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एटा निकाय चुनाव: मांझी जब नाव डुबोए तो उसे कौन बचाये

admin
Last updated: मई 8, 2023 3:08 अपराह्न
By admin 12 Views
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4 Min Read
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एटा निकाय चुनाव: मांझी जब नाव डुबोए तो उसे कौन बचाये

सपा-भाजपा के प्रत्याशी रहें सावधान, पार्टी के नेता ही नहीं चाहते कि कोई उनके बराबर का नेता बने

-मदन गोपाल शर्मा
एटा। नगरपालिका के चेयरमैन पद का चुनाव रोमांचक दौर में पहुंच चुका है यूं तो सभी प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत के दावे चुनाव परिणाम आने तक करते रहेंगे, क्योंकि उनके इर्द-गिर्द रहने वाले नेता उंगलियों पर ऐसे आंकड़े बताकर जीतता हुआ बताते रहते हैं। एक देसी कहावत है कि सावन के अंधे को हरा-हरा ही दिखता है। उनकी नाव की पतवार चलाने वाले मांझी ही उनकी नाव डुबोने में लगे हुए हैं। वे नहीं चाहते कि कोई नया नेता उभर कर मैदान में आये और फिर उनकी बराबरी करे। वह बखूबी जानते हैं कि जो चेयरमैन बनेगा वह पार्टी में अन्य पदों के लिए भी दावेदारी करेगा। हर कोई पुराना नेता अपनी-अपनी सीट बचाये रखना चाहता है। यही वजह है कि न तो समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी जीतता है और न भाजपा का प्रत्याशी कोई कमाल दिखा पाता है। भाजपा के रणनीतिकार हर बार एक नये प्रत्याशी को चुनाव लड़ाकर ठिकाने लगा देने में पारंगत हैं।
विचारणीय विषय तो यह है कि समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पास तमाम निष्ठावान कार्यकर्ताओं के विशाल संगठन हैं। राजनैतिक पार्टियों के पास हजारों वोटों के अपने-अपने वोट बैंक होते हैं। निर्दलीय प्रत्याशियों के पास न तो पार्टीगत विचारधारा का वोट बैंक होता है और न निष्ठावान पार्टी कार्यकताओं की लम्बी लाइन होती है। इस सबके बावजूद निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गिरीश मिश्रा, राकेश गांधी और मीरा गांधी ने चुनाव जीतकर राष्ट्रीय पार्टियों को आईना दिखाने का काम किया है कि उनके इतने बड़े संगठनों पर निर्दलियों के मुट्ठी भर कार्यकर्ता भारी पड़ जाते हैं ऐसा क्यों?
राजनीति के जानकारों का कहना तो यहां तक है कि इन राजनीतिक दलों के प्रत्याशी पार्टी नेताओं के चक्रव्यूह में फंसकर चुनाव हार जाते हैं। दूसरों से मदद लेने की आस में ज्यादातर दायित्व ऐसे नेताओं को सौंप देते हैं जो उन्हें जीतते हुए देखना ही नहीं चाहते। कुछ नेताआंे की चाल तो यह रहती है कि एक बार चुनाव हरा दीजिए अगली बार वह टिकट की लाइन ही नहीं, लगभग राजनीति से ही दूर होता चला जाता है और चालाक नेताओं का अपनी पार्टी की राजनीति में एक क्षत्र राज्य बना रहता है। समाजवादी पार्टी से नगर निकाय चुनाव में चेयरमैन पद पर कई बार से मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे जाते हैं लेकिन मुस्लिम प्रत्याशियों को उनके सजातीय नेता ही चुनाव हरा देते हैं। प्रत्याशियों को आंखें खोलकर चुनाव की कमान अपने हाथों में संभालनी होगी और सारे निर्णय अपने विवेकानुसार लेने होंगे तभी निर्दलीय प्रत्याशी से जीत सकेंगे।
जातियों के सौदागर चालाक लोग 10-20 सजातीय व्यक्तियों को दावत के नाम पर बुलाकर प्रत्याशियों की सभाएं करा देते हैं और प्रत्याशियों को हजारांे वोट गिनाकर थैला मांगकर थैली लेने में सफल हो जाते हैं। जबकि सजातियों को मालूम ही नहीं होता कि उन्हें जातिय नेताओं ने बेच दिया है।
इस चुनाव का परिणाम 13 मई को आएगा। विजय का पुष्पहार किसके गले में पड़ेगा यह भविष्य का प्रश्न है लेकिन राजनीति के जानकार सम्भावनाएं अधिकांशतः एक जैसी जता रहे हैं।

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