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लेख

वैश्विक व्यवस्था में लड़ाई टैंक व तोप से नहीं, टैरिफ़ वॉर से

admin
Last updated: अगस्त 25, 2025 8:33 अपराह्न
By admin 32 Views
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वैश्विक व्यवस्था में लड़ाई टैंक व तोप से नहीं, टैरिफ़ वॉर से

 

डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

 

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आज दुनिया 21 वीं सदी में प्रवेश कर रही है और 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में एक अजीब सा विरोधाभास उभर कर सामने आया है। एक ओर वैश्वीकरण का सपना जिसमें सीमाएं सिर्फ नक्शों तक सीमित हों और बाजारों की पहुँच हर कोने तक हो, वहीं दूसरी ओर टैरिफ़ वॉर जैसी घटनाएं जो उसी सपने की नींव में दरार डालने का काम कर रही हैं। वैश्वीकरण का युग बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब शुरू हुआ, तो पूरी दुनिया जैसे एक साझा बाज़ार में बदलने लगी थी पर आज, तीसरे दशक की दहलीज़ पर खड़ी दुनिया यह देख रही है कि अमेरिका , चीन और भारत जैसे आर्थिक महाशक्तियों के बीच शुरू हुआ ‘टैरिफ़ युद्ध’ केवल दो देशों की बात नहीं रह गया बल्कि एक वैश्विक मानसिकता को दर्शाने लगा है, एक ऐसी मानसिकता, जो संरक्षणवाद की ओर लौटना चाहती है।

 

अब लड़ाई टैंक और तोप से नहीं, शुल्क और आर्थिक प्रतिबंधों से लड़ी जाती हैं। यह युद्ध जितना चुपचाप चलता है, उतना ही गहरा असर छोड़ता है। कभी एक किसान के सपने पर, कभी एक मज़दूर की रोज़ी- रोटी पर और कभी एक छोटे व्यापारी की उम्मीदों पर। जब कोई देश उदाहरण के लिए अमेरिका, किसी अन्य देश जैसे चीन व भारत से ज़्यादा आयात करता है और बदले में कम निर्यात तो व्यापार का घाटा बढ़ता है। इसे संतुलित करने के लिए टैरिफ़ लगाए जाते हैं लेकिन यह कहानी सिर्फ़ घाटे की नहीं है। इसमें राजनीतिक दबाव, तकनीकी वर्चस्व और बौद्धिक संपदा की लड़ाई भी शामिल है।

 

अमेरिका का आरोप रहा है कि चीन न केवल अपनी मुद्रा को कृत्रिम रूप से सस्ता बनाए हुए है बल्कि वह अमेरिकी कंपनियों की तकनीक को भी संरक्षणहीन रूप से अपना रहा है। ऐसे में टैरिफ़ एक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल हुआ और यह केवल दबाव डालने के लिए, चेताने के लिए।

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वहीं, घरेलू राजनीति का भी इसमें रोल कम नहीं है। जब किसी देश के भीतर का उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा होता है, तो टैरिफ़ एक तरह से उसे “संजीवनी” देने का उपाय माना जाता है। चुनाव आते हैं, वादे किए जाते हैं, और नीतियाँ बनती हैं। कहते हैं, हर नीति का एक चेहरा दिखता है और एक छिपा रहता है। टैरिफ़ वॉर भी कुछ ऐसा ही है। स्थानीय उद्योगों को राहत शुरुआती तौर पर कुछ घरेलू उद्योगों को इसका फायदा ज़रूर मिलता है। जैसे अमेरिका में स्टील उद्योग ने राहत की सांस ली जब चीनी स्टील पर शुल्क लगाया गया। सरकारी राजस्व में वृद्धि टैरिफ़ से सरकारी खज़ाने में कुछ पैसे आते हैं पर क्या यह आर्थिक स्थायित्व की कीमत चुका पाते हैं?

 

उपभोक्ता पर भार , अंततः महंगे उत्पादों का भार आम आदमी पर ही पड़ता है। खासतौर पर उन पर जो अपनी आय का बड़ा हिस्सा आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण है वैश्विक उत्पादन श्रृंखलाओं (ग्लोबल सप्लाई चेन) पर इसका असर। आज कोई भी वस्तु एक देश में पूरी नहीं बनती। कंप्यूटर चिप्स हों या मोबाइल फोन, वे कई देशों से गुज़रकर तैयार होते हैं। ऐसे में टैरिफ़ न केवल लागत बढ़ाते हैं, बल्कि उत्पाद की उपलब्धता को भी प्रभावित करते हैं।

भारत ने इस वैश्विक उठा-पटक के बीच एक परिपक्व और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। टैरिफ़ वॉर में सीधे कूदने के बजाय भारत ने संवाद और कूटनीति को तरज़ीह दी। चाहे WTO हो या द्विपक्षीय वार्ताएं, भारत ने अपने हितों की रक्षा समझदारी से की है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलें सिर्फ़ नारे नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीति हैं जिसका उद्देश्य है घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देना और विश्व पटल पर एक मज़बूत विनिर्माण शक्ति के रूप में उभरना। साथ ही, भारत ने आयात पर आवश्यकतानुसार एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई। यह व्यापार को अव्यवस्थित करने वालों के लिए एक चेतावनी रही, न कि युद्ध की घोषणा।

 

टैरिफ़ वॉर एक अल्पकालिक राजनीतिक समाधान तो हो सकता है पर यह स्थायी आर्थिक शांति का रास्ता नहीं बन सकता। यह वह द्वार है, जो देशों को फिर से सीमाओं में कैद कर सकता है। यह समझना ज़रूरी है कि वैश्वीकरण केवल व्यापारिक लाभ का नाम नहीं है बल्कि यह एक साझा भविष्य की उम्मीद है। जब दुनिया के देश एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, तब एक देश की आर्थिक लड़खड़ाहट पूरी व्यवस्था को डगमगा सकती है। ऐसे में संवाद, सहयोग और विश्वास ही एकमात्र विकल्प हैं।

टैरिफ़ दीवारें बनाते हैं, पर संवाद सेतु बनाता है। हमें दीवारों की नहीं, सेतुओं की ज़रूरत है। ताकि हम मिलकर एक बेहतर आर्थिक विश्व बना सकें। वैश्वीकरण में इसका असर सभी पर पड़ता है।

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