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लेख

राजनीतिक घृणा की अति और देश की प्रतिष्ठा

admin
Last updated: मार्च 10, 2026 7:56 पूर्वाह्न
By admin 14 Views
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9 Min Read
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राजनीतिक घृणा की अति और देश की प्रतिष्ठा

(अब क्या कहेंगे वे लोग, जो स्टेडियम के नाम को बहाना बनाकर प्रधानमंत्री को “पनौती” कहने में संकोच नहीं करते थे?)

— डॉ. प्रियंका सौरभ

लोकतंत्र में असहमति और आलोचना को एक स्वस्थ परंपरा माना जाता है। सत्ता में बैठी सरकार, उसके निर्णयों और उसके नेतृत्व पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार भी है और लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण भी। लेकिन जब आलोचना की सीमाएँ टूटकर व्यक्तिगत कटाक्ष, उपहास और अपमान तक पहुँच जाती हैं, तब यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं रह जाती, बल्कि एक ऐसी मानसिकता का रूप ले लेती है जो लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है।

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हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेदों की जगह कटुता और घृणा ने तेजी से स्थान बना लिया है। किसी भी घटना, उपलब्धि या राष्ट्रीय आयोजन को देखने से पहले उसे राजनीतिक चश्मे से परखने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि कई बार देश से जुड़ी उपलब्धियों या आयोजनों को भी कुछ लोग केवल इसलिए तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगते हैं क्योंकि उनका संबंध उस नेतृत्व या सरकार से जोड़ दिया जाता है जिससे वे वैचारिक रूप से असहमत होते हैं।

खेल के मैदान को सामान्यतः राजनीति से अलग माना जाता है। खेल में प्रतिस्पर्धा होती है, हार-जीत होती है, लेकिन अंततः खेल भावना ही सर्वोपरि रहती है। किंतु जब खेल के मंच को भी राजनीतिक कटाक्ष और व्यक्तिगत टिप्पणियों का माध्यम बना दिया जाए, तो यह खेल की गरिमा और राष्ट्रीय भावना दोनों को आहत करता है। क्रिकेट जैसे खेल, जो भारत में करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, उसे भी जब राजनीतिक तंज का विषय बना दिया जाता है तो यह प्रवृत्ति चिंताजनक प्रतीत होती है।

विडंबना यह है कि जिस स्टेडियम के नाम को लेकर कुछ लोगों ने व्यंग्य और कटाक्ष का सहारा लिया, उसी मैदान पर भारत ने विश्व कप जीतकर इतिहास रच दिया। यह घटना केवल खेल की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से भी बहुत कुछ कहती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि क्षणिक राजनीतिक टिप्पणियाँ और नकारात्मक बयानबाजी अंततः वास्तविक उपलब्धियों के सामने टिक नहीं पातीं।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है कि सभी लोग एक ही राजनीतिक विचारधारा से सहमत नहीं होंगे। कोई भी नेता या सरकार आलोचना से परे नहीं हो सकती। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि आलोचना तथ्यों, तर्कों और मर्यादा के आधार पर हो। जब आलोचना का स्वरूप गिरकर केवल व्यंग्य, अपमान और उपहास तक सीमित हो जाता है, तब वह लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा को कम कर देता है।

सोशल मीडिया के विस्तार ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है। आज हर व्यक्ति के पास अपनी राय व्यक्त करने का मंच है। यह लोकतांत्रिक दृष्टि से सकारात्मक भी है, क्योंकि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नया विस्तार मिला है। लेकिन इसके साथ ही यह भी देखने में आता है कि कई बार बिना तथ्य जाँचे, बिना गंभीरता से सोचे लोग ऐसी टिप्पणियाँ कर देते हैं जो अनावश्यक विवाद और कटुता को जन्म देती हैं। कई बार लोग केवल किसी समूह विशेष को खुश करने या भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग करने लगते हैं जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती।

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राजनीतिक संवाद में भाषा की मर्यादा का विशेष महत्व होता है। शब्द केवल विचार व्यक्त नहीं करते, बल्कि समाज के वातावरण को भी प्रभावित करते हैं। जब सार्वजनिक जीवन में प्रयुक्त भाषा लगातार कठोर और अपमानजनक होती जाती है, तो उसका प्रभाव समाज के सामान्य व्यवहार पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे असहमति को दुश्मनी और आलोचना को अपमान समझने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है।

