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लेख

जिस लाठी ने साम्राज्य को हिला दिया: पंजाब केसरी लाला लाजपत राय

admin
Last updated: जनवरी 27, 2026 9:37 पूर्वाह्न
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जिस लाठी ने साम्राज्य को हिला दिया: पंजाब केसरी लाला लाजपत राय

-सुनील कुमार महला 

28 जनवरी को महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, आर्य समाज के प्रमुख विचारक तथा प्रखर राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की जयंती मनाई जाती है। अपनी ओजस्वी वाणी, निर्भीक तेवर और अंग्रेजी हुकूमत के सामने कभी न झुकने वाले व्यक्तित्व के कारण वे जनमानस में ‘पंजाब केसरी’ (पंजाब का शेर) के नाम से विख्यात हुए। उनकी गर्जना(ओजस्वी भाषण) इतनी प्रभावशाली होती थी कि सभाओं में उपस्थित हजारों लोग एक ही आह्वान पर उनके पीछे चल पड़ते थे। निस्संदेह, वे भारतीय इतिहास के उन तेजस्वी सितारों में से एक हैं जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के फिरोज़पुर ज़िले के धुडीके गाँव (तत्कालीन पंजाब, ब्रिटिश भारत) में हुआ था। उनके पिता मुंशी राधाकृष्ण उर्दू-फ़ारसी के विद्वान थे तथा माता गुलाब देवी एक धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। इसी दौरान वे स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए और लाहौर में आर्य समाज से जुड़ गए। लाला जी का मानना था कि हिंदू धर्म का नैतिक आदर्शवाद जब राष्ट्रवाद के साथ जुड़ता है, तो वह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (सेकुलर स्टेट) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है। शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण अत्यंत प्रगतिशील था। वे दृढ़ता से विश्वास करते थे कि बिना शिक्षा के कोई भी राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता। इसी सोच के परिणामस्वरूप उन्होंने युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए तैयार करने हेतु ‘सर्वेंट्स ऑफ द पीपल सोसाइटी’ की स्थापना की तथा लाहौर में ‘नेशनल कॉलेज’ की शुरुआत की, जहाँ आगे चलकर भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों ने शिक्षा प्राप्त की।वे सामाजिक सुधारों के प्रबल समर्थक थे। 1890 के दशक के अंत में जब भारत के कई भागों में भीषण अकाल पड़ा, तब लाला जी ने राहत कार्यों का नेतृत्व किया और अनाथ बच्चों के लिए अनेक राहत शिविर एवं अनाथालय स्थापित कराए। वे विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा और छुआछूत उन्मूलन के लिए सक्रिय रूप से कार्यरत रहे।राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर उन्होंने उग्र राष्ट्रवादी नेताओं की प्रसिद्ध त्रयी ‘लाल-बाल-पाल’ का गठन किया। वे इस त्रयी के प्रमुख स्तंभ थे। वे हिंदू महासभा से भी जुड़े रहे और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध मुखर रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में उन्होंने पंजाब के अनेक राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वर्ष 1907 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें आंदोलनकारी गतिविधियों के कारण बर्मा निर्वासित कर दिया, किंतु पर्याप्त प्रमाण न होने के कारण कुछ महीनों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। कम लोगों को ज्ञात है कि 1914 से 1919 के बीच लाला लाजपत राय अमेरिका में रहे। वहाँ उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुँचाया और ब्रिटिश शासन के अत्याचारों से अमेरिकी जनता को अवगत कराया। इसी दौरान उन्होंने 1917 में ‘होम रूल लीग ऑफ अमेरिका’ की स्थापना कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भारत की स्वतंत्रता के लिए नैतिक समर्थन माँगा।उन्होंने बंगाल विभाजन का कड़ा विरोध किया, रौलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड की तीखी निंदा की। वे अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का समर्थन किया। वर्ष 1926 में वे केंद्रीय विधानसभा के उप-नेता चुने गए। 1928 में जब ब्रिटिश सरकार ने बिना किसी भारतीय सदस्य के साइमन कमीशन भारत भेजा, तो लाला लाजपत राय ने विधानसभा में इसका विरोध प्रस्ताव रखा और लाहौर में इसके खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व किया। इसी दौरान उन्होंने ऐतिहासिक नारा दिया-‘साइमन वापस जाओ'(साइमन गो बैक)। लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर उन पर निर्मम लाठीचार्ज किया गया। गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने अंग्रेज सरकार से कभी क्षमा नहीं माँगी। लाठीचार्ज से पूर्व उनका दिया गया वाक्य-‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में कील बनेगी।’ बाद में ऐतिहासिक सत्य सिद्ध हुआ। चोटों के कारण 17 नवंबर 1928 को लाहौर में उनका निधन हो गया। लाला जी की शहादत से क्षुब्ध होकर ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अंग्रेज अधिकारी सॉन्डर्स को मारकर प्रतिशोध लिया।लाला लाजपत राय न केवल एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वे भारत को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से सशक्त बनाने वाले दूरदर्शी चिंतक भी थे। उनकी लेखनी भी उतनी ही प्रखर थी- यंग इंडिया, अनहैप्पी इंडिया, भारत का इंग्लैंड पर आरोप, इंडिया विल टू फ्रीडम, भगवद्गीता का संदेश सहित अनेक कृतियाँ उनके विचारों की अमिट धरोहर हैं। वे पंजाब नेशनल बैंक के सह-संस्थापक, आर्य गजट के संपादक और कई शिक्षण-सामाजिक संस्थाओं के प्रेरणास्रोत रहे।अंततः कहा जा सकता है कि पंजाब केसरी लाला लाजपत राय शहादत की वह मशाल हैं, जिनकी लौ भारतीय राष्ट्रवाद को सदैव प्रकाशित करती रहेगी-उन्हें भुला पाना असंभव है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

 
 
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