐसी खबरें चलने के बाद भी मेडिकल कॉलेज में अवैध एंबुलेंस के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं करता।
अब सवाल यह है कि आखिर निजी एंबुलेंस मेडिकल कॉलेज परिसर में किसकी इजाजत से जाती है और अगर मेडिकल कॉलेज प्रशासन की इजाजत से नहीं जाती हैं तो वहां तैनात सुरक्षाकर्मी इन निजी एंबुलेंस को मेडिकल कॉलेज परिसर में जाने से क्यों नहीं रोकते…?

एंबुलेंस माफिया ठगी ही नहीं… मरीजों की जान भी जोखिम में डालते है…..
इमरजेंसी पड़ने पर एंबुलेंस के दलाल तीमारदार को ऐसा समझाते हैं कि उसे निजी अस्पताल में समय से नहीं पहुंचाया तो उनकी जान ही चली जाएगी। परेशान लोगों को यही सच्चे मददगार नजर आते हैं और मजबूरी में मुफ्त की सेवा का पांच हजार से सात हजार रुपये दे देते हैं।
एंबुलेंस माफिया मरीजों के साथ सिर्फ ठगी ही नहीं करते बल्कि जान भी जोखिम में डाल रहे हैं। इनके एंबुलेंस में ऑक्सीजन, पैरा मेडिकल स्टॉफ जैसी कोई सुविधा नहीं होती हैं, जिससे इमरजेंसी में मरीज की जान बचाई जा सके। वह सिर्फ टैक्सी ही है। मेडिकल कॉलेज से प्राइवेट अस्पताल ले जाने के बीच मरीजों की जिंदगी भगवान भरोसे ही होती है।
रास्ते में इमरजेंसी हुई तो बचाने का एक भी उपकरण निजी एंबुलेंस में नहीं होता।

अब देखना यह है कि जिलाधिकारी कब गोरखपुर की तर्ज पर मेडिकल कॉलेज से निजी एंबुलेंस माफिया गिरोह का सफाया करने के लिए कोई सख्त एक्शन लेंगे या फिर जनता को लूटने के लिए उनके हाल पर छोड़ देंगे……

एंबुलेंस के नाम पर कभी नहीं होती चेकिंग…..
एंबुलेंस के नाम पर इन गाड़ियों को रजिस्ट्रेशन में भी फायदा मिलता है। नियमानुसार रजिस्ट्रेशन के समय इनमें सारे जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए। एंबुलेंस का टोल टैक्स नहीं लगता है, उसका चालान नहीं होता है। यही नहीं सड़कों पर दौड़ रही प्राइवेट एंबुलेंस में जीवन रक्षक उपकरण है या नहीं इसकी हकीकत जानने की जहमत जिम्मेदार अफसरों कभी नहीं उठाते। स्वास्थ्य विभाग से लेकर आरटीओ ने हकीकत जानने का कभी प्रयास नहीं किया। बस नीली बत्ती हूटर का सहारा लेकर यह फर्राटे मारते हुए सड़कों पर दौड़ती हैं।

Amit Mathur

अमित माथुर - उप संपादक कलप्रिट तहलका

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