भारतीय राजनीतिक परंपरा में व्यंग्य और कटाक्ष की अपनी एक जगह रही है, लेकिन इसके साथ एक प्रकार का संतुलन और मर्यादा भी दिखाई देती थी। आज स्थिति कई बार ऐसी दिखाई देती है जहाँ शब्दों की तीव्रता और भाषा की कठोरता संवाद की संभावनाओं को ही समाप्त कर देती है। इससे समाज में अनावश्यक तनाव और विभाजन की स्थिति पैदा होती है।

इस संदर्भ में यह समझना भी आवश्यक है कि किसी भी लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना अनिवार्य होती है। यदि सरकार या नेतृत्व से कोई भूल होती है तो उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। मीडिया, बुद्धिजीवी और आम नागरिकों का यह दायित्व है कि वे सत्ता से सवाल पूछें। लेकिन आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि केवल अपमान या उपहास।

आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वस्थ आलोचना और अनावश्यक घृणा के बीच अंतर को समझे। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता हैं, लेकिन यदि ये मतभेद सामाजिक विभाजन का कारण बनने लगें तो यह स्थिति चिंता का विषय बन जाती है। इसलिए आवश्यक है कि हम असहमति को सम्मानजनक संवाद के रूप में स्वीकार करें, न कि उसे व्यक्तिगत आक्रमण का माध्यम बना दें।

समाज के जागरूक वर्ग—जैसे लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद और बुद्धिजीवी—इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक विमर्श का स्तर गिरने न पाए। तर्क, तथ्य और मर्यादा के साथ अपनी बात रखने की परंपरा को मजबूत करना ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा योगदान हो सकता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक सत्ता स्थायी नहीं होती। समय के साथ सरकारें बदलती रहती हैं, नेता आते-जाते रहते हैं और परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं। लेकिन राष्ट्र की प्रतिष्ठा और उसकी गरिमा स्थायी होती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक विवाद या असहमति में हमें इस मूल तथ्य को नहीं भूलना चाहिए कि अंततः हम सभी एक ही देश के नागरिक हैं और उसकी प्रतिष्ठा हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम राजनीतिक बहसों को अधिक परिपक्व और जिम्मेदार बनाएं। असहमति को शत्रुता में बदलने के बजाय उसे विचारों के स्वस्थ आदान-प्रदान का माध्यम बनाएं। आलोचना करें, लेकिन तर्क और तथ्य के आधार पर करें। व्यंग्य करें, लेकिन उसकी मर्यादा बनाए रखें। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि किसी भी परिस्थिति में देश की प्रतिष्ठा और गरिमा को सर्वोपरि रखें।

लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनावों में नहीं, बल्कि उस संवाद में होती है जो समाज के भीतर निरंतर चलता रहता है। यदि यह संवाद संयमित, तर्कपूर्ण और सम्मानजनक होगा तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यदि यह संवाद घृणा, उपहास और कटुता से भर जाएगा, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ने लगेंगी।

अंततः यह स्मरण रखना होगा कि राजनीतिक टिप्पणियाँ क्षणिक होती हैं, लेकिन राष्ट्र की उपलब्धियाँ इतिहास बन जाती हैं। जिस मैदान को लेकर कभी तंज कसे गए थे, उसी मैदान पर जब भारत विश्व विजेता बनकर खड़ा होता है, तो वह केवल एक खेल की जीत नहीं होती—वह यह भी संदेश देती है कि नकारात्मकता और कटाक्ष से ऊपर उठकर ही देश की असली पहचान बनती है।

सत्ता बदलती रहती है, राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन देश की प्रतिष्ठा हमेशा सर्वोपरि रहती है। यही कारण है कि हर नागरिक का यह दायित्व है कि वह अपने शब्दों और विचारों के माध्यम से उस गरिमा को बनाए रखने में योगदान दे। जब हम यह समझने लगेंगे कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर राष्ट्रहित है, तभी लोकतंत्र की वास्तविक भावना सुरक्षित रह सकेगी।

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